कारगिल युद्ध की गुप्त साजिश: आखिर कौन थे पाकिस्तान के वे 4 जनरल जिन्होंने रची थी पूरी पटकथा?

कारगिल युद्ध महज एक सैन्य संघर्ष नहीं था, बल्कि पाकिस्तान के चार शीर्ष जनरलों द्वारा तैयार की गई एक सोची-समझी साजिश थी जिसे 'गैंग ऑफ फोर' के नाम से जाना जाता है। इस रिपोर्ट में जानिए कैसे चार अधिकारियों ने पूरे देश और सरकार को अंधेरे में रखकर भारत के खिलाफ यह खतरनाक खेल खेला था।

कारगिल की साजिश का सच

कारगिल युद्ध के बारे में तो हर भारतीय जानता है, लेकिन इस युद्ध के पीछे की असल साजिश की परतें आज भी कई लोगों के लिए रहस्य हैं। यह युद्ध पाकिस्तान के किसी संस्थागत सैन्य निर्णय का परिणाम नहीं था, बल्कि यह चार शक्तिशाली जनरलों की एक गुप्त योजना थी, जिसे बाद में 'गैंग ऑफ फोर' के नाम से पहचाना गया। इस विशेष रिपोर्ट में हम उस साजिश के हर पहलू को बारीकी से समझेंगे।

गैंग ऑफ फोर: वे चार नाम जिन्होंने बदल दी दक्षिण एशिया की राजनीति

पाकिस्तान के आधिकारिक सैन्य दस्तावेजों में 'गैंग ऑफ फोर' शब्द का कहीं भी उल्लेख नहीं मिलता, लेकिन पत्रकार नसीम ज़हरा ने अपनी पुस्तक From Kargil to the Coup: Events That Shook Pakistan में इन अधिकारियों की भूमिका को विस्तार से उजागर किया है। इसके अलावा, पाकिस्तान सेना के पूर्व डीजीएमओ लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) शाहिद अज़ीज़ ने अपनी उर्दू किताब Ye Khamoshi Kahan Tak में इस बात की पुष्टि की है कि कारगिल ऑपरेशन की योजना पूरी तरह से एक संकीर्ण और सीमित समूह तक ही सीमित रखी गई थी।

इन चार जनरलों में शामिल थे:

  • जनरल परवेज़ मुशर्रफ: उस समय के सेना प्रमुख (COAS)।
  • लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद अज़ीज़ खान: उस समय के चीफ ऑफ जनरल स्टाफ।
  • लेफ्टिनेंट जनरल महमूद अहमद: उस समय के 10 कोर कमांडर।
  • मेजर जनरल जावेद हसन: उस समय के फोर्स कमांड नॉर्दर्न एरियाज़ (FCNA) के कमांडर।

यह चार सदस्यीय समूह न केवल इस ऑपरेशन का मास्टरमाइंड था, बल्कि इसने पूरी सैन्य प्रक्रिया को दरकिनार कर इसे अंजाम दिया था।

साजिश की जड़ें: 1984 से शुरू हुई कसरत

बहुत से लोगों का मानना है कि कारगिल की योजना रातों-रात तैयार हुई, लेकिन वास्तव में इसकी जड़ें 1984 के ऑपरेशन मेघदूत में छिपी थीं। जब भारत ने सियाचिन ग्लेशियर की चोटियों पर कब्जा किया, तब से ही पाकिस्तानी सेना के भीतर एक कसक थी कि कैसे भारत की इस बढ़त का जवाब दिया जाए। परवेज़ मुशर्रफ ने अपनी आत्मकथा In the Line of Fire में दावा किया है कि 1989-90 में, जब वे मेजर जनरल थे, तब उन्होंने कश्मीर में आक्रामक रुख अपनाने का प्रस्ताव रखा था, जिसे तत्कालीन सरकार ने खारिज कर दिया था।

अक्टूबर 1998: सत्ता का नया केंद्र और मास्टर प्लान

कारगिल की पटकथा में सबसे बड़ा बदलाव 12 अक्टूबर 1998 को आया जब नवाज़ शरीफ ने जनरल जहांगीर करामत को हटाकर जनरल परवेज़ मुशर्रफ को सेना प्रमुख नियुक्त किया। मुशर्रफ के पद संभालते ही उन्होंने कारगिल सेक्टर के पुराने सैन्य प्रस्तावों को धूल झाड़कर निकालना शुरू कर दिया। उन्होंने केवल उन अधिकारियों को अपनी बैठकों में बुलाया जिन पर उन्हें अटूट भरोसा था। यहीं से 'गैंग ऑफ फोर' का गठन हुआ। ये सभी अधिकारी उत्तरी इलाकों की भौगोलिक स्थिति से भली-भांति परिचित थे और भारत की श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-1A) को निशाना बनाकर भारत पर सामरिक दबाव बनाना चाहते थे।

ऑपरेशन बद्र: एक जोखिम भरा जुआ

पाकिस्तान ने इस ऑपरेशन को 'ऑपरेशन बद्र' का नाम दिया। इनका अनुमान था कि सर्दी के मौसम में भारतीय सेना ऊंची चौकियों से नीचे आ जाती है, जिसका फायदा उठाकर पाकिस्तानी सैनिक वहां कब्जा जमा लेंगे। इनका मानना था कि भारत कोई बड़ा युद्ध नहीं छेड़ेगा और अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते कश्मीर का मुद्दा फिर से चर्चा में आ जाएगा। हालांकि, उनकी यह गणना गलत साबित हुई। पूरी योजना इतनी गुप्त थी कि पाकिस्तान की वायुसेना (PAF) और नौसेना को भी ऑपरेशन के बारे में कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई थी।

नवाज़ शरीफ को कितनी जानकारी थी?

यह आज भी बहस का विषय है। नवाज़ शरीफ ने हमेशा दावा किया है कि उन्हें सैन्य ऑपरेशन की असल प्रकृति के बारे में नहीं बताया गया था। उन्हें केवल यह जानकारी दी गई कि कुछ गतिविधियां हो रही हैं, लेकिन उन्होंने यह कभी नहीं माना कि उन्हें नियमित सैनिकों के घुसपैठ के बारे में पूरी सच्चाई पता थी। नसीम ज़हरा और अन्य सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि नागरिक सरकार और सैन्य नेतृत्व के बीच सूचना का एक बहुत बड़ा अंतर था, जिसे मुशर्रफ ने जानबूझकर बनाए रखा था।

तैयारियां और लाहौर घोषणा

नवंबर 1998 से जनवरी 1999 के बीच पाकिस्तान की नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री (NLI) ने अपनी घुसपैठ की तैयारियां तेज कर दीं। सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि एक तरफ पाकिस्तान युद्ध की तैयारी कर रहा था, दूसरी तरफ फरवरी 1999 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बस यात्रा कर लाहौर पहुंचे थे और लाहौर घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर हो रहे थे। यह विरोधाभास पाकिस्तान के उस 'गैंग ऑफ फोर' की धूर्तता को दर्शाता है जिन्होंने शांति वार्ता के दौरान ही पीठ में छुरा घोंपने का प्लान बनाया था।

अंजाम और तख्तापलट

युद्ध के बाद की स्थिति ने पाकिस्तान की राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया। हार के बाद नवाज़ शरीफ और मुशर्रफ के बीच टकराव अपने चरम पर पहुंच गया। 12 अक्टूबर 1999 को मुशर्रफ ने तख्तापलट कर दिया। इस घटना के बाद महमूद अहमद को ISI का प्रमुख बनाया गया और मोहम्मद अज़ीज़ खान चेयरमैन जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ बने। 'गैंग ऑफ फोर' के ये चारों जनरल लंबे समय तक पाकिस्तान की सत्ता और सेना की रीढ़ बने रहे। इतिहास आज भी गवाह है कि कैसे चंद लोगों के अहंकार ने दो परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसियों को युद्ध की आग में धकेल दिया था।

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