सुप्रीम कोर्ट का केंद्र को नोटिस
टोक्यो के रेंकोजी मंदिर में संरक्षित नेताजी सुभाष चंद्र बोस की कथित अस्थियों को भारत लाने की मांग को लेकर एक बार फिर कानूनी प्रक्रिया तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में केंद्र सरकार से औपचारिक जवाब मांगा है। प्रधान न्यायाधीश सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र को नोटिस जारी किया है। इस विशेष पीठ में सीजेआई के अलावा जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने पक्ष रखा।
याचिकाकर्ता की पहचान और कानूनी स्थिति
यह महत्वपूर्ण याचिका नेताजी सुभाष चंद्र बोस की बेटी अनीता बी. फाफ द्वारा दायर की गई है। अगस्त 1945 में नेताजी के रहस्यमय तरीके से लापता होने के बाद से ही उनके जीवन और अंत को लेकर देश में कई तरह की धारणाएं और अटकलें रही हैं। इन्हीं में से एक मुख्य दावा यह है कि उनके अवशेष जापान की राजधानी टोक्यो स्थित रेंकोजी मंदिर में रखे गए हैं। लंबे समय से उन अस्थियों को भारत लाने की मांग उठती रही है, लेकिन अब कानूनी रूप से इसे ठोस आधार देने का प्रयास किया जा रहा है।
अदालत का पिछला रुख और प्रपौत्र की याचिका
इस मामले में इससे पहले भी कानूनी कार्यवाही हो चुकी है। मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने नेताजी के प्रपौत्र आशीष रे द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया था। उस समय तत्कालीन पीठ ने स्पष्ट किया था कि नेताजी की बेटी अनीता बोस फाफ को स्वयं इस मामले में आगे आना चाहिए। अदालत का मानना था कि वही उनकी कानूनी उत्तराधिकारी हैं। पीठ ने उस समय टिप्पणी करते हुए कहा था कि हालांकि वे भावनाओं का सम्मान करते हैं, लेकिन इस तरह के मामलों में वारिस का सीधे तौर पर उपस्थित होना आवश्यक है।
पारिवारिक मतभेद और अदालती प्रक्रिया
जस्टिस बागची ने पिछली सुनवाई के दौरान इस बात पर जोर दिया था कि नेताजी के परिवार के भीतर ही उनकी अस्थियों और उनसे जुड़ी घटनाओं को लेकर अलग-अलग मत हैं। अदालत का स्पष्ट कहना था कि यह लड़ाई पर्दे के पीछे से नहीं लड़ी जा सकती। यदि परिवार के वारिस वास्तव में अस्थियों को देश वापस लाना चाहते हैं, तो उन्हें स्वयं कोर्ट के समक्ष अपनी बात रखनी होगी। इसी निर्देश के बाद अब अनीता बी. फाफ ने औपचारिक रूप से अपनी याचिका दाखिल की है, जिसे स्वीकार करते हुए अदालत ने सरकारी तंत्र से जवाब-तलब किया है।
अतीत की याचिकाएं और न्यायिक समीक्षा
सीजेआई ने इस सुनवाई के दौरान यह भी याद दिलाया कि नेताजी से संबंधित मामले पहले भी कई बार सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आ चुके हैं और उन पर विभिन्न निर्णय दिए गए हैं। नवंबर 2024 में कटक के एक नागरिक द्वारा नेताजी की मृत्यु की जांच के लिए दायर याचिका को अदालत ने खारिज कर दिया था। तब कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि नेताजी की मृत्यु का मामला न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं आता है। जब 12 मार्च को पिछली बार याचिका पर चर्चा हुई थी, तब वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने याचिका वापस लेने और अनीता बी. फाफ के माध्यम से नई याचिका दाखिल करने की अनुमति मांगी थी, जिसे अदालत ने मंजूर कर लिया था।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में नेताजी का योगदान
सुभाष चंद्र बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक अत्यंत प्रभावशाली और महान व्यक्तित्व रहे हैं। उन्हें उनके उग्र राष्ट्रवाद और अदम्य साहस के लिए याद किया जाता है। उन्होंने न केवल भारत की आजादी के लिए संघर्ष किया, बल्कि इंडियन नेशनल आर्मी (INA) की स्थापना कर ब्रिटिश शासन को सीधी चुनौती दी थी। आज भी उनके जीवन का रहस्य और उनकी अस्थियों की वापसी का मुद्दा देश के करोड़ों लोगों की भावनाओं से जुड़ा हुआ है।
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