क्या अरविंद केजरीवाल ने लिखी थी CJP प्रदर्शन की पटकथा? 6 फेस टाइम कॉल और पर्दे के पीछे की पूरी कहानी

दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए CJP प्रदर्शन को लेकर चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। खुफिया सूत्रों का दावा है कि इस पूरे आंदोलन की योजना पर्दे के पीछे से अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी द्वारा बनाई गई थी।

CJP प्रदर्शन के पीछे की रहस्यमयी पटकथा

दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल ही में हुए प्रदर्शनों ने पूरे देश की राजनीति में हलचल मचा दी है। इन प्रदर्शनों का नेतृत्व कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने किया था। हालांकि, अब यह आंदोलन केवल छात्रों की मांगों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक बड़े राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गया है। खुफिया सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस पूरे प्रदर्शन के पीछे की पटकथा किसी और ने नहीं, बल्कि अरविंद केजरीवाल ने पर्दे के पीछे रहकर लिखी थी।

6 फेस टाइम कॉल और आंदोलन की वापसी

खुफिया विभाग के सूत्रों का दावा है कि अभिजीत दिपके 6 जून 2026 को जंतर-मंतर पर एक दिवसीय विरोध प्रदर्शन के बाद वापस चले गए थे। उस समय वे दोबारा दिल्ली आकर लंबे आंदोलन की शुरुआत करने के मूड में नहीं थे। सूत्रों के अनुसार, अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी के नेता सौरभ भारद्वाज के माध्यम से अभिजीत दिपके को कुल 6 फेस टाइम (FaceTime) कॉल किए। इन कॉल्स का मुख्य उद्देश्य दिपके को वापस दिल्ली आने और आंदोलन को जारी रखने के लिए राजी करना था। उन्हें यह भरोसा दिलाया गया कि उन्हें हर स्तर पर पर्दे के पीछे से समर्थन मिलेगा और किसी भी प्रकार के राजनीतिक दबाव से डरने की जरूरत नहीं है।

राजनीतिक सलाह और डिजिटल मदद

सूत्रों के मुताबिक, केजरीवाल और आम आदमी पार्टी की ओर से सीजेपी को सिर्फ राजनीतिक मंत्र ही नहीं दिए गए, बल्कि लॉजिस्टिक और डिजिटल मदद भी मुहैया कराई गई। मुख्य रणनीति यह थी कि इस छात्र आंदोलन का निशाना लगातार केंद्र सरकार बनी रहे। यह भी सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया कि यह आंदोलन किसी अन्य विपक्षी दल के प्रभाव में न आ जाए, बल्कि स्वतंत्र बना रहे ताकि राजनीतिक दबाव बरकरार रखा जा सके।

सोनम वांगचुक का उपवास और आंदोलन का रुख

अभिजीत दिपके अंततः वापस दिल्ली लौटे और 20 जून से जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन विरोध प्रदर्शन शुरू किया। इस आंदोलन में कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी शामिल हुए। उन्होंने परीक्षा में गड़बड़ियों को लेकर 26 दिनों तक भूख हड़ताल की। 24 जुलाई की सुबह, सोनम वांगचुक ने केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह की उपस्थिति में अपना उपवास समाप्त किया। इस दौरान उन्हें परीक्षा सुधारों और जवाबदेही के लिए सरकार से लिखित आश्वासन भी मिले।

केजरीवाल का हस्तक्षेप

सोनम वांगचुक द्वारा उपवास तोड़ने के फैसले के बाद अभिजीत दिपके को डर सताने लगा था कि आंदोलन की गति धीमी पड़ सकती है। सूत्रों का कहना है कि उस समय भी केजरीवाल ने उन्हें घबराने के बजाय एक खुला पत्र जारी करने की सलाह दी। इस पत्र के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि सीजेपी का संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक उनकी सभी मांगें पूरी नहीं हो जातीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे सोनम वांगचुक के आंदोलन समाप्त करने के बावजूद पीछे नहीं हटेंगे।

विपक्ष की एंट्री और तनाव

21 जुलाई का दिन इस आंदोलन में एक बड़ा मोड़ लेकर आया। कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, प्रियंका गांधी वाड्रा और अखिलेश यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास के पास विरोध प्रदर्शन किया, जिसके बाद उन्हें पुलिस ने हिरासत में ले लिया। सूत्रों के अनुसार, इस घटनाक्रम से अभिजीत दिपके फिर से चिंतित हो गए। उन्हें सौरभ भारद्वाज के जरिए निर्देश मिले कि सीजेपी को राजनीतिक दलों पर सीधे हमला करने से बचना चाहिए और अपना पूरा ध्यान केवल परीक्षा से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित रखना चाहिए। हालांकि, उन्हें राहुल गांधी के समर्थन को स्वीकार करने के लिए प्रोत्साहित किया गया ताकि मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर हवा दी जा सके।

रणनीति और स्वतंत्र पहचान का ढोंग

आंदोलन की रणनीति यह थी कि समर्थन तो सभी का लिया जाए, लेकिन कांग्रेस या अन्य दलों के संगठनात्मक ढांचे से दूरी बनाई रखी जाए। सीजेपी ने खुद को एक गैर-चुनावी और स्वतंत्र दबाव समूह के रूप में पेश किया। इसी बीच आम आदमी पार्टी ने सार्वजनिक रूप से कांग्रेस पर छात्रों के आंदोलन को हाईजैक करने का आरोप लगाकर अपना बचाव भी किया।

पर्दे के पीछे की फंडिंग

खुफिया आकलन यह भी इशारा करते हैं कि अरविंद केजरीवाल ने डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर आंदोलन की बारीक राजनीतिक रणनीति तक में सक्रिय भूमिका निभाई। कुछ दावों के अनुसार, शुरुआती दौर में सीजेपी को नकद के रूप में कुछ छोटी आर्थिक मदद भी पहुंचाई गई थी, हालांकि बाद में इसकी आवश्यकता कम महसूस की गई।

दिल्ली ही केंद्र क्यों रहा?

आंदोलन को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर पंजाब और अन्य राज्यों में बड़े स्तर पर प्रदर्शन क्यों नहीं हुए? क्यों पूरा जोर दिल्ली पर ही दिया गया? खुफिया सूत्रों का मानना है कि इसके पीछे एक सुनियोजित रणनीति थी ताकि छात्रों के आक्रोश को राष्ट्रीय राजधानी में केंद्रित कर केंद्र सरकार पर दबाव की चरम सीमा बनाई जा सके।

वर्तमान स्थिति

आज स्थिति यह है कि सीजेपी अपने दावों पर कायम है कि उनका आंदोलन पूरी तरह स्वतंत्र है और केवल शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए है। वहीं दूसरी तरफ, आम आदमी पार्टी ने इन आरोपों को सिरे से नकारते हुए इसे कांग्रेस की साजिश बताया है। यदि इन खुफिया दावों की स्वतंत्र पुष्टि होती है, तो यह देश की राजनीति में एक बड़ा मोड़ होगा कि कैसे एक वास्तविक छात्र आंदोलन को राजनीतिक प्रयोगशाला में तब्दील किया जा सकता है।

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