झारखंड में छात्र आंदोलन की धमक और राजनीतिक भविष्य
झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं के दौरान कथित धांधली और पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दों को लेकर युवाओं का गुस्सा चरम पर है। राज्य में पिछले 16 से 17 दिनों से चल रहा छात्रों का यह विरोध प्रदर्शन अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। झारखंड लोक सेवा आयोग यानी JPSC और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग यानी JSSC CGL की परीक्षाओं में पारदर्शिता की मांग को लेकर छात्र सड़क पर हैं। शांतिपूर्ण तरीके से चल रही भूख हड़ताल अब उस स्थिति में है जहां से इसका स्वरूप कभी भी बदल सकता है। राजधानी रांची में चल रहे इन प्रदर्शनों के बीच, छात्र संगठनों ने 10 अगस्त को राज्य विधानसभा का घेराव करने का ऐलान किया है। इस घोषणा ने झारखंड के सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या युवाओं का यह बढ़ता आक्रोश मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली सरकार के लिए कोई संवैधानिक या राजनीतिक संकट खड़ा कर सकता है?
छात्रों की प्रमुख मांगें और सरकार की स्थिति
आंदोलनरत छात्रों की मांगे काफी स्पष्ट हैं और वे अपने रुख पर पूरी तरह अडिग हैं। उनकी मुख्य मांगों में शामिल हैं:
- हाल ही में आयोजित हुई भर्ती परीक्षाओं में हुए कथित पेपर लीक, ओएमआर शीट में गड़बड़ी और मूल्यांकन में हुई गलतियों की सीबीआई से स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच।
- विवादों में फंसी इन सभी परीक्षाओं को तत्काल प्रभाव से रद्द करना और पूरी पारदर्शिता के साथ दोबारा आयोजन सुनिश्चित करना।
- पेपर लीक जैसी घटनाओं में शामिल भू-माफियाओं और अधिकारियों के खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई करना।
- आगामी भविष्य की सभी भर्ती परीक्षाओं के लिए एक पारदर्शी भर्ती कैलेंडर जारी करना।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने छात्रों को यह आश्वासन जरूर दिया है कि उनकी सरकार इस पूरे मामले को लेकर संवेदनशील है और पारदर्शिता के साथ न्याय किया जाएगा। इसके बावजूद छात्र केवल मौखिक आश्वासन के बजाय लिखित और ठोस कार्रवाई की मांग पर अड़े हुए हैं। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे देवेंद्र महतो के साथ अन्य युवा भी भूख हड़ताल पर बैठे हैं, जो सरकार की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं।
क्या सरकार गिरने का कोई संवैधानिक जोखिम है?
मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों और संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, केवल छात्र आंदोलन के दबाव से सरकार गिरने का कोई तात्कालिक खतरा नजर नहीं आता है। लोकतांत्रिक प्रणाली में किसी भी सरकार का भविष्य विधानसभा के अंदर बहुमत के आंकड़ों पर निर्भर करता है। हालांकि, बड़े पैमाने पर होने वाले जन-आंदोलन सरकार की नैतिक छवि और चुनावी साख को गहरा नुकसान जरूर पहुंचा सकते हैं। जब तक सरकार के सहयोगी दल अपना समर्थन वापस नहीं लेते, तब तक हेमंत सोरेन की कुर्सी को कोई तकनीकी खतरा नहीं है।
हेमंत सरकार का गठबंधन गणित और विधानसभा की स्थिति
झारखंड विधानसभा की कुल सीटों की संख्या 81 है, जिसका अर्थ है कि सत्ता में बने रहने के लिए जादुई आंकड़ा 41 सीटों का है। वर्तमान में हेमंत सोरेन सरकार बेहद मजबूत स्थिति में है और उनके पास 56 सीटों का बहुमत है। गठबंधन के दलों का बंटवारा कुछ इस प्रकार है:
- झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM): 34 सीटें
- कांग्रेस: 16 सीटें
- राष्ट्रीय जनता दल (RJD): 4 सीटें
- सीपीआई (ML) लिबरेशन: 2 सीटें
विपक्ष की बात करें तो भारतीय जनता पार्टी के पास 21 सीटें हैं, जबकि अन्य छोटे दलों के पास कुल 4 सीटें हैं। आंकड़ों के हिसाब से यदि आरजेडी या सीपीआई (ML) अपना समर्थन वापस भी ले लेते हैं, तो भी सरकार के पास 50 सीटें बची रहेंगी, जो बहुमत के आंकड़े 41 से काफी ज्यादा है। सरकार को खतरा तभी हो सकता है जब कांग्रेस के 16 विधायक या जेएमएम के अपने विधायक ही बगावत कर दें, जिसकी वर्तमान में कोई गुंजाइश दिखाई नहीं देती है क्योंकि कांग्रेस और आरजेडी दोनों ही सरकार की कैबिनेट में हिस्सेदार हैं।
राजनीतिक दलों का रुख और समर्थन
इस आंदोलन को राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी के साथ-साथ आजसू और झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा जैसे दलों का खुला समर्थन प्राप्त है। ये पार्टियां लगातार सरकार की नीतियों को निशाने पर ले रही हैं। दिलचस्प बात यह है कि सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर के कई विधायक भी दबे स्वर में यह स्वीकार करने लगे हैं कि छात्रों की मांगें जायज हैं और सरकार को बिना देरी किए उनसे संवाद स्थापित करना चाहिए। अब सबकी निगाहें 10 अगस्त के विधानसभा घेराव पर टिकी हैं, जहां यह देखना होगा कि प्रशासन और आंदोलनकारी छात्रों के बीच का यह गतिरोध किस दिशा में आगे बढ़ता है।
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