समस्तीपुर के दिनेश शर्मा: 60 की उम्र में बांसुरी की जादुई धुन से मोह लेते हैं लोगों का मन

बिहार के समस्तीपुर में रहने वाले 60 वर्षीय दिनेश कुमार शर्मा अपनी बांसुरी वादन कला से राहगीरों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं, साथ ही वे नई पीढ़ी को संगीत की बारीकियां भी सिखा रहे हैं।

संगीत के प्रति अटूट समर्पण

आमतौर पर जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, लोगों का उत्साह और उनकी सक्रियता कम होने लगती है। लेकिन बिहार के समस्तीपुर जिले के रोसड़ा इलाके में रहने वाले करीब 60 वर्षीय दिनेश कुमार शर्मा ने इस धारणा को पूरी तरह गलत साबित कर दिया है। दिनेश शर्मा की उम्र उनके संगीत के प्रति जुनून के आड़े बिल्कुल भी नहीं आती है। वे बीते कई वर्षों से लगातार संगीत की साधना कर रहे हैं और आज भी उनकी बांसुरी से निकलने वाली मधुर धुनें राहगीरों को रुकने और सुनने के लिए मजबूर कर देती हैं।

छोटी सी गुमटी और सुरों का सफर

दिनेश कुमार शर्मा का अपना एक खास अंदाज है। वे एक छोटी सी गुमटी में बैठकर अपनी बांसुरी बजाते हैं। उनकी इस छोटी सी जगह से जब बांसुरी के सुर निकलते हैं, तो आसपास से गुजरने वाले लोग खुद-ब-खुद थम जाते हैं। वे अक्सर अपनी धुन में खोए रहते हैं और उनकी बांसुरी की लय इतनी आकर्षक होती है कि वहां मौजूद लोग काफी देर तक उनकी प्रस्तुति का आनंद लेते हैं। दिनेश की पहचान सिर्फ एक बांसुरी वादक के रूप में ही नहीं है, बल्कि उन्हें अन्य वाद्य यंत्रों का भी गहरा ज्ञान है।

100 से अधिक गीतों पर अधिकार

दिनेश शर्मा की कला का सबसे बेहतरीन पहलू उनकी बांसुरी पर पकड़ है। उनका दावा है कि वे 100 से अधिक गीतों की धुन बांसुरी पर बड़ी आसानी से बजा सकते हैं। उनकी यह कुशलता इतनी शानदार है कि यदि कोई व्यक्ति उन्हें किसी गीत की बस कुछ पंक्तियां सुना दे या उसकी धुन गुनगुना दे, तो दिनेश उसी आधार पर अपनी बांसुरी पर वह धुन तैयार कर लेते हैं। उन्होंने अपनी बातचीत के दौरान कई बार बांसुरी के जरिए गीतों की धुनें सुनाकर लोगों को मंत्रमुग्ध किया है।

साधना का एक लंबा सफर

दिनेश के अनुसार, बांसुरी का संगीत हवा के तालमेल पर टिका होता है। यह एक साधारण सा सिद्धांत लगता है, लेकिन इसमें संगीत की पूरी खूबसूरती छिपी हुई है। उनका मानना है कि बांसुरी जैसे वाद्य यंत्र को बजाना सीखने के लिए लंबे समय तक कड़े अभ्यास और गहरी साधना की आवश्यकता होती है। सुर और ताल पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए वे घंटों समय बिताते हैं। इसके अलावा, वे हारमोनियम, बैंजो और गिटार जैसे वाद्य यंत्रों को बजाने में भी माहिर हैं। ग्राहकों की मांग पर वे उनके पसंदीदा गीतों को भी अपनी कला के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं। उनके लिए संगीत केवल मनोरंजन का जरिया नहीं, बल्कि वर्षों की एक कठिन साधना है।

नई पीढ़ी को सिखा रहे हैं संगीत

दिनेश शर्मा अपनी इस कला को केवल अपने तक ही सीमित नहीं रखना चाहते हैं। वे बच्चों को संगीत का ज्ञान देने के प्रति भी बेहद गंभीर हैं। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए, वे हर रविवार को बच्चों के लिए एक विशेष संगीत कक्षा का संचालन करते हैं। उनकी यह क्लास लगभग एक घंटे तक चलती है। महीने में चार दिन चलने वाली इस कक्षा के लिए वे 500 रुपये का शुल्क निर्धारित करते हैं।

बच्चों में रचनात्मकता जगाने का लक्ष्य

दिनेश बताते हैं कि उनका मुख्य लक्ष्य बच्चों को केवल वाद्य यंत्र बजाना सिखाना नहीं है, बल्कि उनके भीतर संगीत के प्रति एक गहरी रुचि पैदा करना है। वे चाहते हैं कि बच्चे विभिन्न वाद्य यंत्रों की बनावट और उनकी बारीकियों को गहराई से समझें। उनका मानना है कि संगीत के जरिए बच्चे अपनी रचनात्मक क्षमता को बेहतर तरीके से निखार सकते हैं। वे बच्चों को गायन के साथ-साथ गिटार, हारमोनियम और बांसुरी जैसे वाद्य यंत्रों का प्रशिक्षण देते हैं। उनके अनुसार, बचपन में संगीत की शिक्षा प्राप्त करने से बच्चों के आत्मविश्वास में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।

उम्र सिर्फ एक संख्या है

दिनेश कुमार शर्मा का मानना है कि संगीत सीखने या सिखाने के लिए उम्र की कोई सीमा नहीं होती। यदि किसी व्यक्ति के मन में किसी कला को सीखने की सच्ची इच्छा हो, तो बढ़ती उम्र कभी भी बाधा नहीं बनती है। यही कारण है कि 60 वर्ष की उम्र में भी वे न केवल स्वयं बांसुरी की साधना कर रहे हैं, बल्कि नई धुनें सीखने और अपनी कला को और अधिक निखारने के लिए प्रयासरत हैं। उनका जीवन उन सभी लोगों के लिए एक बड़ी प्रेरणा है जो उम्र बढ़ने के साथ अपने शौक और हुनर को कहीं पीछे छोड़ देते हैं।

एक पहचान, एक जुनून

छोटी सी गुमटी में बैठकर बांसुरी की मधुर धुन बिखेरने वाले दिनेश ने अपने संगीत के माध्यम से समाज में एक अलग पहचान बनाई है। उनके लिए बांसुरी सिर्फ लकड़ी का एक वाद्य यंत्र नहीं है, बल्कि उनके जीवन का एक अहम हिस्सा और उनकी साधना का अभिन्न अंग बन चुकी है। वे गर्व के साथ कहते हैं कि संगीत उनका जुनून है और यह उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। आज समस्तीपुर के रोसड़ा में उनकी बांसुरी की गूंज इस बात का प्रमाण है कि लगन और मेहनत से किसी भी उम्र में जीवन को संगीतपूर्ण बनाया जा सकता है।

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