खरीफ फसलों पर मंडराया सफेद मक्खी का संकट
मध्य प्रदेश के खरगोन जिले में वर्तमान में खरीफ फसलों पर सफेद मक्खी का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है, जिसने स्थानीय किसानों की नींद उड़ा दी है। मुख्य रूप से कपास, मिर्च, मूंग और विभिन्न प्रकार की हरी सब्जियों की फसलों में इस कीट का भारी प्रभाव देखा जा रहा है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यह कीट फसलों के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। यह कीट पत्तियों के निचले हिस्से से रस चूसकर पौधों को अंदर से पूरी तरह कमजोर कर देता है। यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं पाया गया, तो यह न केवल कुछ पौधों को बल्कि पूरी की पूरी फसल को नष्ट करने की क्षमता रखती है।
सफेद मक्खी के लक्षण और पहचान कैसे करें
वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ राजीव सिंह के अनुसार, सफेद मक्खी की पहचान करना किसानों के लिए सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। किसान अपने खेतों में नियमित रूप से इन लक्षणों की निगरानी करें:
- पौधों की पत्तियों को पलटकर देखें, यदि नीचे की ओर छोटे सफेद रंग के कीट चिपके हुए दिखें तो सतर्क हो जाएं।
- पौधों को हल्का सा हिलाने पर यदि छोटी सफेद मक्खियां झुंड में उड़ती हुई नजर आएं, तो यह हमले का सीधा संकेत है।
- पत्तियों का धीरे-धीरे पीला पड़ना और पौधे की विकास दर में अचानक गिरावट आना।
- पत्तियों पर एक चिपचिपा पदार्थ जमा होना और उसके बाद उन पर काली फफूंद जैसी परत का विकसित होना।
डॉ राजीव सिंह ने स्पष्ट किया कि शुरुआत में यह कीट केवल कुछ ही पौधों पर दिखाई देता है, लेकिन अनुकूल मौसम मिलते ही यह पूरे खेत में फैल जाता है। विशेष रूप से जब वातावरण में नमी ज्यादा हो और तापमान कीट के अनुकूल बना हो, तब सफेद मक्खी अपनी संख्या को बहुत तेजी से बढ़ाती है।
खेत की निगरानी और सुरक्षा के तरीके
किसानों को सलाह दी गई है कि वे अपनी फसलों की सुरक्षा के लिए सक्रिय दृष्टिकोण अपनाएं। खेत की मेड़ और आसपास के क्षेत्रों में उगने वाली खरपतवार को समय-समय पर हटाते रहना चाहिए, क्योंकि ये कीट अक्सर इन्हीं वैकल्पिक पौधों पर पनपते हैं और वहां से मुख्य फसल पर हमला करते हैं। इसके अलावा, खेत में पीले स्टिकी ट्रैप (yellow sticky traps) का उपयोग करना एक कारगर उपाय है। ये ट्रैप न केवल मक्खी की उपस्थिति का सटीक पता लगाने में मदद करते हैं, बल्कि बड़ी संख्या में मक्खियों को फंसाकर उनकी आबादी को नियंत्रित रखने में भी सहायक होते हैं।
रासायनिक दवाओं का सही प्रयोग
यदि खेत में सफेद मक्खी का प्रकोप अधिक बढ़ गया है और वह नियंत्रण से बाहर दिख रही है, तो ऐसी स्थिति में रासायनिक उपचार ही एकमात्र विकल्प बचता है। डॉ राजीव सिंह ने जोर देकर कहा कि किसान विशेषज्ञों से परामर्श लेने के बाद ही दवाओं का छिड़काव करें। बचाव के लिए मुख्य रूप से इन दवाओं का उपयोग किया जा सकता है:
- इमिडाक्लोप्रिड
- थायोमेथॉक्साम
- एसिटामिप्रिड
- पायरीप्रोक्सीफेन
हालांकि, इन दवाओं का चयन करते समय पूरी सावधानी बरतनी आवश्यक है। दवा की सही मात्रा और छिड़काव करने का तरीका आपकी फसल की स्थिति और उपयोग किए जा रहे ब्रांड पर निर्भर करता है। किसानों को स्वयं ही दवा की मात्रा तय करने से बचना चाहिए। साथ ही, एक ही तरह की दवा का लगातार बार-बार छिड़काव करने से कीटों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो सकती है, इसलिए दवाओं को बदल-बदल कर उपयोग करना ही समझदारी है। नियमित निगरानी और सही समय पर लिए गए निर्णय ही खरीफ की इस फसल को सफेद मक्खी के जानलेवा हमले से बचा सकते हैं।
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