खेती में मिसाल बने सीताराम यादव
बिहार के जहानाबाद जिले के घोसी प्रखंड स्थित सोनवां गांव में एक ऐसे किसान रहते हैं, जिनकी मेहनत की चर्चा पूरे इलाके में है। 70 साल के सीताराम यादव आज भी अपनी उम्र को मात देकर खेतों में पसीना बहा रहे हैं। उनकी सादगी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वे शरीर पर कपड़े भी नहीं रखते, लेकिन उनके परिश्रम का फल यह है कि आज वे दो ट्रैक्टरों के मालिक हैं। उनकी पहचान केवल उनके खेती के तरीके से नहीं, बल्कि उनके अटूट जुनून से है।
16 से 18 घंटे का कड़ा परिश्रम
सीताराम यादव का जीवन पूरी तरह से खेतों और कुदाल के इर्द गिर्द घूमता है। वे अपने खेत में दिन के लगभग 16 से 18 घंटे बिताते हैं। इस उम्र में भी वे न केवल खेती का प्रबंधन करते हैं, बल्कि खुद ट्रैक्टर चलाकर जमीन की जुताई और अन्य महत्वपूर्ण कृषि कार्य भी करते हैं। उनके कंधों पर हमेशा एक गमछा और हाथ में कुदाल दिखाई देती है। उन्हें देखकर यह विश्वास करना मुश्किल होता है कि एक व्यक्ति इस उम्र के पड़ाव पर भी खेती के प्रति इतना समर्पित हो सकता है। जिला मुख्यालय से करीब 20 KM दूर स्थित उनके घर की आर्थिक स्थिति शुरुआती दिनों में काफी कमजोर थी, जिसके कारण उन्होंने खेती को ही अपने जीवन का आधार बनाने का निर्णय लिया था।
एक बीघा से 25 बीघा तक का सफर
सीताराम यादव के संघर्ष की कहानी एक बीघा जमीन से शुरू हुई थी। कम पढ़े लिखे होने के बावजूद उन्होंने खेती की बारीकियों को इतने अच्छे से सीखा कि आज वे अपनी और दूसरों की जमीन मिलाकर कुल 25 बीघा में खेती कर रहे हैं। उनका कहना है कि उन्होंने कृषि को केवल कमाई का साधन नहीं, बल्कि प्रेम और जुनून के रूप में अपनाया है। उनके अनुसार, वे घर पर बमुश्किल 5 से 6 घंटे बिताते हैं, जबकि बाकी का पूरा समय खेतों में गुजरता है। इस मेहनत की बदौलत ही आज उनके पास खेती के लिए 2 ट्रैक्टर उपलब्ध हैं।
खेती में बिता रहे जीवन
सीताराम यादव धान, गेहूं, सरसों, राय, मक्का और विभिन्न प्रकार की सब्जियां उगाते हैं। उनके परिवार में तीन बच्चे थे, जिनमें से एक का देहांत हो चुका है। शेष दो बच्चों से उन्हें सहयोग तो मिलता है, लेकिन पोती की शादी की जिम्मेदारी का बोझ उनके कंधों पर है। इसी जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए वे दिन-रात खेतों में पसीना बहा रहे हैं। वे बताते हैं कि काम के दौरान उन्हें न तो भूख लगती है और न ही प्यास। उनकी दिनचर्या ऐसी है कि वे कई बार रातें भी खेतों में ही गुजार देते हैं और अब उन्हें किसी भी प्रकार का डर या भय नहीं लगता है।
सीताराम यादव का अनुभव
अपनी जीवनशैली के बारे में बात करते हुए वे कहते हैं कि खेती से उन्हें जो लगाव है, वही आज उनकी पहचान बना है। उनका मानना है कि अगर मन में जुनून हो तो उम्र कोई बाधा नहीं बनती। वे आज भी पूरी तन्मयता के साथ खेत में उतरते हैं और अपनी फसलों की देखरेख करते हैं। उनके लिए खेत ही उनका सब कुछ है, और इसी के दम पर उन्होंने न केवल अपने परिवार का भरण-पोषण किया, बल्कि समाज के सामने एक प्रेरणादायक उदाहरण भी रखा है।
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