दरभंगा में धान की फसल पर मंडराया संकट, बौनापन रोग से 80 फीसदी तक पैदावार घटने का डर

दरभंगा के धान खेतों में पौधों के बौने रह जाने की समस्या देखी गई है, जो फसलों की पैदावार में 80 प्रतिशत तक की बड़ी गिरावट का कारण बन सकती है। कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को सतर्क रहने और सही पहचान कर तुरंत उपचार करने की सलाह दी है।

दरभंगा के किसानों के लिए चिंता का विषय

बिहार के दरभंगा जिले में इस बार धान की खेती करने वाले किसान एक नई और गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। खेतों में धान के पौधे सामान्य तरीके से बढ़ने के बजाय बौने रह जा रहे हैं, जिसने कृषि विभाग और किसानों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो फसल की कुल उपज में 30 से 80 प्रतिशत तक की भारी कमी आ सकती है।

वायरस और कीट का खतरा

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के पादप रोग विज्ञान एवं सूत्रकृमि विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. एस.के. सिंह के अनुसार, धान के पौधों में यह बौनापन SRBSDV वायरस के संक्रमण के कारण हो सकता है। यह खतरनाक वायरस मुख्य रूप से सफेद पीठ वाला प्लांट हॉपर नामक कीट के जरिए फैलता है। हालांकि, बिहार में अभी तक इस वायरस की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में पहले ही इस वायरस के मामले देखे जा चुके हैं। इसे देखते हुए दरभंगा के किसानों को अत्यधिक सावधानी बरतने की सलाह दी गई है।

बौनापन रोग की पहचान कैसे करें

किसान अपने खेतों में इन प्रमुख लक्षणों को देखकर समस्या की पहचान कर सकते हैं:

  • धान के पौधे अपनी सामान्य लंबाई हासिल नहीं कर पाते और ठिगने या बौने रह जाते हैं।
  • पौधों में टिलर बहुत ज्यादा निकलते हैं, लेकिन वे बेहद कमजोर होते हैं।
  • पौधे की पत्तियां गहरे हरे रंग की, मोटी और बिल्कुल सीधी खड़ी नजर आती हैं।
  • जड़ों का विकास सही ढंग से नहीं हो पाता है, जिससे पूरा पौधा कमजोर हो जाता है।
  • पौधों में बालियां या तो बहुत छोटी निकलती हैं या फिर निकलती ही नहीं हैं, जिससे दानों का भराव नहीं हो पाता।
  • खेतों में प्रभावित पौधे अलग से गुच्छों के रूप में दिखाई देते हैं।

गलत पहचान और खाद का प्रयोग

डॉ. एस.के. सिंह ने चेतावनी दी है कि कई बार किसान इस समस्या को पोषक तत्वों की कमी समझ लेते हैं। वे इसे जिंक या यूरिया की कमी मानकर खेतों में बिना सोचे-समझे खाद का छिड़काव करने लगते हैं, जिसका कोई फायदा नहीं होता क्योंकि जड़ में तो वायरस होता है। इसलिए, लक्षण दिखते ही खाद के बजाय विशेषज्ञ से परामर्श करना ही सही निर्णय है।

फसल बचाने के लिए सुझाव

इस संकट से निपटने के लिए कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को कुछ महत्वपूर्ण उपाय सुझाए हैं:

  • खेत की सफाई: अपने खेत और आसपास की मेड़ों पर उगे खरपतवारों को तुरंत साफ करें, क्योंकि प्लांट हॉपर इन्हीं खरपतवारों में छिपकर पनपते हैं।
  • संक्रमित पौधों को हटाना: यदि रोपाई के बाद कोई पौधा असामान्य रूप से छोटा या बौना दिखे, तो उसे जड़ समेत उखाड़कर खेत से बाहर निकालकर नष्ट कर दें।
  • कीटों की निगरानी: हर सप्ताह कम से कम 4-5 स्थानों पर पौधों के निचले हिस्से को हल्का झुकाकर 2-3 बार थपथपाएं। यदि पानी पर सफेद रंग के छोटे कीट तैरते दिखें, तो यह नियंत्रण का समय है।
  • रासायनिक उपचार: जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञों की राय लेकर ट्राइफ्लूमेजोपाइरिम 10 SC 235 मि.ली./हेक्टेयर या डाइनोटेफ्यूरान 20 SG 200 ग्राम/हेक्टेयर का छिड़काव पौधों के आधार (जड़ के पास) पर करें। छिड़काव के 10-14 दिन बाद दोबारा निगरानी जरूर करें।
  • संतुलित पोषण: फसलों को संतुलित खाद दें और यूरिया का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल करने से बचें।

https://hindi.news18.com/news/agriculture/paddy-rice-plants-dwarfism-disease-causes-diagnosis-home-natural-remedies-farmers-alert-risk-yield-drop-local18-10731838.html