5 एकड़ में करते थे तंबाकू की खेती, अब समाज से नशा मिटा रहे राजेंद्र राय

बिहार के शिवहर जिले के एक डाकपाल ने अध्यात्म का रास्ता अपनाकर न केवल अपनी बुरी आदतें छोड़ीं, बल्कि 100 से अधिक लोगों को भी नशामुक्त बनाया है।

अध्यात्म से मिली नई जीवन दिशा

बिहार के शिवहर जिले के कस्तूरिया गांव में रहने वाले 63 वर्षीय शाखा डाकपाल राजेंद्र राय आज समाज के लिए एक प्रेरणा का स्रोत बन गए हैं। एक समय ऐसा था जब उनका पूरा जीवन तंबाकू के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ था। वे न केवल 5 एकड़ की विशाल भूमि पर तंबाकू की खेती किया करते थे, बल्कि स्वयं भी इसका सेवन करने के आदी थे। तंबाकू उस समय उनके परिवार की आजीविका का प्राथमिक साधन हुआ करता था। हालांकि, समय के साथ उनके विचारों में बड़ा परिवर्तन आया और उन्होंने एक अलग रास्ता चुना।

जीवन बदलने वाला मोड़

राजेंद्र राय का जीवन तब पूरी तरह से बदल गया जब उनका परिचय ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय से हुआ। वहां जाकर उन्होंने राजयोग मेडिटेशन सीखा, जिससे उनके सोचने के तरीके में बड़ा बदलाव आया। आत्मज्ञान प्राप्त करने के बाद उन्हें यह अहसास हुआ कि तंबाकू का उत्पादन करना और उसे बेचना दूसरों को पीड़ा पहुंचाने वाला कर्म है। इस आंतरिक जागृति ने उन्हें मजबूर किया कि वे तंबाकू की खेती को हमेशा के लिए त्याग दें। उन्होंने न केवल खेती बंद की, बल्कि खुद भी हर तरह के नशे से पूरी तरह दूरी बना ली।

100 से अधिक लोगों की बदली जिंदगी

आध्यात्मिक मार्ग पर चलने की शुरुआत उन्होंने वर्ष 2010-11 में की थी। सबसे पहले उन्होंने अपने स्वयं के घर को नशामुक्त करने का बीड़ा उठाया। उनके परिवार में जितने भी सदस्य गुटखा, खैनी, बीड़ी या सिगरेट का सेवन करते थे, उन सभी ने इस लत को जड़ से उखाड़ फेंका। आज उनके परिवार का कोई भी सदस्य किसी भी प्रकार के नशे का सेवन नहीं करता है। घर को सुधारने के बाद उन्होंने अपने गांव और आसपास के इलाकों में जागरूकता अभियान चलाया। राजेंद्र राय की तार्किक बातों और व्यवहार से प्रभावित होकर अब तक 100 से अधिक लोगों ने तंबाकू और गुटखा छोड़ दिया है।

बीमारियों को निमंत्रण देने से रोकने की सीख

राजेंद्र राय लोगों को नशे की लत से बाहर निकालने के लिए बेहद सरल लेकिन गहरा तर्क देते हैं। वे लोगों से अक्सर यह पूछते हैं कि जब हम अपने बच्चों की शादियों में मेहमानों को निमंत्रण भेजते हैं, तो वे खुशी से हमारे घर आते हैं। इसी तरह, तंबाकू और गुटखे के हर पैकेट पर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों की तस्वीरें छपी होती हैं और साफ लिखा होता है कि यह सेवन करना खतरनाक है। जब कोई व्यक्ति इसका सेवन करता है, तो वह अनजाने में बीमारियों को अपने शरीर में आने का निमंत्रण दे रहा होता है।

वे लोगों को आईना दिखाते हुए पूछते हैं कि क्या उन्हें वाकई बीमारियां चाहिए। स्वाभाविक रूप से हर कोई इनकार करता है। तब वे समझाते हैं कि यदि आपको बीमारी नहीं चाहिए, तो उन बीमारियों को घर बुलाना बंद करना होगा, यानी नशा छोड़ना ही एकमात्र रास्ता है।

आर्थिक चिंता को दरकिनार कर चुना बेहतर मार्ग

कस्तूरिया गांव में तंबाकू की खेती का लंबा इतिहास रहा है और आज भी वहां किसान इसे बड़े पैमाने पर उगाते हैं। लेकिन राजेंद्र राय ने अपनी आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना इस गलत काम को छोड़ना ही बेहतर समझा। डाकघर में अपनी सरकारी सेवा के साथ-साथ, वे अब एक समाज सुधारक के रूप में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। चाहे बस की यात्रा हो या सरकारी दफ्तरों में मुलाकात, वे किसी भी अनजान व्यक्ति को नशे के दुष्परिणाम समझाकर उसे सही रास्ते पर लाने का प्रयास करते हैं। उनकी यह पहल समाज को नशामुक्त करने के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण पेश करती है।

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