FCRA कानून पर अमेरिकी दखलंदाजी पर भड़का भारत, विदेश मंत्रालय ने दो टूक कहा- यह हमारा अंदरूनी मामला

विदेशी अंशदान विनियमन कानून यानी FCRA में संशोधन को लेकर अमेरिका की तरफ से हो रही बयानबाजी पर भारत सरकार ने कड़ा रुख अपनाया है। विदेश मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि भारत की विधायी प्रक्रियाएं पूरी तरह संप्रभु हैं और इस पर कोई भी निर्णय केवल भारतीय संसद ही लेगी।

भारत ने अमेरिका को दी सख्त नसीहत

विदेशी अंशदान विनियमन कानून यानी FCRA को लेकर अमेरिका की ओर से की जा रही टिप्पणियों पर भारत ने कड़ा एतराज जताया है। विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक स्पष्ट और कड़े बयान में कहा है कि भारत के आंतरिक विधायी मामलों में किसी भी बाहरी देश का हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने अमेरिकी नेताओं को स्पष्ट किया कि भारत के कानूनों में बदलाव और उन पर फैसला लेने का एकमात्र अधिकार भारतीय संसद के पास है।

संसद की सर्वोच्चता पर जोर

रणधीर जायसवाल ने मीडिया के साथ बातचीत करते हुए कहा कि भारत एक जीवंत लोकतंत्र है जहाँ नियम और कानून देश की जरूरतों के हिसाब से तय किए जाते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत की विधायी प्रक्रियाएं पूरी तरह से संप्रभु हैं और इसके तहत कोई भी संशोधन या निर्णय देश की संसद के दायरे में आता है। मंत्रालय का यह बयान तब आया है जब अमेरिकी नेताओं ने FCRA के प्रावधानों को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर की थीं, जिसे भारत ने सीधे तौर पर खारिज कर दिया है।

भारत का रुख स्पष्ट

विदेश मंत्रालय ने यह साफ संदेश दिया है कि भारतीय कानूनों को लेकर किसी भी प्रकार की बाहरी राय का कोई मतलब नहीं है। भारत सरकार यह मानती है कि देश के हित में जो भी कानून बनाने या बदलने की आवश्यकता होती है, वह लोकतांत्रिक तरीके से संसद के भीतर चर्चा और मतदान के बाद ही होता है। FCRA कानून का मुख्य उद्देश्य भारत में आने वाली विदेशी फंडिंग की निगरानी करना है ताकि देश की सुरक्षा और संप्रभुता पर कोई आंच न आए। इस दिशा में सरकार जो भी कदम उठाती है, वह राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखकर उठाए जाते हैं।

क्या है FCRA विवाद

FCRA यानी विदेशी अंशदान विनियमन कानून वह कानून है जिसके तहत भारत में काम करने वाली संस्थाओं और गैर सरकारी संगठनों को मिलने वाली विदेशी आर्थिक सहायता का नियमन किया जाता है। हाल के समय में सरकार ने इस कानून के अनुपालन को लेकर कड़े नियम लागू किए हैं, ताकि फंडिंग का पारदर्शी इस्तेमाल सुनिश्चित हो सके। हालांकि, इस प्रक्रिया के दौरान कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी, जिस पर अमेरिका जैसे देशों ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी थी।

भारत की विदेश नीति और संप्रभुता

विदेश मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यह रुख उसकी स्वतंत्र विदेश नीति का हिस्सा है। रणधीर जायसवाल का यह बयान इस बात का संकेत है कि अब भारत अपने घरेलू मामलों में किसी भी विदेशी दबाव को बर्दाश्त नहीं करेगा। यह पहला मौका नहीं है जब भारत ने अपनी विधायी स्वतंत्रता का मजबूती से बचाव किया है। पहले भी कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत ने यह स्पष्ट किया है कि भारत की आंतरिक राजनीति और कानून-निर्माण की प्रक्रिया पर केवल भारतीय जनता और उनके प्रतिनिधि ही निर्णय ले सकते हैं।

निष्कर्ष

विदेश मंत्रालय द्वारा दी गई यह नसीहत अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। यह दिखाता है कि भारत अब वैश्विक मंच पर अपनी बात को बिना किसी हिचकिचाहट के रखने में सक्षम है। FCRA से जुड़े इन नियमों को लेकर सरकार का स्टैंड अडिग है और मंत्रालय की ओर से स्पष्ट कर दिया गया है कि इस विषय पर आगे की किसी भी चर्चा या निर्णय की जिम्मेदारी केवल भारतीय संसद की है, न कि किसी बाहरी शक्ति की।

https://www.indiatv.in/india/national/india-mea-responds-to-us-on-fcra-amendment-bill-randhir-jaiswal-internal-affair-parliament-2026-08-07-1235935