समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का चुनावी गणित
आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। हालिया कार्यक्रम कॉफी पर कुरुक्षेत्र में विश्लेषकों ने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच बनने वाले संभावित गठबंधन पर मंथन किया। इस चर्चा के दौरान यह संकेत मिले कि दोनों दल 2017 के विधानसभा चुनाव वाले सीट शेयरिंग फॉर्मूले को दोहराने पर विचार कर रहे हैं। गौरतलब है कि 2017 में कांग्रेस ने 114 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, जबकि समाजवादी पार्टी ने 311 सीटों पर चुनाव लड़ा था। हालांकि, उस समय का परिणाम गठबंधन के लिए अनुकूल नहीं रहा था और उन्हें कुल 54 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था। वहीं, भारतीय जनता पार्टी ने उस चुनाव में 312 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत हासिल करके सरकार बनाई थी।
अखिलेश यादव की ब्राह्मण कार्ड पर नजर
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव 2027 के चुनाव में अपनी जीत पक्की करने के लिए विपक्ष के लिए अनुकूल माहौल तैयार करने में जुटे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि NEET परीक्षा विवाद और विभिन्न वर्गों की कथित नाराजगी जैसे मुद्दों को विपक्ष बीजेपी के खिलाफ एक हथियार के रूप में उपयोग करना चाहता है। इसी कवायद में अखिलेश यादव ने PDA की नई परिभाषा देते हुए 'P' का अर्थ पंडित यानी ब्राह्मण से जोड़ा है। हालांकि, पैनल में मौजूद विशेषज्ञों ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी और कहा कि ब्राह्मणों को साधने के लिए विकास दुबे जैसे गैंगस्टर का उदाहरण देना राजनीतिक रूप से नुकसानदेह हो सकता है, क्योंकि इससे जनता में गलत संदेश जाता है। चर्चा में यह भी रेखांकित किया गया कि समाजवादी पार्टी भले ही PDA की राजनीति कर रही हो, लेकिन जमीनी स्तर पर दलितों और पिछड़ों के बीच का आपसी तालमेल अभी भी एक बड़ा सवाल है। इसके अलावा, बीजेपी कानून-व्यवस्था के मुद्दे को अपना मुख्य आधार बनाए रखेगी, जो समाजवादी पार्टी के लिए चुनौती भरा हो सकता है।
महिला सुरक्षा और सरकारी योजनाएं
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार की कानून-व्यवस्था नीति को महिलाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दा माना जा रहा है। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि राज्य में महिलाओं की सुरक्षा का माहौल सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जाता है। चर्चा के दौरान यह भी सामने आया कि सरकार बिहार और अन्य राज्यों की तर्ज पर महिलाओं के लिए एक बड़ी लाभार्थी योजना लाने की तैयारी कर रही है। सरकार के पास लगभग 4 करोड़ महिलाओं का डेटा मौजूद है, जो आने वाले समय में चुनावी समीकरणों को पूरी तरह से बदलने की ताकत रखता है।
राम मंदिर और हिंदुत्व की सियासत
शो में राम मंदिर और उससे जुड़े धार्मिक विषयों पर भी विस्तार से चर्चा हुई। विशेषज्ञों का कहना है कि समाजवादी पार्टी राम मंदिर के मुद्दों को हवा देकर बीजेपी के हिंदुत्व एजेंडे को टक्कर देने की कोशिश में है, जबकि बीजेपी कानून-व्यवस्था और हिंदुत्व के मेल को अपनी राजनीतिक ताकत मानती है। संभल में हुई हिंसा और अतीक अहमद व मुख्तार अंसारी जैसे माफियाओं पर हुई कार्रवाई का भी इस दौरान जिक्र किया गया।
FCRA संशोधन बिल का सच
कार्यक्रम के दौरान प्रस्तावित FCRA यानी विदेशी अंशदान विनियमन कानून में संशोधन को लेकर चल रही बहस पर भी प्रकाश डाला गया। वक्ताओं ने सरकारी पक्ष रखते हुए कहा कि यह बिल किसी विशेष धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं है। इसका मुख्य उद्देश्य विदेशी फंडिंग की निगरानी को पुख्ता करना और पारदर्शिता लाना है ताकि धन का दुरुपयोग न हो। नए प्रावधानों के तहत विदेशी चंदा उसी कार्य के लिए इस्तेमाल होना अनिवार्य होगा जिसके लिए वह प्राप्त हुआ है। साथ ही प्रशासनिक खर्च की सीमा तय करने और सभी FCRA खातों को एक ही बैंक शाखा से जोड़ने की बात भी कही गई है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी संस्थान का लाइसेंस रद्द होता है तो उसकी संपत्ति एक नामित प्राधिकरण के पास रहेगी, जिसे लाइसेंस बहाल होने पर लौटाया जा सकता है। कुछ ईसाई संगठनों की चिंताओं पर सरकार ने सकारात्मक रुख अपनाते हुए कहा कि सुझावों पर विचार संभव है।
सोशल मीडिया की बढ़ती भूमिका
अंत में, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, मेटा की नीतियों और विदेशी प्रभाव जैसे विषयों पर भी चर्चा हुई। विश्लेषकों का मानना है कि आज सोशल मीडिया राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने का सबसे शक्तिशाली जरिया बन चुका है, लेकिन इसकी निष्पक्षता और कंटेंट की सत्यता को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं।
https://www.indiatv.in/india/politics/coffee-par-kurukshetra-which-way-brahmins-will-go-in-up-election-2027-politics-heats-up-over-fcra-bill-watch-full-discussion-2026-08-06-1235773