खेती में बेहतर मुनाफे का विकल्प
बिहार समेत देश के कई हिस्सों में किसान अब अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए नई रणनीतियों पर काम कर रहे हैं। यदि आप खरीफ सीजन के दौरान कम लागत में ज्यादा मुनाफा देने वाली फसल की तलाश में हैं, तो अरहर की खेती आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प हो सकती है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, वर्तमान समय अरहर की बुआई के लिए सबसे उपयुक्त है। यदि किसान वैज्ञानिक तरीकों को अपनाते हैं, तो वे न केवल फसल का बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं, बल्कि अपनी आर्थिक स्थिति में भी बड़ा सुधार ला सकते हैं। अरहर सिर्फ एक दलहनी फसल नहीं है, बल्कि यह मिट्टी की उर्वरक क्षमता को प्राकृतिक तरीके से बढ़ाने का काम भी करती है। किसान भाई धान और गेहूं के पारंपरिक चक्र से हटकर अरहर को शामिल करके अपनी आय को बढ़ा सकते हैं।
पूसा के विशेषज्ञों की राय
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के अंतर्गत आने वाले कृषि विज्ञान केंद्र, बिरौली की विशेषज्ञ भारती उपाध्याय ने अरहर की खेती के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला है। उन्होंने बताया कि भारत में लगभग 25 लाख हेक्टेयर भूमि पर अरहर की खेती की जाती है। यह बिहार और उत्तर प्रदेश में उगाई जाने वाली प्रमुख दलहनी फसलों में से एक है। अरहर की जड़ें काफी गहराई तक जाती हैं, जिसके चलते यह जमीन की निचली परतों से भी नमी सोखने में सक्षम होती है। यही कारण है कि जिन क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधा कम है, वहां भी यह फसल अच्छी पैदावार देने का दम रखती है। लंबे समय तक धान-गेहूं की खेती करने से मिट्टी की सेहत पर बुरा असर पड़ता है। अरहर की खेती मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाती है और लाभकारी सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या में वृद्धि करती है, जिससे भूमि की उर्वरकता वापस लौट आती है।
उन्नत किस्में और बुआई का सही समय
विशेषज्ञों ने किसानों को अरहर की कुछ चुनिंदा उन्नत किस्मों के चयन की सलाह दी है। इनमें राजेंद्र अरहर-1, राजेंद्र अरहर-2, नरेंद्र अरहर-1, नरेंद्र अरहर-2 और पूसा-9 जैसी किस्में शामिल हैं। जुलाई का महीना अरहर की बुआई के लिए सबसे अनुकूल माना जाता है।
बुआई के वैज्ञानिक मानक
खेती से अधिकतम उपज लेने के लिए कुछ तकनीकी बातों का ध्यान रखना बेहद आवश्यक है:
- बीज की मात्रा: प्रति हेक्टेयर 20 किलोग्राम बीज की दर पर्याप्त मानी गई है।
- बीज उपचार: बुआई से पहले प्रति किलोग्राम बीज को 4 से 5 ग्राम ट्राइकोडर्मा के साथ उपचारित जरूर करें। यह प्रक्रिया फसल को शुरुआती रोगों से सुरक्षित रखने में मदद करती है।
- दूरी का प्रबंधन: बुआई के समय कतार से कतार की दूरी 50 से 75 सेंटीमीटर तथा पौधे से पौधे के बीच की दूरी 10 से 20 सेंटीमीटर के बीच होनी चाहिए।
- मिट्टी का चयन: अच्छी जल निकासी वाली हल्की दोमट मिट्टी और 6.5 से 8 पीएच मान वाली भूमि इस फसल के लिए सबसे उपयुक्त होती है।
उर्वरक और रोग प्रबंधन
फसल की उत्पादकता पर खरपतवार, रोग और कीटों का सीधा असर पड़ता है। इनसे बचाव के लिए बुआई के 15 से 20 दिन के भीतर विशेषज्ञ द्वारा अनुशंसित इमाजेथापायर का छिड़काव करना फायदेमंद होता है। उर्वरकों का चयन मिट्टी की जांच रिपोर्ट के आधार पर करना सबसे सही रहता है। सामान्य तौर पर, प्रति हेक्टेयर 20 किलोग्राम नत्रजन, 45 किलोग्राम फॉस्फोरस और 20 किलोग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, जिन क्षेत्रों में जिंक और सल्फर की कमी पाई जाती है, वहां 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर के प्रयोग से बेहतर परिणाम मिलते हैं।
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