बिहार सूचना आयोग का बड़ा एक्शन, आरटीआई का जवाब टालने वाले सीतामढ़ी के अधिकारी पर लगा जुर्माना

सूचना का अधिकार अधिनियम की अनदेखी करने वाले सीतामढ़ी के जिला प्रबंधक पर बिहार राज्य सूचना आयोग ने कड़ी कार्रवाई करते हुए पच्चीस हजार रुपये का दंड लगाया है।

सूचना का अधिकार कानून की खुलेआम अनदेखी

सूचना का अधिकार यानी आरटीआई भारत के प्रत्येक नागरिक को एक अत्यंत शक्तिशाली औजार प्रदान करता है। इस कानून के माध्यम से कोई भी जागरूक नागरिक सरकारी विभागों से उनसे जुड़ी जानकारी मांग सकता है। नियम यह है कि संबंधित विभाग को तय समय सीमा के भीतर आवेदक को जानकारी मुहैया करानी होती है। इसके बावजूद, कई सरकारी दफ्तरों में नागरिकों को समय पर जवाब न देने या अधूरी जानकारी देकर गुमराह करने की घटनाएं आम हो गई हैं। हाल ही में बिहार के सीतामढ़ी जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है, जहां आरटीआई के तहत मांगी गई सूचना को लंबे समय तक दबाकर रखने वाले अधिकारी पर राज्य सूचना आयोग ने कड़ा रुख अपनाया है।

क्या है पूरा मामला

सीतामढ़ी जिले के नानपुर थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले नौवाड़ीह गांव के निवासी मिट्टु कुमार ने सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के तहत एक आवेदन दाखिल किया था। इस आवेदन में उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण विभागीय जानकारियां मांगी थीं। आरटीआई कानून के तहत एक निश्चित समयावधि तय होती है, जिसके भीतर संबंधित कार्यालय को जवाब देना होता है। लेकिन इस मामले में आवेदन के बाद निर्धारित समय सीमा पूरी तरह से बीत गई और आवेदक को कोई भी संतोषजनक जवाब प्राप्त नहीं हुआ। अपनी आरटीआई अर्जी पर किसी प्रकार की प्रतिक्रिया न मिलने और प्रशासनिक उपेक्षा का सामना करने के बाद, मिट्टु कुमार ने बिहार राज्य सूचना आयोग के समक्ष द्वितीय अपील दायर करने का निर्णय लिया।

राज्य सूचना आयोग की कड़ी कार्रवाई

इस मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सूचना आयुक्त प्रकाश कुमार ने पूरे घटनाक्रम और फाइलों का बारीकी से अवलोकन किया। आयोग ने पाया कि सीतामढ़ी स्थित राज्य खाद्य निगम के लोक सूचना पदाधिकारी-सह-जिला प्रबंधक संतोष कुमार ने अपने कर्तव्य का निर्वहन करने में भारी लापरवाही बरती है। जांच में स्पष्ट हुआ कि अधिकारी ने कानूनी प्रक्रिया का न केवल उल्लंघन किया, बल्कि मामले को दो वर्षों तक लटकाए रखा। नियमों के अनुसार, यदि मांगी गई जानकारी किसी दूसरे कार्यालय के अधिकार क्षेत्र में आती है, तो लोक सूचना पदाधिकारी को पांच दिनों के भीतर उस आवेदन को संबंधित विभाग को हस्तांतरित करना अनिवार्य होता है। हालांकि, यहां संतोष कुमार ने आवेदन को जिला आपूर्ति पदाधिकारी के पास भेजने के लिए धारा 6(3) का उपयोग करते हुए दो साल की लंबी देरी की और आखिरकार तीन जुलाई 2026 को ही उसे स्थानांतरित किया।

अधिकारी पर लगा पच्चीस हजार रुपये का जुर्माना

आयोग के समक्ष सुनवाई के दौरान यह भी उजागर हुआ कि आवेदक द्वारा मांगी गई अन्य सूचनाएं भी अपील के दो साल बाद 12 मई 2026 को बहुत ही आधी-अधूरी स्थिति में दी गईं। आयोग द्वारा पूर्व में मांगे गए स्पष्टीकरण का भी अधिकारी कोई उचित जवाब नहीं दे सके। इन सभी तथ्यों को देखते हुए राज्य सूचना आयुक्त ने सख्त लहजे में टिप्पणी की कि जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी आरटीआई कानून के प्रति बिल्कुल भी गंभीर नहीं हैं और जानबूझकर सूचना छिपाने व विलंब करने की प्रवृत्ति दिखा रहे हैं। आयोग ने धारा 20(1) के तहत दोषी अधिकारी संतोष कुमार पर पच्चीस हजार रुपये का अर्थदंड अधिरोपित किया है। इस जुर्माने की वसूली के लिए आयोग ने सीतामढ़ी के जिलाधिकारी, कोषागार पदाधिकारी और पटना स्थित महालेखाकार कार्यालय को आदेश भेज दिए हैं।

आवेदक की प्रतिक्रिया और प्रशासन को संदेश

इस फैसले के बाद पीड़ित मिट्टु कुमार ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि सीतामढ़ी का जिला प्रशासन आरटीआई कानून और पारदर्शी कार्यप्रणाली के प्रति कतई संवेदनशील नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि स्थानीय स्तर पर प्रशासन अपनी जिम्मेदारी को लेकर जागरूक होता, तो एक आम नागरिक को अपने मूलभूत अधिकारों के लिए वर्षों तक राज्य सूचना आयोग के चक्कर नहीं लगाने पड़ते। सीतामढ़ी में आरटीआई आवेदनों को लटकाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर आयोग का यह कड़ा फैसला एक मिसाल बन गया है। आयोग ने जिला आपूर्ति पदाधिकारी को यह स्पष्ट निर्देश भी दिए हैं कि वे अविलंब आवेदक को वांछित सूचना उपलब्ध कराएं ताकि पीड़ित को न्याय मिल सके। उम्मीद है कि इस कठोर दंडात्मक कार्रवाई के बाद लापरवाह अधिकारियों की मनमानी पर रोक लगेगी और कानून का प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित हो पाएगा।

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