बिहार में सोशल मीडिया पर सरकार की सख्ती, आपत्तिजनक पोस्ट हटवाने का IG और DIG को मिला सीधा अधिकार

बिहार सरकार ने सोशल मीडिया पर भ्रामक और आपत्तिजनक कंटेंट पर लगाम लगाने के लिए बड़ा कदम उठाया है। अब राज्य के IG और DIG रैंक के अधिकारी सीधे टेक कंपनियों को निर्देश देकर विवादित पोस्ट को हटवा सकेंगे।

सोशल मीडिया के दुरुपयोग पर बिहार सरकार का बड़ा प्रहार

बिहार में इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर फैलने वाली अफवाहों, भ्रामक जानकारियों और सौहार्द बिगाड़ने वाले कंटेंट के खिलाफ नीतीश सरकार ने अपनी कार्रवाई तेज कर दी है। अब सोशल मीडिया पर कुछ भी पोस्ट करने से पहले सोचना होगा, क्योंकि राज्य सरकार ने साइबर अपराध पर नकेल कसने के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सख्त निर्णय लिया है। गृह विभाग ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 और IT Rules 2021 के प्रावधानों का इस्तेमाल करते हुए राज्य के सभी 14 पुलिस रेंज के IG और DIG अधिकारियों को विशेष अधिकार प्रदान कर दिए हैं। इन अधिकारियों को अब यह शक्ति मिल गई है कि वे फेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को सीधे नोटिस भेजकर किसी भी आपत्तिजनक पोस्ट या सामग्री को तुरंत हटाने का आदेश दे सकते हैं।

प्रक्रिया में बदलाव की आवश्यकता क्यों पड़ी?

अब तक सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली भड़काऊ या गलत खबरों को हटाने की प्रक्रिया बेहद धीमी और जटिल थी। पहले जिला स्तर की पुलिस को मामले की जांच करके अपनी रिपोर्ट पटना स्थित साइबर क्राइम एंड सिक्योरिटी यूनिट यानी CCSU को भेजनी पड़ती थी। इसके बाद CCSU संबंधित इंटरनेट कंपनियों से पत्राचार करती थी। इस पूरी कागजी प्रक्रिया में कई दिनों का समय बर्बाद हो जाता था, जिसका परिणाम यह होता था कि तब तक विवादित वीडियो या खबरें पूरे बिहार में आग की तरह फैल जाती थीं। इससे न केवल सामाजिक सद्भाव बिगड़ने का खतरा रहता था, बल्कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना भी चुनौतीपूर्ण हो जाता था। नई व्यवस्था के लागू होने से अब केवल कुछ ही घंटों के भीतर भ्रामक कंटेंट को इंटरनेट की दुनिया से मिटाना संभव हो सकेगा।

कार्यप्रणाली और निगरानी की व्यवस्था

गृह विभाग द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, राज्य के विभिन्न रेंज जैसे कि केंद्रीय (पटना), मगध, तिरहुत, मिथिला, पूर्णिया, सारण, शाहाबाद, चंपारण, कोसी, बेगूसराय, मुंगेर, भागलपुर के साथ-साथ रेल और कार्मिक रेंज के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी अब सीधे तौर पर टेक कंपनियों के साथ संवाद करेंगे। हालांकि, इस शक्ति के किसी भी संभावित दुरुपयोग को रोकने के लिए सरकार ने एक सुरक्षा तंत्र भी तैयार किया है। बिहार सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव को राज्य का नोडल अधिकारी नियुक्त किया गया है। जब भी किसी रेंज के IG या DIG के माध्यम से पोस्ट हटाने का नोटिस जारी किया जाएगा, तो उसकी एक प्रति अनिवार्य रूप से IT सचिव को भेजनी होगी। इससे राज्य स्तर पर पूरी कार्रवाई की पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सकेगी और मॉनिटरिंग आसान होगी।

राजनीतिक गलियारों में तीखी प्रतिक्रिया

इस फैसले के सार्वजनिक होते ही राज्य की राजनीति में घमासान मच गया है। पक्ष और विपक्ष के नेता इस मुद्दे पर दो खेमों में बंट गए हैं। बीजेपी के प्रवक्ता कुंतल कृष्णा ने सरकार के इस कदम का पुरजोर समर्थन किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि कोई उसका दुरुपयोग करे या दूसरों की गरिमा को ठेस पहुंचाए। उन्होंने आशा व्यक्त की है कि पुलिस अधिकारी कानून की सीमाओं के भीतर रहकर निष्पक्ष तरीके से अपनी शक्तियों का उपयोग करेंगे। वहीं, दूसरी ओर आरजेडी के प्रवक्ता एजाज अहमद ने इसे 'डिजिटल तानाशाही' का नाम दिया है। उनका कहना है कि सरकार अभद्र भाषा रोकने के नाम पर अपनी विफलताओं और भ्रष्टाचार के खिलाफ उठने वाली आवाजों को दबाना चाहती है। उन्होंने मांग की है कि यदि यह नियम निष्पक्ष है, तो इसका प्रयोग सबसे पहले उन मंत्रियों और नेताओं पर होना चाहिए जो सार्वजनिक रूप से अभद्र भाषा का प्रयोग करते हैं।

आम नागरिकों पर क्या होगा प्रभाव?

इस फैसले के बाद अब सामान्य इंटरनेट उपयोगकर्ताओं को सोशल मीडिया पर किसी भी जानकारी को साझा करने से पहले अत्यधिक सतर्क रहना होगा। असत्यापित खबरें, मॉर्फ्ड वीडियो या सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने वाले पोस्ट करने वालों पर अब बिना किसी प्रशासनिक देरी के त्वरित पुलिस कार्रवाई की जाएगी। यह कदम राज्य में साइबर सुरक्षा के लिहाज से एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।

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