गढ़चिरौली: भालू के हमले के बाद 18 किलोमीटर पैदल चले स्वास्थ्य कर्मी, स्ट्रेचर पर ढोकर बचाई युवक की जान

महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में मूसलाधार बारिश और दुर्गम रास्तों के बीच भालू के हमले से घायल युवक के लिए स्वास्थ्य विभाग की टीम फरिश्ता बनकर सामने आई, जिन्होंने मीलों पैदल चलकर उसे अस्पताल पहुंचाया।

गढ़चिरौली में मानवता की मिसाल

महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में स्वास्थ्य विभाग की टीम ने अपने साहस और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय देते हुए एक ऐसे युवक की जान बचाई, जिस पर भालू ने जानलेवा हमला कर दिया था। यह घटना उस वक्त की है जब भारी बारिश के चलते पूरा इलाका टापू बना हुआ था और संपर्क के सभी रास्ते टूट चुके थे। घायल युवक ऐसी स्थिति में था कि वह खुद एक कदम भी चलने में असमर्थ था। ऐसी विषम परिस्थितियों में मेडिकल टीम ने हार नहीं मानी। टीम ने जंगल के भीतर जाकर न केवल युवक को प्राथमिक उपचार दिया, बल्कि पूरी रात उसके पास रहकर उसकी निगरानी की। अगले दिन सुबह मेडिकल टीम, आशा कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों ने एकजुट होकर 18 किलोमीटर लंबे दुर्गम रास्तों को पैदल तय किया और युवक को स्ट्रेचर पर उठाकर सुरक्षित अस्पताल तक पहुंचाया।

जंगल में हुआ भालू का हमला

यह मामला गढ़चिरौली के भामरागढ़ तालुका स्थित अत्यंत दुर्गम बिनागुंडा–दामणमार्का क्षेत्र का है। यह इलाका छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र की सीमा पर स्थित है। क्षेत्र में लगातार हो रही मूसलाधार बारिश के कारण नाले उफान पर थे और रास्ते पूरी तरह बंद हो चुके थे। इस दौरान 35 वर्षीय पोरिया गोगा तिम्मा, जो बिनागुंडा के निवासी हैं, अपनी बहन से मिलने के लिए दामणमार्का गांव की ओर पैदल जा रहे थे। तभी अचानक जंगल में से एक भालू ने उन पर हमला कर दिया। इस हमले में युवक के दोनों पैरों में बहुत गहरी चोटें आईं, जिसके कारण वह जंगल में ही असहाय स्थिति में फंस गया था।

मुश्किल हालातों में दिखाई हिम्मत

जैसे ही इस घटना की जानकारी स्वास्थ्य विभाग को मिली, बिनागुंडा उपकेंद्र की स्वास्थ्य सेविका अश्विनी सहारे, स्वास्थ्य सेवक रामटेके और आशा कार्यकर्ताओं की एक टीम ने बिना किसी देरी के घटनास्थल की ओर कूच किया। रास्ते बहुत खराब थे और मौसम लगातार चुनौतीपूर्ण बना हुआ था, लेकिन टीम ने किसी तरह रात के अंधेरे में ही घायल तक पहुंच बनाई। वहां पहुँचकर उन्होंने तुरंत पोरिया गोगा तिम्मा को प्राथमिक उपचार दिया ताकि उनकी स्थिति स्थिर हो सके। अगली सुबह जब रेस्क्यू शुरू हुआ, तो टीम ने फोल्डेबल स्ट्रेचर का सहारा लिया। घने जंगल, फिसलन भरे कीचड़ और बाढ़ के पानी के बीच करीब 18 किलोमीटर तक स्ट्रेचर को कंधों पर ढोना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था, लेकिन टीम के हौसले के सामने ये मुश्किलें छोटी पड़ गईं।

अस्पताल तक पहुंचाने का साहसी सफर

गुंडेनूर नाले के पास पहुंचने पर स्थिति और भी कठिन हो गई, क्योंकि वहां पानी का बहाव बहुत तेज था और किसी भी वाहन का पहुंचना असंभव था। स्वास्थ्य कर्मियों और ग्रामीणों ने अपनी जान जोखिम में डालकर बहते पानी के बीच से युवक को सुरक्षित बाहर निकाला। इसके बाद उसे एंबुलेंस की मदद से लाहेरी के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया गया। वहां से बेहतर इलाज के लिए उन्हें भामरागढ़ के ग्रामीण अस्पताल में रेफर कर दिया गया, जहां उनका उचित उपचार चल रहा है।

एक अनुकरणीय अभियान

भामरागढ़ मुख्यालय से लगभग 36 किलोमीटर दूर स्थित अबूझमाड़ का यह इलाका हमेशा से अपनी भौगोलिक कठिनाइयों के लिए जाना जाता है। वहां न तो संचार सुविधाएं ठीक हैं और न ही पक्के रास्ते। ऐसी जगह पर स्वास्थ्य टीम का यह रेस्क्यू ऑपरेशन वाकई एक बड़ी मिसाल है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि स्वास्थ्य कर्मियों और ग्रामीणों ने मिलकर यह तत्परता नहीं दिखाई होती, तो घायल युवक का बचना लगभग नामुमकिन था। सामूहिक प्रयासों के कारण एक परिवार को बहुत बड़े दुख से बचा लिया गया है और स्वास्थ्य विभाग की इस कार्यशैली की हर तरफ प्रशंसा हो रही है।

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