पितृपक्ष 2026: कब से शुरू हो रहा है श्राद्ध का महापर्व, गया जी में पिंडदान का महत्व और पूरी जानकारी

सनातन धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व है, जहां श्रद्धालु अपने पूर्वजों की शांति के लिए गया जी में पिंडदान करते हैं। इस साल 27 सितंबर से 16 दिनों तक चलने वाला यह पवित्र अनुष्ठान शुरू होगा।

पितृपक्ष का धार्मिक महत्व

सनातन परंपरा में पितरों के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा अर्पित करने के लिए पितृपक्ष का समय सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। यह पवित्र काल भाद्रपद पूर्णिमा के ठीक बाद आरंभ होता है और आश्विन अमावस्या तक कुल 16 दिनों की अवधि तक चलता है। इसे श्राद्ध पक्ष या महालय पक्ष के नामों से भी जाना जाता है। इस दौरान लोग अपने दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की तृप्ति और शांति के लिए विशेष श्राद्ध कर्म, तर्पण और पिंडदान की विधियाँ पूरी करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन दिनों में पितरों का आशीर्वाद लेने से घर-परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है, साथ ही संतानों के जीवन में भी उन्नति के मार्ग प्रशस्त होते हैं।

गया जी में पिंडदान की महिमा

बिहार की प्राचीन धार्मिक नगरी गया जी को पूरे विश्व में पिंडदान के लिए सबसे उपयुक्त और पवित्र स्थल माना गया है। ऐसी मान्यता है कि गया की पवित्र भूमि पर किए गए पिंडदान से पितरों को सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही वजह है कि पितृपक्ष के दौरान भारत के कोने-कोने से ही नहीं, बल्कि नेपाल, रूस, यूक्रेन और दुनिया भर के कई अन्य देशों से श्रद्धालु यहां जुटते हैं। गया जी में भगवान विष्णु स्वयं पितृदेव के रूप में विराजमान माने जाते हैं, जिसके कारण इस स्थान का आध्यात्मिक महत्व और अधिक बढ़ जाता है।

इस वर्ष कब है पितृपक्ष

वर्ष 2026 में पितृपक्ष यानी श्राद्ध पक्ष की शुरुआत 27 सितंबर से होने जा रही है। 16 दिनों तक चलने वाले इस अनुष्ठान का समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के दिन होगा। गया जी विष्णुपद क्षेत्र स्थित रामानुज मठ के मठाधीश जगद्गुरु स्वामी वेंकटेश प्रपन्नाचार्य जी महाराज के अनुसार, इन तिथियों के बीच देश-विदेश से श्रद्धालु अपने पूर्वजों के तर्पण के लिए पहुंचेंगे। उनके अनुसार, गया जी में पिंडदान करने से व्यक्ति पितृऋण से पूरी तरह मुक्त हो जाता है, क्योंकि यहां की गई तर्पण विधि के बाद कुछ भी शेष नहीं रह जाता है।

फल्गु नदी और विष्णुपद मंदिर का महत्व

पितृपक्ष के दौरान गया जी में बहने वाली फल्गु नदी की विशेष महत्ता है। परंपरा के अनुसार, श्रद्धालु सबसे पहले फल्गु नदी के जल में स्नान करते हैं और फिर तर्पण व पिंडदान की प्रक्रिया को संपन्न करते हैं। पौराणिक कथाओं में उल्लेख मिलता है कि माता सीता ने इसी नदी के पावन तट पर महाराज दशरथ का पिंडदान किया था, जिसके बाद से इस नदी की पवित्रता और अधिक मानी जाती है। वहीं, विष्णुपद मंदिर में भगवान विष्णु के चरणचिह्न स्थापित हैं। पिंडदान पूर्ण करने के बाद श्रद्धालु मंदिर में जाकर दर्शन करते हैं और विष्णु भगवान से अपने पितरों की मुक्ति और परिवार की खुशहाली के लिए प्रार्थना करते हैं।

प्रशासनिक व्यवस्था और तैयारियां

हर साल पितृपक्ष के अवसर पर गया जी में एक विशाल मेले का आयोजन होता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आगमन को देखते हुए जिला प्रशासन और विभिन्न धार्मिक संस्थाओं द्वारा व्यापक इंतजाम किए जाते हैं। श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो, इसके लिए स्वास्थ्य सेवाएं, परिवहन, आवास, सुरक्षा और स्वच्छता के पुख्ता प्रबंध किए जाते हैं। प्रशासन द्वारा जगह-जगह मार्गदर्शन केंद्र भी बनाए जाते हैं ताकि बाहर से आने वाले लोगों को किसी भी प्रकार की कठिनाई का सामना न करना पड़े।

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