राजनांदगांव की नई पहचान बनीं ज्ञानेश्वरी
छत्तीसगढ़ का राजनांदगांव जिला अब तक हॉकी की नर्सरी के रूप में अपनी धाक जमाए हुए था, लेकिन अब इस शहर को एक नई और गौरवशाली पहचान मिली है। यह पहचान है 23 वर्षीय वेटलिफ्टर ज्ञानेश्वरी यादव की। 27 जुलाई की शाम को जब ज्ञानेश्वरी ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 के मंच पर सिल्वर मेडल हासिल किया, तो पूरा देश खुशी से झूम उठा। इस जीत के साथ ही भारत के कुल पदकों की संख्या पांच तक पहुंच गई है। ज्ञानेश्वरी ने 53 किलोग्राम भार वर्ग में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए स्नैच में 88 किलो और क्लीन एंड जर्क में 111 किलो वजन उठाकर यह पदक अपने नाम किया। क्लीन एंड जर्क में उन्होंने अपना व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है।
गरीबी के साये से अंतरराष्ट्रीय मंच तक
ज्ञानेश्वरी यादव की यह कामयाबी जितनी प्रेरणादायक है, उनका अतीत उतना ही संघर्षपूर्ण रहा है। उनके पिता दीपक यादव, जो कभी अविभाजित मध्यप्रदेश के एक जाने-माने पहलवान हुआ करते थे, ने अपनी बेटी में खेल की आग देखी थी। हालांकि, घर की आर्थिक तंगी के कारण उन्हें कुश्ती छोड़कर इलेक्ट्रिशियन का काम करना पड़ा। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि महीने की कमाई महज 7 से 10 हजार रुपये के बीच सिमटी रहती थी। इस सीमित आय में बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च और एक एथलीट के लिए जरूरी विशेष डाइट का इंतजाम करना किसी बड़े चमत्कार से कम नहीं था। लेकिन पिता के हौसले ने कभी हार नहीं मानी।
साइकिल पर सवार होकर तय किया संघर्ष का रास्ता
बचपन में ज्ञानेश्वरी अपने पिता की उंगली पकड़कर अक्सर व्यायामशाला जाया करती थीं। भोड़िया गांव से राजनांदगांव तक का करीब आठ किलोमीटर का सफर ज्ञानेश्वरी और उनके पिता अक्सर साइकिल पर ही तय करते थे। यह वही 'जय भवानी व्यायामशाला' थी जहां ज्ञानेश्वरी के पिता खुद बॉडी बिल्डिंग का अभ्यास करते थे। पिता ने अपनी आंखों के सामने अपनी नन्हीं बेटी को बारबेल उठाते और पसीना बहाते देखा है। आज जब पिता टीवी पर अपनी बेटी को पदक ग्रहण करते देख रहे होंगे, तो उनके लिए यह किसी भावुक फिल्म के दृश्य जैसा रहा होगा।
साल 2017: एक निर्णायक मोड़
ज्ञानेश्वरी के जीवन में साल 2017 एक बड़े टर्निंग पॉइंट की तरह आया। दुर्ग में आयोजित राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीतकर उन्होंने पहली बार अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। इसी जीत ने यह साफ कर दिया था कि यह खिलाड़ी आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन करने की क्षमता रखती है। उनकी मेहनत रंग लाई और उन्हें आगे बढ़ने के बेहतर अवसर मिलने लगे।
मीराबाई चानू के बाद एक नई उम्मीद
वर्ष 2022 में भुवनेश्वर में आयोजित जूनियर महिला वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतने के बाद ज्ञानेश्वरी के करियर ने नई उड़ान भरी। इसके बाद उनका चयन पटियाला स्थित नेताजी सुभाष राष्ट्रीय खेल संस्थान की प्रतिष्ठित अकादमी के लिए हुआ। उसी साल उन्होंने कॉमनवेल्थ वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप के जूनियर और सीनियर दोनों वर्गों में गोल्ड मेडल अपने नाम कर सबको चौंका दिया। आज मीराबाई चानू के बाद वे लोअर वेट कैटेगरी में भारत की सबसे भरोसेमंद और सशक्त वेटलिफ्टर बनकर उभरी हैं।
एक कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी
खेल के मैदान पर दम दिखाने के अलावा ज्ञानेश्वरी यादव छत्तीसगढ़ पुलिस में असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर के रूप में अपनी सेवाएं दे रही हैं। अनुशासन उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा है। वर्ष 2025 में उन्हें छत्तीसगढ़ के सर्वोच्च खेल सम्मान 'गुंडाधुर सम्मान' से भी नवाजा जा चुका है। उनके इस शानदार प्रदर्शन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सोशल मीडिया के माध्यम से उन्हें बधाई दी है। ज्ञानेश्वरी का कहना है कि यह उनका पहला कॉमनवेल्थ गेम्स था और उनका लक्ष्य केवल अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना था, जिसे हासिल कर वे बेहद खुश हैं।
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