यूरिया और डीएपी का खर्च होगा कम, कृषि विभाग ने किसानों को दिया लागत घटाने का खास फार्मूला

खरीफ सीजन में धान की फसल के लिए यूरिया और डीएपी पर होने वाले भारी खर्च से बचने के लिए कृषि विभाग ने किसानों को जैविक और नैनो उर्वरकों के संतुलित उपयोग की सलाह दी है।

खेती की लागत घटाने का नया मंत्र

खरीफ के मौजूदा सीजन में धान की रोपाई के बाद हर किसान की मुख्य चिंता फसल को तेजी से बढ़ाना और उसे पर्याप्त पोषण देना होती है। धान की अच्छी फसल सुनिश्चित करने के लिए उर्वरकों का समय पर इस्तेमाल बेहद अनिवार्य है, लेकिन यूरिया और डीएपी जैसी रासायनिक खादों की बढ़ती कीमतों ने किसानों की जेब पर भारी बोझ डाल दिया है। खेती की बढ़ती लागत को कम करने और उत्पादन को बेहतर बनाने के लिए कृषि विभाग ने अब किसानों को एक खास तकनीक और प्रबंधन का सुझाव दिया है।

रासायनिक निर्भरता से नुकसान

बालोद के वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी केशवराम पिद्दा का कहना है कि धान की रोपाई के पश्चात किसान अक्सर भारी मात्रा में यूरिया का छिड़काव करते हैं। यह एक सामान्य प्रक्रिया तो है, लेकिन उर्वरकों पर यह अत्यधिक निर्भरता न केवल खेती की लागत को आसमान पर पहुंचा रही है, बल्कि धीरे-धीरे मिट्टी की सेहत और उर्वरक शक्ति को भी नुकसान पहुंचा रही है। विभाग का स्पष्ट मानना है कि अगर किसान अपनी परंपरागत खेती की शैली में थोड़ा बदलाव लाएं और रासायनिक खादों के साथ जैविक विकल्पों को जोड़ें, तो यूरिया और डीएपी का अनावश्यक खर्च हजारों रुपये तक बचाया जा सकता है।

जैविक और हरी खाद का महत्व

कृषि विभाग की ओर से किसानों को सलाह दी जा रही है कि वे यूरिया के उपयोग को सीमित कर कम्पोस्ट खाद, नाडेप कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट और हरी खाद को प्राथमिकता दें। केशवराम पिद्दा ने बताया कि बालोद जिले में कई ऐसे प्रगतिशील किसान पहले से ही मौजूद हैं जो हरी खाद का सफलतापूर्वक उपयोग कर रहे हैं। हरी खाद न केवल फसल को नाइट्रोजन प्रदान करती है, बल्कि खेत में बायोमास और जैविक पदार्थों की मात्रा को भी बढ़ाती है।

विशेषज्ञों का यह भी तर्क है कि हरी खाद का नियमित उपयोग मिट्टी के पीएच मान को संतुलित रखने में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। यह विशेष रूप से उन खेतों के लिए वरदान है जहां की जमीन क्षारीय हो गई है। इसके अलावा, प्राकृतिक खाद के इस्तेमाल से मिट्टी के भीतर ऐसे सूक्ष्मजीव और हार्मोन सक्रिय हो जाते हैं जो पौधों की जड़ों को गहराई तक फैलाने और फसल की ओवरऑल ग्रोथ में मददगार साबित होते हैं।

नैनो उर्वरकों का करें इस्तेमाल

बाजार में इस समय कई तरह के अत्याधुनिक जैव उर्वरक उपलब्ध हैं। कृषि विभाग का जोर इस बात पर है कि किसान इनका वैज्ञानिक तरीके से उपयोग सीखें ताकि महंगे रासायनिक उर्वरकों पर खर्च कम हो सके। इस संदर्भ में उन्होंने छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से प्रोत्साहित किए जा रहे नैनो डीएपी और नैनो यूरिया को अपनाने की भी अपील की है। नैनो उर्वरकों की खासियत यह है कि इनकी बहुत कम मात्रा भी पौधों को पर्याप्त पोषण देने में सक्षम होती है। ये पारंपरिक यूरिया और डीएपी के बड़े बैग्स की जरूरत को काफी हद तक कम कर देते हैं, जिससे परिवहन और खरीदने की लागत में सीधे तौर पर बचत होती है।

पर्यावरण और मिट्टी की सुरक्षा

जैविक और नैनो उर्वरकों को अपनाने से न केवल किसानों के पैसे बचेंगे, बल्कि इसके दूरगामी लाभ भी हैं। इससे पर्यावरण प्रदूषण में कमी आएगी, मिट्टी की उपजाऊ शक्ति लंबे समय तक सुरक्षित रहेगी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पैदा होने वाली फसल की गुणवत्ता में भी व्यापक सुधार होगा। विभाग ने अपने मैदानी स्तर के अधिकारियों को निर्देश जारी किए हैं कि वे घर-घर और गांव-गांव जाकर किसानों को इन तकनीकों के बारे में विस्तार से समझाएं। लक्ष्य यह है कि कम लागत लगाकर अधिक से अधिक उत्पादन हासिल किया जा सके ताकि किसान आर्थिक रूप से सशक्त बन सकें।

https://hindi.news18.com/news/agriculture/agriculture-dept-reveals-secret-to-low-cost-rice-farmers-urea-and-dap-local18-10692474.html