बस्तर की कृषि में नया अध्याय
छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में कृषि के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिल रहा है। जगदलपुर के गरावंड खुर्द गांव की रहने वाली प्रभाती भारत ने एक ऐसी उपलब्धि हासिल की है, जिससे वे राज्य की पहली महिला किसान बन गई हैं, जिन्होंने बड़े स्तर पर ब्लैक राइस यानी काला चावल और रेड राइस यानी लाल चावल की खेती को अपनाया है। प्रभाती का यह साहसिक कदम न केवल उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रहा है, बल्कि बस्तर की कृषि पहचान को भी एक नया आयाम दे रहा है। वर्तमान में वे अपनी 4 एकड़ भूमि पर यह खेती कर रही हैं, जिसमें 2 एकड़ में काला चावल और 2 एकड़ में लाल चावल की फसल लहलहा रही है।
उत्पादन और तकनीकी तैयारी
अपनी फसल की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए प्रभाती ने आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों से शुद्ध और प्रमाणित बीज मंगवाए हैं। उनकी मेहनत और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का ही परिणाम है कि वे इस सीजन में 60 से 70 क्विंटल उत्पादन की उम्मीद कर रही हैं, बशर्ते मौसम का साथ बना रहे। इस पूरे सफर में उन्हें कृषि विशेषज्ञों का भरपूर साथ मिल रहा है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक दीपक शर्मा और बस्तर कृषि महाविद्यालय की वैज्ञानिक डॉ. सोनाली कर लगातार उन्हें तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान कर रहे हैं। इसके अलावा, जिला प्रशासन के कृषि और उद्यानिकी विभाग के अधिकारी भी समय समय पर खेत का दौरा कर आवश्यक सलाह देते रहते हैं। प्रभाती मानती हैं कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक कृषि तकनीकों का सही मिश्रण ही आने वाले समय में किसानों को सफलता दिला सकता है।
क्यों खास है लाल और काला चावल
बाजार में सामान्य चावल की तुलना में लाल और काले चावल की मांग तेजी से बढ़ रही है, क्योंकि उपभोक्ता अब अपने स्वास्थ्य के प्रति पहले से कहीं अधिक सचेत हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, काले चावल को सुपर फूड का दर्जा दिया गया है। इसमें प्रचुर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट, आयरन, फाइबर और प्रोटीन पाया जाता है, जो मानव शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने और हृदय को स्वस्थ रखने में सहायक है। वहीं, लाल चावल की बात करें तो यह फाइबर, जिंक और आयरन का बेहतरीन स्रोत है। इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स सफेद चावल की तुलना में काफी कम होता है, जिसके कारण यह डायबिटीज के मरीजों के लिए एक सुरक्षित और उत्तम विकल्प माना जाता है। दक्षिण भारत के कई हिस्सों में इसे लोग अपनी रोजमर्रा की डाइट का अनिवार्य हिस्सा बना चुके हैं।
450 देसी किस्मों का संरक्षण
प्रभाती भारत का योगदान केवल व्यावसायिक खेती तक ही सीमित नहीं है। वे बस्तर की अमूल्य कृषि विरासत को सहेजने के लिए एक बड़े मिशन पर काम कर रही हैं। अब तक उन्होंने लगभग 450 से अधिक देसी धान की किस्मों का संरक्षण किया है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए किसी खजाने से कम नहीं है। इनमें से 62 किस्मों को पेटेंट दिलाने के लिए उन्होंने आवेदन जमा कर दिया है और अन्य 32 किस्मों का रजिस्ट्रेशन कार्य भी प्रगति पर है। इस तरह के प्रयास कृषि जैव विविधता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
बस्तर के किसानों के लिए एक संदेश
प्रभाती की सफलता की यह कहानी अन्य किसानों के लिए एक बड़ी प्रेरणा है। उनका मानना है कि अगर बस्तर के किसान पारंपरिक खेती से हटकर नई और अधिक लाभ देने वाली फसलों की ओर रुख करेंगे, तो उनकी आय में भारी बढ़ोतरी हो सकती है। कृषि विशेषज्ञों का भी मानना है कि यदि लाल और काले चावल की उचित ब्रांडिंग और मार्केटिंग की जाए, तो यह बस्तर के ग्रामीण परिवेश की तस्वीर बदल सकती है। प्रभाती भारत न केवल एक किसान के रूप में, बल्कि एक जागरूक संरक्षक के रूप में भी महिला सशक्तिकरण और कृषि उन्नति की एक नई मिसाल बन गई हैं।
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