छत्तीसगढ़ के बस्तर में 'मीत' बनाने की अनूठी परंपरा, गोंचा पर्व पर केदारनाथ और विजय पांडे ने निभाई अटूट दोस्ती की रस्म

छत्तीसगढ़ के बस्तर में गोंचा पर्व के दौरान 'मीत' बनाने की एक बेहद खास और पारंपरिक रस्म निभाई जाती है, जहां दो लोग भगवान के सामने जीवनभर सुख-दुख में साथ निभाने का संकल्प लेते हैं।

छत्तीसगढ़ का बस्तर जिला अपनी अनूठी जनजातीय संस्कृति, विविधताओं और ऐतिहासिक परंपराओं के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। इन दिनों पूरे बस्तर क्षेत्र में ऐतिहासिक गोंचा पर्व की धूम देखने को मिल रही है। इस पारंपरिक त्योहार के दौरान कई तरह की प्राचीन रस्में और रिवाज निभाए जाते हैं, जो लोगों को अपनी जड़ों से जोड़े रखते हैं। इन्हीं में से एक बेहद खूबसूरत और दिल को छू लेने वाली परंपरा है 'मीत' बनाने की। यह एक ऐसी परंपरा है जिसमें न तो खून का कोई रिश्ता होता है और न ही सामाजिक बंधनों की कोई सीमा होती है, फिर भी दो इंसान जीवन भर के लिए एक-दूसरे के सुख-दुख के साथी बन जाते हैं।

इस वर्ष चल रहे गोंचा पर्व के दौरान बस्तर में इस अनूठी परंपरा का एक खूबसूरत नजारा देखने को मिला, जब केदारनाथ पांडे और विजय पांडे ने 'मीत' बनाने की प्राचीन रस्म को पूरे विधि-विधान से पूरा किया। दोनों ने भगवान के दरबार में एक-दूसरे का हाथ थामकर जीवनभर की सच्ची दोस्ती निभाने का अटूट संकल्प लिया। यह परंपरा बस्तर अंचल में आपसी प्रेम, गहरे भाईचारे और रिश्तों की मजबूती का एक बड़ा उदाहरण पेश करती है।

भगवान बलदेव और सुभद्रा के सामने ली जाती है प्रतिज्ञा

बस्तर में 'मीत' बनाने की यह रस्म कोई साधारण मित्रता नहीं है, बल्कि इसे एक पवित्र धार्मिक संस्कार की तरह माना जाता है। इस रस्म के तहत दोस्ती का हाथ बढ़ाने वाले दो लोग सीधे भगवान बलदेव और माता सुभद्रा की प्रतिमाओं के सामने खड़े होते हैं। भगवान को साक्षी मानकर दोनों प्रतिज्ञा करते हैं कि वे जीवन के हर मोड़ पर, चाहे परिस्थितियां कैसी भी हों, एक-दूसरे का साथ कभी नहीं छोड़ेंगे। सुख के दिनों में वे साथ मिलकर खुशियां मनाएंगे और दुख की घड़ी में एक-दूसरे की ढाल बनकर खड़े रहेंगे। इस पवित्र प्रतिज्ञा के बाद यह रिश्ता खून के रिश्तों से भी ज्यादा मजबूत और अटूट मान लिया जाता है।

दिल से दिल का मिलाप है 'मीत' का रिश्ता: केदारनाथ पांडे

इस रस्म को निभाने वाले बस्तर के स्थानीय निवासी केदारनाथ पांडे ने इस परंपरा के गहरे सामाजिक और भावनात्मक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि 'मीत' की रस्म हर किसी के साथ नहीं निभाई जा सकती। यह रिश्ता केवल उसी व्यक्ति के साथ जोड़ा जाता है जिससे आपका दिल मिलता हो, जो लंबे समय से आपका परिचित हो और जिसके साथ आपके विचार पूरी तरह मेल खाते हों।

केदारनाथ पांडे के शब्दों में, "मीत बनाने का सीधा और सच्चा अर्थ है अपना दिल पूरी तरह से दूसरे व्यक्ति को सौंप देना। एक बार जब आप किसी को अपना मीत स्वीकार कर लेते हैं, तो उसके बाद उसके प्रति किसी भी तरह का दुर्व्यवहार या कड़वी बातें करने की गुंजाइश खत्म हो जाती है। आपको जीवनभर अपने मीत के आत्मसम्मान और उसकी भावनाओं का ख्याल रखना पड़ता है। सुख-दुख में अपने घर के सदस्य की तरह उसका साथ देना होता है। यह एक ऐसा परिवार है जिसे हम खुद चुनते हैं और जिसे कभी तोड़ा नहीं जा सकता।"

कृष्ण और सुदामा की अमर मित्रता का प्रतीक

इस रस्म का हिस्सा बने विजय पांडे ने इस परंपरा की ऐतिहासिकता के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि 'मीत' बनाने की यह पावन प्रथा कोई नई नहीं है, बल्कि यह आदिकाल से चली आ रही है। भारत की पौराणिक कथाओं में जिस तरह भगवान श्रीकृष्ण और उनके परम सखा सुदामा की निस्वार्थ और गहरी मित्रता का वर्णन मिलता है, उसी आदर्श को ध्यान में रखकर बस्तर के लोग इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।

विजय पांडे ने बताया कि इस रस्म के जरिए लोग कृष्ण-सुदामा जैसी पवित्र मित्रता को अपने वास्तविक जीवन में उतारने का प्रयास करते हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, विभिन्न तीज-त्योहारों के अवसरों पर भी इस संकल्प को बार-बार याद किया जाता है और इसकी मर्यादा को बनाए रखने के लिए विशेष प्रयास किए जाते हैं। यह परंपरा नई पीढ़ी को भी सच्चे और निस्वार्थ रिश्तों की अहमियत सिखाती है।

गंगाजल, महाप्रसाद और नारियल: जानिए कैसे पूरी होती है यह रस्म

बस्तर की इस पारंपरिक 'मीत' रस्म को पूरा करने की अपनी एक विशेष पूजा विधि है, जिसे बहुत ही श्रद्धापूर्वक निभाया जाता है। यदि दो लोग आपस में इस रिश्ते में बंधना चाहते हैं, तो निम्नलिखित चरणों का पालन किया जाता है:

  • सबसे पहले एक पूजा की थाली तैयार की जाती है, जिसमें पवित्र गंगाजल, भगवान का महाप्रसाद और एक नारियल रखा जाता है।
  • इसके बाद दोनों मित्र भगवान के सामने खड़े होकर इस थाली को एक-दूसरे के हाथों में 7 बार सौंपते और वापस लेते हैं। इस आदान-प्रदान को बहुत पवित्र माना जाता है।
  • थाली के सात फेरे या आदान-प्रदान पूरे होने के बाद दोनों दोस्त एक-दूसरे को गले लगाते हैं।
  • गले मिलने के बाद आपसी स्नेह और सम्मान के प्रतीक के रूप में दोनों एक-दूसरे को नए कपड़े भेंट करते हैं।
  • अंत में, मंदिर में स्थापित देवी-देवताओं के दर्शन और उनका आशीर्वाद लेने के बाद दोनों औपचारिक और धार्मिक रूप से 'मीत' घोषित हो जाते हैं।

स्थानीय जानकारों के अनुसार, बस्तर क्षेत्र में इसी प्रकार का एक और नियम प्रचलित है जिसे गजमुख के नाम से जाना जाता है। उसमें भी इसी तरह के नियमों और मर्यादाओं का कड़ाई से पालन किया जाता है। बस्तर की यह अद्भुत परंपरा आज के आधुनिक युग में भी मानवीय संवेदनाओं और रिश्तों की गर्माहट को संजोए रखने का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

https://hindi.news18.com/news/chhattisgarh/bastar-meet-tradition-performs-on-goncha-festival-local18-10673714.html