सिनेमा का वो दौर और गया शहर की यादें
आज के दौर में जब मोबाइल फोन और इंटरनेट के जरिए मनोरंजन हमारी उंगलियों पर मौजूद है, तब वह समय भी था जब लोग केवल सिनेमाघरों और टेलीविजन के सहारे ही अपना मनोरंजन करते थे। बिहार के गया शहर में एक समय ऐसा था, जब मनोरंजन के चार से पांच सिनेमाघर संचालित होते थे। समय के साथ गया के इन पुराने सिनेमाघरों की रौनक फीकी पड़ गई है। आज स्थिति यह है कि एक को छोड़कर बाकी सभी सिनेमाघर या तो बंद हो गए हैं या फिर उन स्थानों पर व्यावसायिक दुकानें और शॉपिंग मॉल बनाए जा चुके हैं। सिनेमाघरों से जुड़ी ये यादें गया के उन लोगों के लिए बेहद खास हैं, जिन्होंने उस दौर को जिया है।
पहली फिल्म का रोमांच और संघर्ष
गया शहर के वरिष्ठ फोटो जर्नलिस्ट श्याम भंडारी, जिनकी उम्र लगभग 76 वर्ष है, फिल्मों के प्रति अपने लगाव को आज भी शिद्दत से याद करते हैं। उन्होंने बताया कि उनकी फिल्मी यात्रा की शुरुआत 1964-65 के दौरान हुई थी। वे पहली बार अपने छोटे भाई के साथ गया के प्रेम टॉकीज सिनेमाघर में फिल्म देखने गए थे, जिसका नाम था जय चित्तौड़। यह फिल्म ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित थी। उन दिनों किसी फिल्म का आनंद लेना उतना सरल नहीं था, जितना आज के समय में है। टिकट खिड़की पर सैकड़ों लोगों की भीड़ जमा होती थी और उस छोटी सी खिड़की से टिकट हासिल करना किसी बड़ी जंग को जीतने जैसा होता था।
टिकट के लिए चार घंटे का इंतज़ार
श्याम भंडारी याद करते हैं कि शाम के 6 बजे वाले शो के लिए उन्हें दोपहर 4 बजे से ही टिकट काउंटर के सामने लंबी लाइनों में खड़ा होना पड़ता था। उस समय की स्थिति बयां करते हुए वे कहते हैं कि वे अक्सर घर से चोरी-छिपे फिल्म देखने जाया करते थे, जिसकी भनक परिवार वालों को भी नहीं लगती थी। उस समय सिनेमा देखने का तरीका भी बड़ा अनोखा था। वे एक फिल्म को अक्सर दो भागों में देखते थे। फिल्म के पहले हिस्से यानी इंटरवल के दौरान वे अपना पास बेच देते थे और फिर फिल्म का बचा हुआ हिस्सा देखने के लिए वे किसी दूसरे दिन टिकट खरीदकर दोबारा सिनेमाघर जाते थे। बचपन से ही फिल्मों के प्रति उनका जुनून इतना गहरा था कि वे हर सप्ताह कम से कम एक फिल्म देखने की पूरी कोशिश करते थे।
अपर क्लास का क्रेज और पुरानी यादें
जैसे-जैसे श्याम भंडारी बड़े हुए, उनका फिल्म देखने का तरीका भी बदला। बाद में वे परिवार के साथ फिल्मों का आनंद लेने लगे। उन दिनों गया शहर में प्रमुख रूप से चार सिनेमाघर थे, जिनमें चौक स्थित भारत टॉकीज, किरण सिनेमा, प्रेम टॉकीज और पैराडाइज सिनेमाघर शामिल थे। इन सभी के बीच पैराडाइज सिनेमाघर सबसे बेहतरीन माना जाता था और खुशी की बात यह है कि यह आज भी अपनी चालू स्थिति में है। उन्होंने अपने वैवाहिक जीवन की यादों को साझा करते हुए बताया कि शादी के बाद वे अपनी पत्नी के साथ भी पैराडाइज सिनेमाघर में फिल्में देखने जाया करते थे। उनकी पत्नी भी फिल्मों की बड़ी शौकीन थीं, जिसके कारण वे मनोरंजन के लिए अक्सर वहां पहुंचते थे। करीब 20 वर्षों तक उन्होंने शहर के अलग-अलग सिनेमाघरों में सैकड़ों फिल्मों का लुत्फ उठाया।
टिकट की कीमत और जीवन के सबक
सिनेमाघर से जुड़ी एक दिलचस्प बात यह है कि वे हमेशा अपर क्लास का टिकट लेने की कोशिश करते थे, जिसके लिए कई बार उन्हें पैरवी का सहारा भी लेना पड़ता था। अपनी पहली फिल्म के अनुभव को याद करते हुए उन्होंने बताया कि उस समय सामान्य टिकट की कीमत मात्र 4 आने हुआ करती थी, जबकि अपर क्लास का टिकट लगभग डेढ़ रुपये का आता था। श्याम भंडारी मानते हैं कि फिल्मों ने उनके जीवन में बहुत कुछ सिखाया और उनके रहन-सहन के तरीके में भी बड़ा बदलाव आया। हालांकि, आज के गया शहर में बदलाव की बयार ऐसी है कि पैराडाइज के अलावा पुराने तमाम सिनेमाघर इतिहास के पन्नों में सिमट गए हैं और लोग अब बड़े मॉलों का रुख कर रहे हैं। फिर भी, उन पुराने दिनों की यादें आज भी किसी कालजयी कहानी से कम नहीं हैं।
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