आधुनिक युग में भी कायम है पारंपरिक हुनर
आज के दौर में जब हर चीज मशीन और प्लास्टिक पर निर्भर हो गई है, तब झारखंड का कोडरमा जिला एक अनोखी मिसाल पेश कर रहा है। रांची-पटना नेशनल हाईवे के पास स्थित नगर परिषद क्षेत्र के वार्ड संख्या 7 में करीब 30 से 40 बांसफोड़ परिवार ऐसे हैं, जिन्होंने मशीनों की चकाचौंध के बीच भी अपनी पुश्तैनी कला को नहीं छोड़ा है। ये परिवार कई पीढ़ियों से बांस से सुंदर और उपयोगी चीजें तैयार कर अपनी आजीविका चला रहे हैं। इनके लिए बांस केवल एक लकड़ी का टुकड़ा नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति और पहचान है।
बांस को आकार देने का कठिन सफर
बांस से सामान बनाने की प्रक्रिया जितनी सुंदर दिखती है, उतनी ही चुनौतीपूर्ण भी है। इस कला से जुड़ी सुनीता तुरी बताती हैं कि यह हुनर उन्हें अपने पूर्वजों से विरासत में मिला है। इस काम में परिवार के पुरुष और महिलाएं दोनों पूरी मेहनत के साथ जुटे रहते हैं। काम की शुरुआत ग्रामीण इलाकों से लाए गए हरे बांस से होती है। इन बांसों को पहले छांटा जाता है और फिर लोहे के एक विशेष औजार की सहायता से उन्हें बहुत बारीकी से पतली पट्टियों में चीरा जाता है। यह प्रक्रिया काफी जोखिम भरी होती है, क्योंकि थोड़ी सी भी चूक होने पर हाथ में गंभीर चोट लग सकती है। घंटों की कड़ी मशक्कत और एकाग्रता के बाद जाकर कोई एक वस्तु तैयार होती है।
प्लास्टिक ने दी है कमाई को चुनौती
बांसफोड़ परिवारों का यह पारंपरिक कारोबार मौजूदा बाजार में भारी प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहा है। बाजार में प्लास्टिक से बनी सस्ती और चमकदार वस्तुओं की भरमार ने इस हस्तशिल्प की मांग पर सीधा असर डाला है। सुनीता तुरी के अनुसार, ग्राहक अब सुविधा और कम कीमत के कारण प्लास्टिक की चीजों को अधिक प्राथमिकता दे रहे हैं। इसका असर इन गरीब परिवारों की कमाई पर पड़ा है। हालांकि, आर्थिक तंगी और मांग में कमी के बावजूद इन लोगों ने हार नहीं मानी है। उनका मानना है कि बांस से बनी चीजें न केवल पर्यावरण के लिए सुरक्षित हैं, बल्कि ये हमारी पारंपरिक जड़ों से भी जुड़ी हुई हैं।
क्या है सामान की कीमत और अपील
ये कारीगर जो सामान तैयार करते हैं, वह काफी किफायती और दैनिक उपयोग में काम आने वाला होता है। इनके द्वारा बनाए जाने वाले सामानों की सूची और उनकी कीमतें इस प्रकार हैं:
- सूप: 50 रुपये
- डलिया: 40 रुपये
- टोकरी: 100 रुपये
- दउरा: 200 रुपये
- डाला: 80 रुपये
- मुर्गा टोकरा: 200 रुपये
- बांस का पंखा: 20 रुपये
सुनीता तुरी ने आम लोगों से भावुक अपील की है कि वे स्थानीय कारीगरों के हाथों से बनी चीजों को जरूर खरीदें। उनका कहना है कि यदि लोग स्थानीय उत्पादों को अपनाएंगे, तो न केवल उनकी कला जीवित रहेगी, बल्कि उन गरीब परिवारों की रोजी-रोटी भी सुरक्षित बनी रहेगी जो दशकों से इस काम पर निर्भर हैं। उनकी यह मुहिम आधुनिकता के दौर में भी संस्कृति को संजोए रखने का एक बड़ा प्रयास है।
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