बिहार का बहुरूपिया गांव और उसकी अनोखी परंपरा
बिहार की माटी अपनी समृद्ध संस्कृति और प्राचीन परंपराओं के लिए जानी जाती है. राज्य के कोने-कोने में ऐसे कई गांव मौजूद हैं, जो अपनी अलग पहचान और हैरान करने वाले रिवाजों के लिए प्रसिद्ध हैं. पूर्वी चंपारण जिले के सुगौली प्रखंड में बसा एक ऐसा ही गांव है, जिसका नाम है 'बहुरूपिया'. इस गांव की पहचान केवल इसके नाम से नहीं, बल्कि यहां सदियों से निभाई जा रही एक विशेष धार्मिक रस्म से है. गांव में किसी भी मांगलिक कार्य या धार्मिक अनुष्ठान की शुरुआत तब तक नहीं होती, जब तक यहां के स्थानीय देवता 'बहुरूपी बाबा' की विधिवत पूजा न कर ली जाए.
बेतिया राज से जुड़ा है दिलचस्प इतिहास
इस गांव के नाम और यहां की परंपरा का गहरा संबंध बेतिया राज के काल से बताया जाता है. स्थानीय बुजुर्गों का मानना है कि बहुरूपी बाबा वास्तव में एक बहुत ही प्रतिभाशाली कलाकार थे. उन दिनों जब बेतिया के महाराजा का शासन था, तब यह कलाकार अपनी अद्भुत कला के जरिए गांव-गांव जाकर लोगों का मनोरंजन किया करता था. वे अलग-अलग रूपों में, विशेषकर भगवान शंकर या संकट मोचन हनुमान के वेश में नृत्य और अभिनय का प्रदर्शन करते थे. अपनी कला के माध्यम से वे समाज में काफी लोकप्रिय हो गए थे. चूंकि वे हमेशा अलग-अलग रूप धारण किया करते थे, इसलिए स्थानीय लोग उन्हें 'बहुरूपिया' के नाम से संबोधित करने लगे, जो आगे चलकर उनकी पहचान बन गई.
समाधि लेने की घटना और आस्था का केंद्र
लोक कथाओं के अनुसार, एक दिन इस कलाकार ने गांव के एक निश्चित स्थान पर अचानक जीवित समाधि ले ली. इस घटना ने पूरे क्षेत्र के लोगों को अचंभित कर दिया. चूंकि उन्होंने अपने जीवनकाल में देवी-देवताओं का रूप धारण कर लोगों को आनंदित किया था, इसलिए ग्रामीणों ने उनकी इस समाधि को ईश्वरीय चमत्कार माना. समय के साथ, इस स्थान पर लोग अपनी मन्नतें मांगने लगे और अपनी परेशानियों को उनके सामने रखने लगे. जब ग्रामीणों की मनोकामनाएं पूरी होने लगीं, तो उनकी आस्था और गहरी होती गई. लोगों ने उन्हें भगवान का स्वरूप मानकर पूजना शुरू कर दिया. धीरे-धीरे उसी स्थान और आसपास के पूरे इलाके को 'बहुरूपिया' के नाम से जाना जाने लगा.
चीनी वाली रोटी का विशेष भोग
आज बहुरूपिया गांव में रहने वाले हर परिवार के लिए यह परंपरा अटूट है. चाहे किसी के घर में शादी का आयोजन हो या फिर कोई धार्मिक अनुष्ठान, बहुरूपी बाबा की पूजा अनिवार्य है. इस पूजा की सबसे बड़ी विशेषता इसका चढ़ावा है. मान्यता के अनुसार, बाबा को भोग के रूप में चावल के आटे से बनी रोटियां अर्पित की जाती हैं, जिनमें चीनी भरी होती है. इस रिवाज का पालन यहां का हर समुदाय, चाहे वह हिंदू हो या मुस्लिम, पूरी श्रद्धा और आपसी भाईचारे के साथ करता है. यह अनोखी परंपरा आज भी बहुरूपिया गांव की एकता और उसकी ऐतिहासिक जड़ों को मजबूती से जोड़े हुए है.
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