धान की खेती में अपनाएं कम समय वाली किस्में, पानी की होगी बचत और कीटों का खतरा भी होगा कम

धान की खेती के इस सीजन में बारिश की कमी को देखते हुए कृषि विशेषज्ञ और अनुभवी किसान कम समय में तैयार होने वाली धान की किस्मों को लगाने की सलाह दे रहे हैं। सही तकनीक और किस्म का चुनाव करके किसान कम पानी में भी बंपर पैदावार प्राप्त कर सकते हैं।

धान की खेती और मौसम की चुनौती

वर्तमान में धान की खेती का मुख्य सीजन चल रहा है और देश भर के किसान खेतों में धान की रोपाई की तैयारियों में पूरी तरह जुटे हुए हैं। खेतों में नर्सरी तैयार की जा चुकी है और कुछ ही दिनों में बड़े पैमाने पर रोपाई का कार्य शुरू कर दिया जाएगा। हालांकि, इस साल मौसम विभाग के पूर्वानुमान ने किसानों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। अनुमान के अनुसार इस बार बारिश सामान्य से काफी कम होने की संभावना है, जिससे धान जैसी जल-सघन फसल को बचाना किसानों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। यदि आप भी इस सीजन धान की खेती कर रहे हैं और बारिश की बेरुखी के बीच अपनी फसल को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो जमुई जिले के प्रगतिशील किसान ध्रुव कुमार द्वारा साझा की गई तकनीकें आपके लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती हैं।

सिंचाई प्रबंधन का महत्व

जमुई जिले के खैरा प्रखंड स्थित मांगोबंदर गांव के निवासी ध्रुव कुमार ने हाल ही में विपरीत परिस्थितियों और पानी की कमी के बावजूद धान की सफल खेती करके एक मिसाल पेश की है। ध्रुव का मानना है कि यदि मानसून साथ न दे, तब भी बेहतर प्रबंधन के जरिए धान की खेती संभव है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पानी की कमी होने पर सिंचाई के वैकल्पिक साधनों का होना अनिवार्य है। ध्रुव के अनुसार, उन्होंने अपनी फसल को बचाने के लिए हर दो दिन के अंतराल पर नियमित सिंचाई सुनिश्चित की थी। वे सलाह देते हैं कि किसान पहले ट्यूबवेल या अन्य जल संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करें और उसके बाद ही धान की रोपाई का निर्णय लें। जिन किसानों के पास सिंचाई के साधन उपलब्ध नहीं हैं, उन्हें मौसम के मिजाज को देखते हुए ही बुवाई करनी चाहिए और कोई भी जल्दबाजी करने से बचना चाहिए।

मिट्टी की जांच और डीएसआर तकनीक

खेती शुरू करने से पहले ध्रुव कुमार ने एक और महत्वपूर्ण सुझाव दिया है, जो मिट्टी की जांच है। फसल लगाने से पहले खेत की मिट्टी की जांच कराना आवश्यक है ताकि यह पता चल सके कि उसमें किन पोषक तत्वों की कमी है और किस प्रकार की खाद का प्रयोग करना चाहिए। इसके अलावा, ध्रुव ने डीएसआर तकनीक यानी सीधी बुवाई की विधि के बारे में विस्तार से बताया। इस विधि में धान की नर्सरी तैयार करने की झंझट नहीं होती और बीज सीधे खेत में डाले जाते हैं।

पानी की बचत और अतिरिक्त लाभ

डीएसआर तकनीक अपनाने के कई बड़े फायदे हैं। पहला यह कि इससे खेती की अतिरिक्त लागत में भारी कमी आती है। शोध और अनुभव बताते हैं कि इस तकनीक से पानी की खपत में लगभग 30 से 40 प्रतिशत तक की बचत हो सकती है। इसके साथ ही, पारंपरिक विधि की तुलना में इसमें मजदूरी पर होने वाला खर्च भी काफी कम हो जाता है। सबसे बड़ी राहत यह है कि इस तकनीक में खेतों को हर समय पानी से लबालब भरकर रखने की जरूरत नहीं होती, जिससे कम जल संसाधनों के बावजूद धान की फसल तैयार की जा सकती है।

कीटों और बीमारियों से बचाव

ध्रुव कुमार का कहना है कि सीधी बुवाई तकनीक न केवल पानी बचाती है, बल्कि फसल को रोगों से भी सुरक्षित रखती है। इस तरीके को अपनाने से धान की फसल में कीटों और अन्य बीमारियों का प्रकोप काफी कम देखा गया है। अंत में, उन्होंने सभी किसानों को एक विशेष सलाह दी कि धान की उन किस्मों का चयन करें जो कम समय में पककर तैयार हो जाती हैं। कम अवधि वाली इन धान की किस्मों को न केवल कम पानी की आवश्यकता होती है, बल्कि ये प्रतिकूल परिस्थितियों में भी बेहतर उपज देने की क्षमता रखती हैं। इन छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देकर किसान कम पानी में भी धान की खेती को सफल और लाभदायक बना सकते हैं।

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