खेती की लागत घटाने का नया नुस्खा
बिहार के छपरा जिले के किसान इन दिनों खेती के पारंपरिक तरीकों में नवाचार कर रहे हैं। कृषि वैज्ञानिकों द्वारा दिए जा रहे प्रशिक्षण की मदद से किसान अब आत्मनिर्भर बनने की राह पर हैं। वे अब बाजार से महंगी खाद और कीटनाशक खरीदने के बजाय अपने घर पर ही जैविक खाद और खर-पतवार नाशक दवा तैयार कर रहे हैं। इस पहल का मुख्य उद्देश्य खेती पर होने वाले अनावश्यक खर्च को नियंत्रित करना और फसल की गुणवत्ता को बढ़ाना है। सारण जिले के दरियापुर प्रखंड स्थित खानपुर गांव के रहने वाले प्रगतिशील किसान रणजीत सिंह इस दिशा में एक बेहतरीन उदाहरण बनकर उभरे हैं।
मात्र 50 से 100 रुपये में तैयार हो रही दवा
रणजीत सिंह ने बताया कि उन्होंने कृषि वैज्ञानिकों से खर-पतवार को नष्ट करने और उसे खाद में बदलने का विशेष प्रशिक्षण प्राप्त किया है। सबसे अच्छी बात यह है कि इस जैविक दवा को तैयार करने में बहुत मामूली खर्च आता है। किसान मात्र 50 से 100 रुपये के बीच खर्च करके 200 लीटर तक जैविक घोल तैयार कर सकते हैं। यह दवा न केवल खेत की फालतू घास को गलाकर खाद में बदल देती है, बल्कि सूखे गोबर का उपयोग करके बेहतरीन जैविक खाद बनाने में भी मदद करती है। इस घरेलू तकनीक को अपनाकर किसान खाद और दवा पर होने वाले भारी खर्च को बचा रहे हैं।
दवा तैयार करने की पूरी विधि
रणजीत सिंह ने घर पर ही यह प्रभावी जैविक घोल बनाने का सरल तरीका साझा किया है। इसे बनाने के लिए आपको नीचे दी गई सामग्री और चरणों का पालन करना होगा:
- सबसे पहले एक ड्रम में 200 लीटर पानी लें।
- इसमें 2 किलो गुड़ मिलाएं।
- इसके साथ ही बाजार में मिलने वाले डीकंपोजर का उपयोग करें, जो आसानी से 10 से 20 रुपये में उपलब्ध हो जाता है।
- इन सभी चीजों को पानी में अच्छी तरह मिला लें।
इस प्रकार आपकी जैविक दवा बनकर तैयार हो जाती है। इसे आप सीधे खेत में उगी फालतू घास या खर-पतवार पर छिड़क सकते हैं। इस घोल का संपर्क होते ही घास गलने लगती है और धीरे-धीरे जैविक खाद का रूप ले लेती है, जो मिट्टी की उर्वरक शक्ति को बढ़ाने का काम करती है।
छिड़काव का सही तरीका और लाभ
इस दवा के इस्तेमाल को लेकर किसान ने महत्वपूर्ण जानकारी दी है। यदि आप 1 एकड़ खेत में इसका छिड़काव करना चाहते हैं, तो तैयार किए गए 200 लीटर घोल में से लगभग 180 लीटर का प्रयोग करें और 20 लीटर घोल बचाकर रखें। इसका नियमित छिड़काव खर-पतवार को जड़ से खत्म करने के साथ-साथ मिट्टी की सेहत में भी सुधार लाता है।
फसल और मिट्टी के लिए पूरी तरह सुरक्षित
इस जैविक विधि की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूरी तरह से सुरक्षित है। रसायनों के विपरीत, यह दवा मुख्य फसल को किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाती है और मिट्टी के प्राकृतिक स्वास्थ्य को बनाए रखती है। रणजीत सिंह का अनुभव है कि इस तकनीक से न केवल खर-पतवार की समस्या कम होती है, बल्कि फसल की पैदावार भी काफी बेहतर और मजबूत होती है। छपरा के कई अन्य किसान भी अब इस विधि को अपना रहे हैं, जिससे उन्हें दोहरे लाभ मिल रहे हैं, पहला खेती की लागत में कमी और दूसरा मिट्टी की उर्वरकता में वृद्धि। इस प्रकार की घरेलू और जैविक तकनीकें आधुनिक कृषि में एक बड़ा बदलाव लाने में सक्षम हैं।
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