खेती की नई राह: 120 दिन में तैयार होने वाली रागी से बढ़ रही है किसानों की कमाई, जानें पूरा गणित

छत्तीसगढ़ के सरगुजा में किसान रागी यानी मड़िया की पारंपरिक खेती की ओर फिर से रुख कर रहे हैं। कम लागत और बेहतर बाजार भाव के कारण यह फसल किसानों के लिए एक मुनाफे का जरिया बनती जा रही है।

रागी की खेती से बढ़ा किसानों का उत्साह

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में एक दौर था जब ग्रामीण क्षेत्रों में किसान बड़े पैमाने पर रागी की बुवाई करते थे, जिसे स्थानीय भाषा में मड़िया भी कहा जाता है। हालांकि बीच के कुछ वर्षों में किसानों ने इस फसल से दूरी बना ली थी, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। खेती के जानकारों का मानना है कि रागी का महत्व फिर से बढ़ रहा है क्योंकि यह फसल न केवल कम समय में तैयार हो जाती है, बल्कि इसमें औषधीय गुण भी भरपूर होते हैं। जो किसान इस पारंपरिक फसल को आज भी बचाए हुए हैं, वे अन्य फसलों की तुलना में कम मेहनत और कम खर्च में अच्छी आमदनी प्राप्त कर रहे हैं।

रागी के औषधीय और स्वास्थ्य लाभ

कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक, रागी एक प्रकार का माइनर मिलेट है जो सेहत के लिए बेहद फायदेमंद है। इस मोटे अनाज में फाइबर की मात्रा बहुत अधिक होती है, जो मानव पाचन तंत्र को सुचारू रखने में मदद करती है। पेट संबंधी परेशानियों से जूझ रहे लोगों के लिए यह एक अचूक आहार माना जाता है। इसके अलावा, मधुमेह के मरीज भी अपने स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए रागी को अपनी डाइट में शामिल कर रहे हैं। इन्हीं खूबियों की वजह से बाजार में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।

खेती की दो प्रमुख विधियां

रागी की खेती मुख्य रूप से दो तरीके से की जा सकती है। पहली विधि है सीधे खेत में बुवाई करना, जिसे डायरेक्ट सॉइंग कहते हैं। दूसरी विधि में पहले नर्सरी तैयार की जाती है और उसके बाद पौधों की रोपाई यानी ट्रांसप्लांटिंग की जाती है। विशेषज्ञों की मानें तो यदि किसान ट्रांसप्लांटिंग वाली विधि को अपनाते हैं, तो उन्हें खरपतवार की समस्या का कम सामना करना पड़ता है और अंत में उत्पादन भी पहले की तुलना में अधिक प्राप्त होता है।

उत्पादन और लागत का हिसाब

रागी की सबसे बड़ी खासियत इसका कम समय में तैयार होना है। यह फसल बुवाई के महज 120 से 125 दिनों के भीतर पूरी तरह पककर तैयार हो जाती है। यदि हम उत्पादन की बात करें, तो एक हेक्टेयर भूमि से लगभग 4 से 5 क्विंटल तक उपज आसानी से मिल जाती है। सबसे अच्छी बात यह है कि इस फसल में कीड़े और बीमारियों का असर न के बराबर होता है, जिससे किसानों को कीटनाशकों और महंगी दवाओं पर अतिरिक्त खर्च करने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

खाद और उर्वरक का प्रबंधन

कम लागत में बेहतर फसल लेने के लिए खाद का सही इस्तेमाल जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार, प्रति एकड़ 2 से 2.5 टन गोबर की खाद का उपयोग करना काफी रहता है। यदि मिट्टी की स्थिति के अनुसार जरूरत महसूस हो, तो प्रति हेक्टेयर 12:32:16 उर्वरक की एक बोरी का उपयोग किया जा सकता है। इससे फसल की बढ़वार अच्छी होती है और पैदावार में वृद्धि होती है।

बाजार में बढ़ती मांग और मुनाफा

आर्थिक दृष्टिकोण से रागी किसानों के लिए एक बहुत ही आकर्षक विकल्प है। बाजार में रागी का भाव फिलहाल 40 से 45 रुपये प्रति किलो तक चल रहा है। यदि किसान इसका प्रोसेसिंग कर लेते हैं, तो रागी के चावल की कीमत 100 से 120 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है। कम लागत और मेहनत के मुकाबले मिलने वाला यह मुनाफा रागी को एक बेहतरीन नकदी फसल बनाता है। कृषि जानकारों का कहना है कि किसानों को अपनी पारंपरिक मुख्य फसलों के साथ रागी को भी अपनाना चाहिए ताकि उनकी आय का दायरा बढ़ सके।

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