यूरोपीय संसद का पाकिस्तान पर कड़ा प्रहार: जबरन धर्मांतरण और बाल विवाह पर अंतरराष्ट्रीय मंच से खुली पोल

पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे अत्याचारों को लेकर यूरोपीय संसद ने एक सख्त प्रस्ताव पारित किया है, जिसमें संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के आधार पर जबरन धर्मांतरण और नाबालिग लड़कियों के शोषण पर चिंता जताई गई है।

यूरोपीय संसद ने पाकिस्तान को घेरा

पाकिस्तान में मानवाधिकारों की दयनीय स्थिति और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रहे लगातार अत्याचारों पर यूरोपीय संसद ने अब तक का सबसे सख्त रुख अपनाते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस्लामाबाद की किरकिरी कर दी है। यूरोपीय सांसदों ने एक ऐतिहासिक प्रस्ताव को मंजूरी दी है, जिसमें पाकिस्तान के भीतर जबरन धर्मांतरण और कम उम्र में शादी यानी बाल विवाह की कुप्रथाओं को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाने की मांग की गई है। इस प्रस्ताव ने अंतरराष्ट्रीय पटल पर पाकिस्तान के उस चेहरे को बेनकाब कर दिया है जिसे वह लंबे समय से छिपाने की कोशिश कर रहा था।

संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े बने आधार

यूरोपीय संसद के इस प्रस्ताव का मुख्य आधार संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी किए गए वर्ष 2025 के चौंकाने वाले आंकड़े हैं। रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया गया है कि पाकिस्तान में जबरन धर्म परिवर्तन और जबरन विवाह जैसी अमानवीय घटनाओं के शिकार होने वालों में लगभग 25 प्रतिशत लड़कियां ईसाई समुदाय से ताल्लुक रखती हैं। यूरोपीय सांसदों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि पाकिस्तान को बाल विवाह को जड़ से खत्म करने के लिए एक मजबूत राष्ट्रीय ढांचा तैयार करना चाहिए। साथ ही, उन अल्पसंख्यक परिवारों की शिकायतों के निवारण के लिए एक समर्पित राष्ट्रीय तंत्र बनाने का निर्देश दिया गया है, जिनकी बेटियों को अपहरण कर जबरन धर्म बदलने पर मजबूर किया जाता है।

मारिया शहबाज का मामला और अदालत की भूमिका

प्रस्ताव में 13 वर्षीय ईसाई किशोरी मारिया शहबाज के मामले को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। मारिया का कथित तौर पर जुलाई 2025 में 30 वर्षीय शेहरयार अहमद द्वारा अपहरण कर लिया गया था। आरोप है कि अपहरण के बाद बच्ची को जबरन इस्लाम धर्म अपनाने और निकाह करने के लिए मजबूर किया गया। सांसदों ने पाकिस्तान की संघीय संवैधानिक अदालत के फैसले पर कड़ी नाराजगी जताई है। यह सामने आया है कि आधिकारिक दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ और मारिया के नाबालिग होने के स्पष्ट सबूतों के बावजूद, अदालत ने आरोपी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए पीड़ित बच्ची को वापस उसी के पास भेज दिया। यूरोपीय संसद ने इस न्यायिक निर्णय को मानवाधिकारों का उल्लंघन करार दिया है और मांग की है कि मारिया को तुरंत कानूनी सहायता और मनोवैज्ञानिक परामर्श दिया जाए ताकि वह इस भयावह दौर से बाहर निकल सके।

हर साल 1,000 से ज्यादा पीड़ित

मानवाधिकार संगठनों के चौंकाने वाले अनुमानों के अनुसार, पाकिस्तान में हर साल अल्पसंख्यक समुदायों के 1,000 से अधिक नाबालिग बच्चे इन क्रूर अत्याचारों का शिकार होते हैं। यूरोपीय संसद ने इस बात पर गंभीर चिंता व्यक्त की है कि कई मामलों में स्थानीय प्रशासन और पुलिस के अधिकारी सीधे तौर पर इन अपराधियों के साथ मिले होते हैं। इसके अतिरिक्त, अदालतों द्वारा बाल संरक्षण कानूनों की लगातार अनदेखी करना इन अपराधों को एक प्रकार की कानूनी वैधता प्रदान करने जैसा है।

निष्पक्ष जांच और सुरक्षा की मांग

यूरोपीय संसद के सदस्यों ने इस्लामाबाद से स्पष्ट शब्दों में कहा है कि अपहरण और जबरन धर्म परिवर्तन के हर एक मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच होनी चाहिए। साथ ही, पीड़ित बच्चियों को उनके वास्तविक परिजनों तक सुरक्षित पहुंचाने के लिए एक पुख्ता व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। प्रस्ताव में यह भी जोर दिया गया है कि पाकिस्तान को अपने कानूनी सुरक्षा उपायों को अत्यधिक मजबूत करना होगा ताकि अल्पसंख्यक समुदायों को देश में सुरक्षित महसूस हो सके और भविष्य में इस तरह की अमानवीय घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।

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