धरोहर: मधुबनी में मौजूद हैं 400 साल पुराने बजरबट्टू के पत्तों पर लिखे दस्तावेज, पानी से पोंछते ही चमकने लगते हैं अक्षर

बिहार के मधुबनी में एक अनोखी ऐतिहासिक धरोहर सुरक्षित है, जहाँ बजरबट्टू के पत्तों पर लिखे सदियों पुराने दस्तावेज आज भी चमक बिखेर रहे हैं। इन पत्तों की खास बात यह है कि पानी से साफ करने पर इनके अक्षर खराब होने के बजाय और अधिक स्पष्ट हो जाते हैं।

ऐतिहासिक धरोहर का अनोखा सच

आमतौर पर पुराने दस्तावेजों या हस्तलिपि को लेकर सबसे बड़ी चिंता यही रहती है कि नमी या पानी के संपर्क में आने से वे नष्ट न हो जाएं। लेकिन बिहार के मधुबनी में एक ऐसी अद्भुत धरोहर मौजूद है, जो इस धारणा को पूरी तरह बदल देती है। यहाँ सौराठ में पंजीकारों के पास लगभग 400 से 500 साल पुराने ऐसे दस्तावेज सुरक्षित हैं, जो कागज पर नहीं बल्कि बजरबट्टू यानी टैलिपॉट पाम के पत्तों पर लिखे गए हैं। इन पत्तों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यदि इन पर पानी गिर जाए या इन्हें गीले कपड़े से पोंछा जाए, तो अक्षर मिटते नहीं, बल्कि और अधिक चमकने लगते हैं।

दक्षिण भारत और श्रीलंका से खास संबंध

बजरबट्टू का पेड़ सामान्यतः श्रीलंका और दक्षिण भारत के क्षेत्रों में पाया जाता है। इसकी पत्तियां काफी लंबी और मजबूत होती हैं, जिनकी लंबाई लगभग तीन से साढ़े तीन फीट तक होती है। ऐतिहासिक रूप से मिथिला क्षेत्र के लोग अपनी वंशावली और पंजी दस्तावेजों को सुरक्षित रखने के लिए इसी पेड़ की पत्तियों का उपयोग करते थे। पंजीकार देवेंद्र मिश्र के अनुसार, ये दस्तावेज मिथिला अक्षरों में हाथ से लिखे गए हैं और इनमें नेपाल में रहने वाले मैथिल समुदाय की पीढ़ियों का विस्तृत विवरण दर्ज है। इन पत्तों का चयन इसलिए किया जाता था क्योंकि इनका स्थायित्व सामान्य पत्तियों या कागज की तुलना में कहीं अधिक होता है।

पानी की पॉलिश से बढ़ती है स्पष्टता

इन दस्तावेजों को संरक्षित रखने की विधि अत्यंत वैज्ञानिक और दिलचस्प है। देवेंद्र मिश्र जब गीले कपड़े से इन पुराने पन्नों को पोंछते हैं, तो उस पर उकेरे गए शब्द और भी स्पष्ट और चमकदार दिखाई देने लगते हैं। यह गुण इन्हें किसी भी अन्य पुराने रिकॉर्ड से अलग खड़ा करता है। सामान्य तौर पर कोई भी लकड़ी या पत्ती पानी के संपर्क में आने पर सड़ने या गलने लगती है, लेकिन बजरबट्टू के पेड़ की छाल और पत्तियों में प्राकृतिक रूप से ऐसी प्रतिरोधक क्षमता होती है कि इन्हें दशकों तक कुछ नहीं होता। जानकारों का मानना है कि यदि इन दस्तावेजों का उचित रखरखाव किया जाए, तो ये 700 से 800 साल तक और भी सुरक्षित रह सकते हैं।

संग्रहालय में संरक्षण की आवश्यकता

वर्तमान में ये अमूल्य दस्तावेज निजी प्रयासों से सुरक्षित रखे जा रहे हैं, लेकिन इनकी ऐतिहासिक महत्ता को देखते हुए इन्हें किसी संग्रहालय में रखने की बात कही जा रही है ताकि भविष्य की पीढ़ियां भी इसे देख सकें। बजरबट्टू की पत्तियां लगभग तीन से पांच फीट लंबी और काफी चौड़ी होती हैं। इनमें लिखने के लिए मुख्य रूप से तीन फीट तक की पत्तियों का प्रयोग किया जाता था। हमारे पूर्वज दूर-दराज के क्षेत्रों से इन पत्तियों को मंगवाते थे और अपनी संस्कृति एवं वंश परंपरा को दर्ज करते थे ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से जुड़ी रह सकें। यह महज एक दस्तावेज नहीं, बल्कि मिथिला की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रमाण है जो आज भी अपनी मूल चमक के साथ समय की मार को झेल रहा है।

https://hindi.news18.com/news/bihar/madhubani-500-year-old-documents-on-bajrabattu-leaf-local18-ws-l-10647246.html