बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाले आगामी उपचुनाव को लेकर सियासी तापमान बढ़ गया है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने इस सीट पर एक बेहद चौंकाने वाला फैसला लिया है। पार्टी के घोषित उम्मीदवार अभिषेक कुमार बंटी ने नामांकन दाखिल करने के ठीक अगले ही दिन अचानक अपना नाम वापस ले लिया। हालांकि, बंटी ने सार्वजनिक तौर पर इसके पीछे व्यक्तिगत कारणों का हवाला दिया है, लेकिन राजनीतिक गलियारों और बीजेपी के भीतर इस फैसले के पीछे की कहानी कुछ और ही बयां कर रही है। सूत्रों के मुताबिक, बंटी के टिकट कटने और नामांकन वापस लेने के पीछे मुख्य वजह उनके परिवार का बहुचर्चित चारा घोटाले से पुराना जुड़ाव होना है। इसके अलावा उनके शैक्षणिक दस्तावेजों में पाई गई विसंगतियों को भी एक बड़ा कारण माना जा रहा है।
चारा घोटाले का साया और टिकट कटने की कहानी
पार्टी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, अभिषेक कुमार बंटी के पिता रविन्द्र प्रसाद का नाम बिहार के सबसे बड़े राजनीतिक घोटालों में से एक, यानी चारा घोटाले में शामिल रहा है। रविन्द्र प्रसाद सिन्हा 'मेसर्स मगध केमिकल्स कॉर्पोरेशन' नामक कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत थे। जांच के दौरान यह बात सामने आई थी कि यह कंपनी चारा घोटाले के खेल में गहराई से संलिप्त थी। रविन्द्र प्रसाद पर आरोप था कि उन्होंने सरकारी अधिकारियों के साथ मिलकर फर्जी बिलों के सहारे सरकारी खजाने से अवैध रूप से बड़ी रकम निकाली थी।
साल 2022 में सीबीआई की विशेष अदालत ने इस मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। अदालत ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव समेत कुल 99 अभियुक्तों पर फैसला सुनाया था, जिसमें से 75 आरोपियों को दोषी करार दिया गया था। इन दोषियों में अभिषेक बंटी के पिता रविन्द्र प्रसाद भी शामिल थे। विशेष अदालत ने रविन्द्र प्रसाद को दोषी पाते हुए 3 साल की सजा सुनाई थी और उन पर 50,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया था। सीबीआई ने इस बेहद संवेदनशील डोरंडा ट्रेजरी मामले में अवैध निकासी को लेकर साल 2001 से 2003 के बीच कुल 3 चार्जशीट दाखिल की थी, जिसमें रविन्द्र प्रसाद को आरोपी बनाया गया था। ऐसे में बीजेपी के नेतृत्व को लगा कि बंटी को टिकट देने से विपक्षी दलों को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पार्टी को घेरने का मौका मिल जाएगा, जो पार्टी की नीति के खिलाफ जाता।
नामांकन में गलत जानकारी और बीजेपी का सुरक्षित कदम
टिकट कटने की कहानी केवल चारा घोटाले तक ही सीमित नहीं है। सूत्रों का यह भी दावा है कि अभिषेक ने नामांकन में गलत जानकारी भी दी थी। उन्होंने अपनी पढ़ाई से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां छिपाने की कोशिश की थी। अभिषेक ने नॉमिनेशन में खुद को 10वीं पास बताया था, लेकिन उनके रिजल्ट में कुछ बड़ी गड़बड़ियां पाई गई थीं। ऐसे में स्क्रूटनी के दौरान उनके नॉमिनेशन के रद्द होने की पूरी संभावना बन रही थी। उपचुनाव के इस महत्वपूर्ण मोड़ पर किसी भी तरह की तकनीकी या कानूनी जटिलता से बचने के लिए, बीजेपी ने कोई रिस्क नहीं लेते हुए बेहद सुरक्षित रास्ता चुना और बंटी का नामांकन वापस करवाने का फैसला किया।
नीरज कुमार सिन्हा की एंट्री और उनका राजनीतिक सफर
अभिषेक कुमार बंटी के मैदान से हटने के तुरंत बाद बीजेपी ने नीरज कुमार सिन्हा को चुनाव मैदान में उतारने का निर्णय लिया। टिकट मिलने के बाद अपनी प्रतिक्रिया देते हुए नीरज कुमार सिन्हा ने कहा, "पार्टी लीडरशिप ने मुझे मौका दिया है। मैं उनके काम को आगे बढ़ाऊंगा और राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के मार्गदर्शन में काम करूंगा। कोई चुनौती नहीं है। वे सभी बड़े भाई जैसे हैं और मुझे उनका आशीर्वाद मिलेगा। मैं पार्टी के सभी कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर चुनाव लड़ूंगा।"
पटना के रहने वाले नीरज कुमार सिन्हा पिछले लगभग 20 साल से बीजेपी के समर्पित सिपाही के रूप में काम कर रहे हैं। वह साल 2006 में पार्टी के प्राथमिक सदस्य बने थे। उन्होंने राजनीति की शुरुआत बिल्कुल जमीनी स्तर से की थी। सिन्हा ने नरेंद्र भारती मंडल में बूथ प्रमुख के रूप में जिम्मेदारी संभाली और बाद में मंडल महामंत्री के रूप में काम किया। उनकी संगठनात्मक क्षमताओं और युवा पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ उनके जुड़ाव को देखते हुए पार्टी ने उन्हें बीजेपी युवा मोर्चा का जिला उपाध्यक्ष नियुक्त किया था।
बीए ग्रेजुएट नीरज सिन्हा एक ऐसे परिवार से आते हैं जिसका नाता जनसंघ के समय से ही बीजेपी की वैचारिक जड़ों से जुड़ा रहा है। उनके चाचा नरेंद्र भारती जनसंघ के दौर के बेहद सक्रिय कार्यकर्ता थे, जिनका साल 1984 में निधन हो गया था। उनके निधन के बाद, उनके अद्वितीय योगदान को सम्मान देते हुए स्थानीय मंडल का नाम उनके नाम पर नरेंद्र भारती मंडल रखा गया था।
https://www.indiatv.in/bihar/why-bjp-candidate-abhishek-bunty-withdraw-his-nomination-from-bankipur-by-election-read-inside-story-2026-07-10-1230497