बस्तर में बदली फिजा: नक्सलवाद का साया छंटते ही अपने घरों को लौट रहे विस्थापित परिवार

नक्सल हिंसा के खौफ से कभी अपना घर छोड़ने को मजबूर हुए बस्तर के परिवार अब वापस लौट रहे हैं, सरकार उनके लिए बुनियादी सुविधाओं का जाल बिछा रही है।

बस्तर में नई उम्मीदों का सवेरा

एक लंबे समय तक नक्सल हिंसा की आग में झुलसने के बाद बस्तर के हालात तेजी से बदल रहे हैं। कभी डर और दहशत के कारण अपना पुश्तैनी गांव छोड़कर दूसरे इलाकों में शरण लेने को मजबूर हुए ग्रामीण अब अपने घरों की ओर वापस रुख कर रहे हैं। बस्तर में शांति की बहाली के साथ ही स्थानीय निवासियों में नई उम्मीदें जगी हैं। इस बदलाव के पीछे का सबसे बड़ा कारण क्षेत्र में नक्सली गतिविधियों में आई कमी है, जिसके चलते प्रशासन अब इन परिवारों के पुनर्वास के लिए युद्धस्तर पर काम कर रहा है। सरकार का मुख्य उद्देश्य इन लोगों को सुरक्षित, स्थायी और सम्मानजनक जीवन मुहैया कराना है।

सड़क और बुनियादी ढांचे का विस्तार

वापस लौट रहे परिवारों के लिए बुनियादी सुविधाएं सबसे बड़ी प्राथमिकता है। बस्तर के कलेक्टर आकाश छिकारा ने जानकारी दी कि सरकार गांवों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए बुनियादी ढांचे को मजबूत कर रही है। इसमें विशेष रूप से सड़क निर्माण पर जोर दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत विकास कार्यों को गति दी गई है। आंकड़ों के अनुसार, इस योजना के चौथे चरण के तहत दो बड़े बैच में निर्माण कार्य प्रस्तावित हैं:

  • योजना के प्रथम बैच (बैच-1) के अंतर्गत 236 किलोमीटर लंबी सड़क निर्माण के लिए मंजूरी पहले ही दी जा चुकी है।
  • योजना के द्वितीय बैच (बैच-2) में 292 किलोमीटर लंबी सड़कों का प्रस्ताव तैयार कर लिया गया है, जिस पर काम जल्द ही शुरू किया जाएगा।

इन सड़कों का निर्माण न केवल आवागमन को सुगम बनाएगा बल्कि उन सुदूर गांवों तक राशन, चिकित्सा और अन्य सरकारी सेवाओं की पहुंच को भी सुनिश्चित करेगा, जो वर्षों से इन सुविधाओं से वंचित थे।

ग्रामीणों की घर वापसी की कहानी

जमीनी स्तर पर स्थिति किस तरह बदल रही है, इसे कोलेंग-छिंगगुर गांव के निवासी फुलदेव ठाकुर के अनुभव से समझा जा सकता है। उन्होंने बताया कि नक्सली आतंक के उस बुरे दौर में गांव के कई परिवार अपनी जान बचाकर पलायन कर गए थे। उनके अनुसार, कभी उस गांव में कुल 107 परिवार निवास करते थे, जिनमें से 60 से 70 परिवार हिंसा के डर से घर छोड़ने पर मजबूर हो गए थे। अब हालात सुधरने के साथ ही इनमें से 30 से अधिक परिवार वापस अपने पुराने घरों में लौट आए हैं और वे फिर से अपनी गृहस्थी जमाने की जद्दोजहद में जुटे हैं। फुलदेव ठाकुर के शब्दों में, दूसरी जगहों पर उनके पास न तो पर्याप्त जमीन थी और न ही कोई स्थायी ठिकाना, इसलिए शांति बहाली होते ही उनकी पहली पसंद अपना पैतृक गांव ही था।

सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का सहारा

वापस लौटने वाले परिवारों के लिए राज्य सरकार कई कल्याणकारी योजनाओं का लाभ सुनिश्चित कर रही है। हाल ही में सरकार ने स्पष्ट किया था कि बालेबेड़ा और गरपा जैसे गांवों में विस्थापितों की वापसी के लिए रास्ते पूरी तरह से खुल चुके हैं। इन परिवारों को प्रधानमंत्री आवास योजना के माध्यम से पक्के घर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। पुनर्वास प्रक्रिया के तहत केवल आवास ही नहीं, बल्कि स्कूल और शुद्ध पेयजल जैसी अनिवार्य सुविधाओं को भी पुनर्जीवित किया जा रहा है। शासन का कहना है कि सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था के साथ ही बस्तर का सर्वांगीण विकास ही वह एकमात्र जरिया है जिससे लोग अपने गांव में स्थायी रूप से बस सकेंगे। बस्तर में अब धीरे-धीरे रौनक लौट रही है और प्रशासनिक अमला यह सुनिश्चित करने में जुटा है कि लौटने वाले परिवारों को किसी भी प्रकार की कठिनाई का सामना न करना पड़े।

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