शतावरी की खेती: कम लागत और बंपर कमाई का जरिया, दवा कंपनियों में है भारी डिमांड

पारंपरिक खेती से हटकर शतावरी की खेती करना किसानों के लिए मुनाफे का सौदा साबित हो सकता है। यह औषधीय फसल न केवल बाजार में ऊंचे दामों पर बिकती है, बल्कि इसमें जोखिम भी बेहद कम है।

खेती में नया बदलाव और शतावरी की बढ़ती लोकप्रियता

वर्षा ऋतु का आगमन होते ही देशभर के किसान अपनी कृषि योजनाओं में जुट जाते हैं। सामान्य तौर पर किसान पारंपरिक फसलों की बुवाई पर जोर देते हैं, लेकिन इस बार अगर वे अपनी रणनीति में थोड़ा बदलाव करें, तो कम लागत में भी मोटी कमाई कर सकते हैं। इन दिनों खेती के जानकारों के बीच शतावरी की फसल चर्चा का विषय बनी हुई है। औषधीय गुणों से भरपूर होने के कारण इसकी मांग केवल स्थानीय बाजारों में ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर फार्मास्युटिकल क्षेत्र में भी तेजी से बढ़ रही है।

क्यों खास है शतावरी की खेती

शतावरी एक अत्यंत महत्वपूर्ण औषधीय पौधा है, जिसकी जड़ों का उपयोग विभिन्न प्रकार की दवाओं के निर्माण में किया जाता है। आयुर्वेद से लेकर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान तक में इसकी जड़ें प्रमुखता से इस्तेमाल होती हैं। विशेष रूप से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्युनिटी बढ़ाने और महिला स्वास्थ्य से जुड़े टॉनिक बनाने में इसकी भारी मांग रहती है। यही कारण है कि देश की बड़ी फार्मा कंपनियां किसानों से सीधे संपर्क कर इसे अच्छे भाव पर खरीदती हैं। खंडवा के कृषि सलाहकार नवनीत रेवापाटी के अनुसार, जुलाई से लेकर सितंबर तक का समय शतावरी की रोपाई के लिए सबसे अनुकूल माना जाता है।

खेती के लिए अनुकूल परिस्थितियां

शतावरी की खेती उन किसानों के लिए एक आसान विकल्प है जो देखभाल के झंझट से बचना चाहते हैं। यह फसल रेतीली या दोमट मिट्टी में बहुत अच्छी तरह पनपती है। हालांकि, किसानों को इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि खेत में जलभराव की स्थिति न हो, क्योंकि अधिक पानी जमा रहने से फसल के सड़ने का खतरा बना रहता है। इस फसल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें कीटनाशकों का खर्च नगण्य है। इसके अलावा, पौधा कांटेदार होने की वजह से आवारा पशु भी इसे नुकसान नहीं पहुंचा पाते हैं, जिससे फसलों की सुरक्षा का अतिरिक्त खर्च बच जाता है। किसानों को केवल समय-समय पर निराई-गुड़ाई और हल्की सिंचाई पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है।

धैर्य का फल और आर्थिक लाभ

शतावरी की फसल का उत्पादन लेने के लिए किसानों को 18 महीने यानी करीब डेढ़ साल का धैर्य रखना पड़ता है। फसल तैयार होने पर इसकी जड़ें खोदी जाती हैं और उन्हें सुखाया जाता है। यही सूखी हुई जड़ें बाजार में उच्च मूल्य पर बिकती हैं। उत्पादन की बात करें तो एक एकड़ भूमि से लगभग 20 से 25 क्विंटल तक पैदावार आसानी से प्राप्त की जा सकती है। आर्थिक दृष्टि से देखें तो बाजार में शतावरी का भाव 20 हजार रुपये से 30 हजार रुपये प्रति क्विंटल तक मिल जाता है। इस प्रकार, एक एकड़ खेती से किसान साल में 5 से 6 लाख रुपये तक का मुनाफा कमा सकते हैं। हालांकि शुरुआत में बीज, खाद और श्रम पर थोड़ा निवेश करना पड़ता है, लेकिन फसल तैयार होने के बाद मिलने वाला प्रतिफल इस लागत की भरपाई कई गुना बढ़कर करता है।

जोखिम मुक्त और सुरक्षित निवेश

कई किसान इसे खेती का फिक्स्ड डिपॉजिट भी कहते हैं। इसका कारण यह है कि इसमें जोखिम का स्तर बहुत कम होता है। चूंकि इसमें कीटों का प्रकोप कम है और पशुओं से होने वाली हानि की आशंका नहीं है, इसलिए इसे लंबी रेस का घोड़ा माना जाता है। बस एक बार निवेश करने और सही समय तक देखभाल करने पर आपको निश्चित और शानदार परिणाम मिलते हैं।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती मांग

वर्तमान समय में शतावरी का क्रेज केवल भारत तक सीमित नहीं है। विदेशों में भी इसके औषधीय और स्वास्थ्यवर्धक गुणों की पहचान हुई है, जिससे अंतरराष्ट्रीय निर्यात की संभावनाएं भी खुल गई हैं। इसकी गुणवत्ता और औषधीय क्षमता के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी इसे प्रीमियम दाम मिल रहे हैं। यदि किसान पारंपरिक खेती के ढर्रे से बाहर निकलकर कुछ नवाचार करना चाहते हैं, तो शतावरी एक मजबूत और लाभदायक विकल्प है। उचित तकनीकी जानकारी और धैर्य के साथ की गई यह खेती न केवल किसानों की आय बढ़ाएगी, बल्कि उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भी बनाएगी।

https://hindi.news18.com/news/agriculture/farmers-can-cultivate-shatavari-medicinal-plant-for-high-profits-at-low-cost-local18-10643980.html