धान की खेती में पारंपरिक तरीके से छुटकारा
धान की खेती भारत में किसानों के लिए आय का मुख्य जरिया है, लेकिन पारंपरिक तरीके से धान उगाना काफी जटिल प्रक्रिया रही है। इसमें नर्सरी तैयार करने से लेकर बिचड़ा उखाड़ने और फिर खेत में रोपाई करने तक का सफर काफी लंबा और खर्चीला होता है। इस पूरी प्रक्रिया में न केवल अत्यधिक श्रम की आवश्यकता होती है, बल्कि मजदूरी और पानी की खपत भी बहुत अधिक होती है। अब कृषि विज्ञान ने इसका एक बेहद आसान और प्रभावी विकल्प पेश किया है, जिसे डायरेक्ट सीडेड राइस यानी डीएसआर तकनीक कहा जाता है। यह तकनीक किसानों के लिए समय की बचत करने वाली और लागत घटाने वाली साबित हो रही है।
सीधी बुआई तकनीक के बड़े फायदे
कृषि वैज्ञानिक सौरभ शंकर पटेल के मुताबिक, डीएसआर तकनीक का सबसे बड़ा लाभ खेती की लागत में कमी आना है। इस विधि में नर्सरी की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे बिचड़ा उखाड़ने और रोपाई के लिए होने वाले खर्च की सीधी बचत होती है। अगर कभी मानसून आने में देरी हो जाए और किसान समय पर पारंपरिक नर्सरी तैयार करने में पिछड़ जाएं, तो भी उन्हें घबराने की जरूरत नहीं है। ऐसे समय में किसान जुलाई के महीने में कम अवधि वाली धान की किस्मों का चयन कर सीधे खेतों में बुआई कर सकते हैं। इस आधुनिक तकनीक का एक बड़ा लाभ यह भी है कि इसमें पानी की भारी बचत होती है, जो पर्यावरण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
किस्मों का चयन और फसल की अवधि
अक्सर किसानों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या सीधी बुआई करने से फसल पकने में ज्यादा समय लेती है। वैज्ञानिक स्पष्ट करते हैं कि सीधी बुआई और पारंपरिक रोपाई में फसल तैयार होने के समय में कोई विशेष अंतर नहीं होता है। धान की मुख्य रूप से 110 दिन, 130 दिन और 150 दिन वाली किस्में बाजार में उपलब्ध हैं। सीधी बुआई के लिए 110 दिन वाली किस्मों को सबसे उपयुक्त माना जाता है। किसान जिस दिन खेत में बीज डालते हैं, उससे अगले 110 दिनों के भीतर फसल कटाई के लिए पूरी तरह तैयार हो जाती है। हालांकि, बीज की मात्रा के मामले में यह पारंपरिक विधि से थोड़ी अलग है। जहाँ पारंपरिक रोपाई में प्रति एकड़ लगभग 6 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है, वहीं सीधी बुआई में प्रति एकड़ करीब 8 किलोग्राम बीज का उपयोग करना पड़ता है। मजदूरी के खर्च में भारी कमी आने के कारण, बीज की बढ़ी हुई लागत पूरी तरह संतुलित हो जाती है और किसान अंत में लाभ में ही रहते हैं।
खरपतवार नियंत्रण की चुनौती और समाधान
धान की सीधी बुआई में सबसे बड़ी चुनौती खेत में उगने वाली अनावश्यक घास और खरपतवार की होती है, जो मुख्य फसल को नुकसान पहुँचा सकते हैं। इसे नियंत्रित करने के लिए कृषि वैज्ञानिक दो चरणों वाली रणनीति अपनाने की सलाह देते हैं। बुआई के तुरंत बाद, यानी 0 से 3 दिनों के भीतर, पहले चरण के रूप में प्री-इमर्जेंस हर्बीसाइड का छिड़काव करना अनिवार्य है। इसके लिए पेंडीमेथालिन दवा का प्रयोग करना चाहिए, जिसकी मात्रा लगभग 3.3 लीटर प्रति हेक्टेयर तय की गई है। यह शुरुआती दौर में ही खरपतवार को पनपने से रोकने में मदद करती है।
दूसरा चरण और पौधों की उचित देखभाल
यदि पहले छिड़काव के बाद भी खेत में खरपतवार दिखाई देते हैं, तो किसानों को दूसरा कदम उठाना चाहिए। बुआई के 25 से 30 दिन बाद जब धान के पौधे छोटे हों और खरपतवार का असर नजर आए, तब बिस्पायरीबैक सोडियम दवा का छिड़काव करना चाहिए। इसकी निर्धारित मात्रा लगभग 60 ग्राम प्रति एकड़ है। सौरभ शंकर पटेल का मानना है कि यदि किसान इन दोनों दवाओं का सही समय पर और सही अनुपात में इस्तेमाल करें, तो खरपतवार की समस्या जड़ से समाप्त हो जाती है। इससे फसल को भरपूर पोषण मिलता है, पौधों की बढ़वार शानदार होती है और उत्पादन पारंपरिक तरीके के बराबर ही प्राप्त होता है, जबकि कुल लागत कम होने से मुनाफे का प्रतिशत काफी बढ़ जाता है।
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