खेती में विविधता और चिरचिरा का बढ़ता चलन
बिहार की पहचान हमेशा से उसकी समृद्ध कृषि परंपराओं से रही है। राज्य में धान, गेहूं और मक्का जैसी पारंपरिक फसलों के साथ ही सब्जियों की खेती भी व्यापक स्तर पर की जाती है। आम तौर पर बाजार में बैंगन, भिंडी, करेला, नेनुआ और लौकी जैसी सब्जियां आसानी से उपलब्ध रहती हैं, लेकिन अब किसान नई किस्मों की ओर भी रुख कर रहे हैं। इसी क्रम में चिरचिरा नाम की एक ऐसी सब्जी सामने आई है, जिसे ग्रामीण क्षेत्रों में इसके स्वाद और पोषक गुणों के कारण विशेष पसंद किया जा रहा है। पूर्वी चंपारण जिले के किसान अब इस सब्जी को बड़े पैमाने पर उगाकर अपनी आमदनी को नई दिशा दे रहे हैं।
खेती का तरीका और मचान की भूमिका
पूर्वी चंपारण के हरसिद्धि और पहाड़पुर प्रखंड के किसानों ने चिरचिरा की खेती में महारत हासिल की है। पहाड़पुर प्रखंड के बलुआ गांव में रहने वाले किसान चंद्रेश्वर प्रसाद पिछले कई सालों से इसकी खेती को सफलतापूर्वक कर रहे हैं। उनके अनुसार, चिरचिरा की खेती का प्रबंधन करना बहुत जटिल नहीं है। इसकी खेती की प्रक्रिया काफी हद तक नेनुआ और लौकी जैसी सब्जियों के समान होती है। किसान सबसे पहले खेत में बांस का एक मजबूत मचान तैयार करते हैं, जिसके सहारे इसकी बेलें ऊपर की ओर बढ़ती हैं। जब बेलें मचान पर फैल जाती हैं, तो उस पर लंबे और आकर्षक फल लटकने लगते हैं, जो दिखने में भी काफी अलग होते हैं।
बुआई और तुड़ाई का सही समय
चिरचिरा की खेती के लिए सबसे अनुकूल समय गर्मी का मौसम माना जाता है। चंद्रेश्वर प्रसाद बताते हैं कि इसकी बुआई या रोपाई का काम फरवरी से जून के बीच कभी भी किया जा सकता है। रोपाई के ठीक दो महीने बाद पौधों में फल आने लगते हैं। एक बार जब फल आने शुरू हो जाते हैं, तो किसान अगले दो से तीन महीने तक लगातार इसकी तुड़ाई कर सकते हैं। यह दीर्घकालिक उत्पादन किसानों के लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद साबित होता है। हालांकि, इसकी अच्छी पैदावार के लिए खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखना एक आवश्यक शर्त है। यदि नियमित सिंचाई की जाए और मिट्टी में नमी बनी रहे, तो पौधों पर फलों का गुच्छा बहुत अच्छा होता है और पैदावार में वृद्धि होती है।
स्वाद और रसोई में उपयोग
चिरचिरा का स्वाद लोगों को काफी आकर्षित करता है। इसे खाने वाले लोग बताते हैं कि इसका स्वाद काफी हद तक नेनुआ जैसा होता है, फिर भी इसकी अपनी एक विशिष्ट पहचान है। ग्रामीण क्षेत्रों में इसे अक्सर गर्म मसालों के साथ पकाकर मुख्य व्यंजन के रूप में परोसा जाता है। चिरचिरा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह अंदर से खोखला होता है। यही कारण है कि यह भरवां सब्जी बनाने के लिए एक आदर्श विकल्प है। जिस प्रकार लोग भरवां करेला या भरवां परवल चाव से खाते हैं, उसी तरह गांव के घरों में भरवां चिरचिरा की काफी मांग रहती है। जब फसल पूरी तरह तैयार हो जाती है, तो मचान पर लटके हुए लंबे फल खेत की शोभा तो बढ़ाते ही हैं, साथ ही किसानों के लिए कमाई का जरिया भी बनते हैं।
बाजार में मांग और भविष्य की संभावनाएं
भले ही अभी चिरचिरा शहरों के मुख्य बाजारों में पूरी तरह से अपनी जगह न बना पाया हो, लेकिन ग्रामीण इलाकों में इसकी मांग काफी अधिक है। अपने अनोखे आकार और स्वाद के चलते यह सामान्य सब्जियों की तुलना में अलग पहचान रखता है। पूर्वी चंपारण के कई किसान इसकी खेती को अपनाकर न केवल भरपूर उपज ले रहे हैं, बल्कि बेहतर मुनाफा भी कमा रहे हैं। कृषि के क्षेत्र में यह बदलाव यह दर्शाता है कि अगर किसान थोड़ी सी तकनीक और समझ का उपयोग करें, तो नई किस्मों के माध्यम से खेती को अधिक लाभदायक बनाया जा सकता है।
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