बिहार में पार्ट-टाइम पीएचडी: नौकरी के साथ पढ़ाई करने के नियम क्या हैं, जानिए एक्सपर्ट की राय

बिहार के विश्वविद्यालयों में अब पार्ट-टाइम पीएचडी करना आसान हो गया है। जानिए कि नौकरीपेशा लोगों को डिग्री पूरी करने के लिए अपनी जॉब छोड़ने की जरूरत है या नहीं और क्या हैं नए नियम।

बिहार के विश्वविद्यालयों में पीएचडी के बदले नियम

बिहार के सभी विश्वविद्यालयों में पीएचडी करने की प्रक्रिया और नियमों में एक बड़ा बदलाव किया गया है। लोकभवन की ओर से हाल ही में नया यूनिफॉर्म ऑर्डिनेंस एंड रेगुलेशन 2026 लागू किया गया है। इन नए दिशा-निर्देशों के तहत पीएचडी के तौर-तरीकों को पूरी तरह से बदल दिया गया है। सबसे बड़ी राहत उन लोगों के लिए है जो पहले से ही किसी सरकारी या निजी संस्थान में नौकरी कर रहे हैं और अपनी शैक्षणिक योग्यता बढ़ाना चाहते हैं। अब उन्हें पार्ट-टाइम पीएचडी करने की सुविधा मिलेगी। इस नई व्यवस्था के लागू होने के बाद छात्रों के मन में यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या नौकरी और पीएचडी साथ-साथ संभव है, या इसके लिए करियर से ब्रेक लेना पड़ेगा?

क्या नौकरी छोड़ना अनिवार्य है?

इस महत्वपूर्ण सवाल का जवाब जानने के लिए पटना विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अखिलेश कुमार सिंह से विस्तृत बातचीत की गई है। एक्सपर्ट का कहना है कि पार्ट-टाइम पीएचडी का लाभ लेने वाले किसी भी व्यक्ति को अपनी मौजूदा नौकरी छोड़ने की कोई आवश्यकता नहीं है। हालांकि, शोध कार्य के दौरान कुछ विशेष शर्तों और समय सीमा का पालन करना जरूरी होगा। यदि कोई कर्मचारी पीएचडी करना चाहता है, तो उसे अपनी संस्था से जरूरी अवकाश या एनओसी प्राप्त करने की आवश्यकता होगी। इसे आप पीएचडी की पढ़ाई और जॉब के बीच एक संतुलन बनाने की प्रक्रिया के तौर पर देख सकते हैं।

पार्ट-टाइम पीएचडी की चयन प्रक्रिया और शर्तें

डॉ. अखिलेश कुमार ने स्पष्ट किया कि पार्ट-टाइम पीएचडी में दाखिला लेना इतना आसान नहीं होगा। इसके लिए कुछ मानक तय किए गए हैं:

  • दाखिले का आधार: पार्ट-टाइम पीएचडी में भी प्रवेश उसी चयन प्रक्रिया से होगा जो रेगुलर पीएचडी के लिए निर्धारित है।
  • योग्यता: उम्मीदवार को NET परीक्षा पास करना अनिवार्य है और इसके बाद विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित इंटरव्यू में भी सफल होना होगा।
  • सीटों की संख्या: किसी भी विभाग में एक समय में अधिकतम चार अभ्यर्थियों को ही पार्ट-टाइम पीएचडी के लिए सीट दी जाएगी।
  • एनओसी (NOC): आवेदक को अपने संस्थान से अनापत्ति प्रमाण पत्र यानी एनओसी लेना आवश्यक होगा।

कोर्सवर्क और उपस्थिति के नियम

पीएचडी के शुरुआती दौर में शोधार्थी को कैंपस में सक्रिय रहना पड़ेगा। नए नियमों के मुताबिक, पीएचडी शुरू होने के पहले छह महीने कोर्सवर्क के होते हैं। इस दौरान शोधार्थी को अपने संबंधित विभाग में नियमित रूप से उपस्थित होना अनिवार्य है। इसके लिए नौकरीपेशा व्यक्ति को अपने विभाग या कंपनी से छुट्टी लेनी होगी और उनसे संबंधित दस्तावेज विश्वविद्यालय में जमा करने होंगे।

इसके अलावा, पूरे पीएचडी कार्यकाल के दौरान छात्र को कुल 90 दिन विभाग में बिताने होंगे। यह ध्यान रखने वाली बात है कि ये 90 दिन लगातार नहीं बिताने हैं। पीएचडी की सामान्य अवधि 3 से 6 वर्ष होती है, जिसमें 2 वर्ष का विस्तार भी मिल सकता है। इस प्रकार कुल 8 वर्षों के अंतराल में शोधार्थी अपनी सुविधा अनुसार कभी भी कुल 90 दिन विभाग में उपस्थिति दर्ज करा सकता है। यह नियम उन लोगों के लिए बेहद व्यावहारिक है जो पूरी अवधि के लिए लंबी छुट्टी नहीं ले सकते।

बिहार के लिए यह बदलाव क्यों है खास?

डॉ. अखिलेश कुमार के अनुसार, अब तक पार्ट-टाइम पीएचडी की सुविधा केवल देश के तकनीकी संस्थानों जैसे IIT और NIT तक ही सीमित थी। लेकिन अब बिहार के सामान्य विश्वविद्यालयों जैसे मगध विश्वविद्यालय, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय और पटना विश्वविद्यालय जैसे अन्य राज्य स्तरीय विश्वविद्यालयों में भी इसे लागू कर दिया गया है। यह कदम शिक्षा के क्षेत्र में मील का पत्थर माना जा रहा है क्योंकि अब सरकारी और निजी क्षेत्र के कर्मचारी अपनी आर्थिक स्थिति को प्रभावित किए बिना अपनी उच्च शिक्षा पूरी करने का सपना देख सकते हैं। यह व्यवस्था न केवल शैक्षणिक स्तर को बढ़ाएगी, बल्कि कामकाजी पेशेवरों के लिए शोध के नए द्वार भी खोलेगी।

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