नागपुर में चोरी के ट्रकों का अंतर्राज्यीय सिंडिकेट बेनकाब, फर्जी रजिस्ट्रेशन के जरिए करोड़ों का खेल

नागपुर पुलिस और आरटीओ ने मिलकर एक ऐसे बड़े गिरोह का पर्दाफाश किया है जो चोरी किए गए ट्रकों के फर्जी दस्तावेज तैयार कर उन्हें नए वाहनों के रूप में देशभर में बेचता था। अब तक 1,587 संदिग्ध ट्रकों की पहचान की जा चुकी है और मामले में जांच तेजी से जारी है।

ट्रकों की चोरी और फर्जीवाड़ा: पुलिस का बड़ा खुलासा

नागपुर में एक ऐसे संगठित गिरोह का भंडाफोड़ हुआ है जो चोरी के ट्रकों को फर्जी दस्तावेजों के सहारे दोबारा पंजीकृत करवाकर अलग-अलग राज्यों में खपा रहा था। इस पूरे मामले में कपिल नगर पुलिस थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई है। नागपुर ग्रामीण आरटीओ अधिकारी विजय चौहान ने बताया कि यह आपराधिक नेटवर्क मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में अपने पैर पसारे हुए था। यह गिरोह चोरी किए गए पुराने ट्रकों के कागजात में हेराफेरी करता था और फिर उन्हें ऑनलाइन सिस्टम पर नई गाड़ी के तौर पर दर्ज करवाकर बेच देता था।

जांच में सामने आईं गंभीर अनियमितताएं

आरटीओ अधिकारी विजय चौहान के मुताबिक विभाग के पास वर्तमान में 1,587 ऐसे ट्रकों का डाटा मौजूद है जिनके चेसिस नंबर काफी संदिग्ध हैं। जांच के दौरान इन वाहनों में गंभीर खामियां पाई गई हैं। इस बड़े फर्जीवाड़े के खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए अब तक 495 ट्रकों पर कानूनी कार्रवाई की जा चुकी है और विभिन्न थानों में मामले दर्ज किए गए हैं। इसके अतिरिक्त आरटीओ ने अपने प्रशासनिक अधिकारों का उपयोग करते हुए 223 वाहनों का रजिस्ट्रेशन तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया है।

इस गिरोह का काम करने का तरीका बेहद शातिर था। वे सबसे पहले मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना जैसे राज्यों से चोरी किए गए ट्रकों के लिए मैन्युअल दस्तावेज तैयार करते थे। इन दस्तावेजों पर जाली मुहरें और औपचारिकताएं पूरी करने के बाद इन्हें नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश भेजा जाता था।

नई गाड़ी बताकर बेचा जाता था पुराना ट्रक

विजय चौहान ने खुलासा किया कि मैन्युअल कागजात तैयार करने के बाद वाहन पोर्टल यानी VAHAN पर ट्रकों का ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन किया जाता था। सिस्टम में यह दर्शाया जाता था कि वाहन पूरी तरह से नया है। प्रक्रिया के करीब 10 दिन बाद वहां से अनापत्ति प्रमाण पत्र यानी एनओसी प्राप्त कर ली जाती थी। इसके बाद इन ट्रकों को उन राज्यों में भेजा जाता था जहां खरीदार पहले से ही तय होते थे। वहां इन ट्रकों का दोबारा रजिस्ट्रेशन कराकर इन्हें नई गाड़ी के रूप में बाजार में बेच दिया जाता था और ये वाहन धड़ल्ले से सड़कों पर चलते थे।

कैसे पकड़ में आया यह फर्जीवाड़ा?

इस पूरे गोरखधंधे का खुलासा तब हुआ जब ये ट्रक फिटनेस टेस्ट के लिए आरटीओ कार्यालय पहुंचे। तकनीकी जांच के दौरान पाया गया कि कई वाहनों के चेसिस नंबर के साथ छेड़छाड़ की गई थी। कई ट्रकों पर ग्राइंडर के निशान मिले जिससे पता चला कि ओरिजिनल नंबर को मिटाकर नया नंबर डाला गया है। जब इन नंबरों की पुष्टि वाहन निर्माता कंपनियों से की गई तो चौंकाने वाला सच सामने आया। कंपनियों ने स्पष्ट कर दिया कि उन चेसिस नंबरों की गाड़ियां तो उन्होंने कभी बनाई ही नहीं थीं, यानी वे रिकॉर्ड में कहीं थे ही नहीं।

फर्जी कागजात तैयार करने की कार्यप्रणाली

जांच में यह भी स्पष्ट हुआ कि जिन राज्यों में ऑनलाइन पंजीकरण प्रणाली देरी से लागू हुई थी, वहां से पुराने रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट चुरा लिए जाते थे। इन्हीं पुरानी आरसी का उपयोग करके फर्जी दस्तावेज तैयार किए जाते थे। इन कागजों को आधार बनाकर नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश में ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पूरी की जाती थी।

नागालैंड की पंजीकरण व्यवस्था पर उठाए सवाल

आरटीओ अधिकारी विजय चौहान ने नागालैंड की पंजीकरण प्रक्रिया में बड़ी खामियों का दावा किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि वहां बिना वाहन के भौतिक निरीक्षण, मालिक की अनुपस्थिति और बिना किसी वैध स्थानीय पते के भी रजिस्ट्रेशन कर दिए जाते थे। मोटर वाहन अधिनियम के नियमों को ताक पर रखकर बिना गाड़ी देखे ही ऑनलाइन एंट्री कर दी जाती थी, जो कि सुरक्षा के लिहाज से बहुत खतरनाक है।

पुलिस की कार्रवाई और भविष्य की राह

पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर अपनी जांच का दायरा बढ़ा दिया है। 495 संदिग्ध ट्रकों के खिलाफ कार्रवाई के बाद अभी भी 1,000 से अधिक वाहनों का सत्यापन होना शेष है। आरटीओ ने स्पष्ट किया है कि जिन 223 वाहनों का पंजीकरण रद्द किया गया है, उन्हें सड़क पर चलने की अनुमति नहीं है। पुलिस ने नागपुर, मुंबई, मनमाड और चंद्रपुर जैसे शहरों में छापेमारी कर कई ट्रकों को जब्त भी किया है। आरटीओ का कहना है कि जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, इस सिंडिकेट से जुड़े और भी कई बड़े चेहरे सामने आएंगे।

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