सिंधिया राजघराने की 40 हजार करोड़ की संपत्ति का विवाद सुलझने की राह पर, तैयार हुआ नया बंटवारा फॉर्मूला

मध्य प्रदेश के प्रभावशाली सिंधिया राजपरिवार में वर्षों से चली आ रही 40 हजार करोड़ रुपये की संपत्ति की कानूनी जंग अब खत्म होने के करीब है। परिवार के सदस्यों के बीच सहमति बनने के बाद कोर्ट में समझौते का आवेदन दाखिल कर दिया गया है।

सिंधिया राजपरिवार के संपत्ति विवाद का पटाक्षेप

मध्य प्रदेश के सबसे चर्चित और शाही घरानों में शुमार सिंधिया राजपरिवार का दशकों पुराना संपत्ति विवाद अब समाधान की दहलीज पर खड़ा है। लंबे समय से चल रही अदालती खींचतान के बाद अब परिवार के सभी पक्ष इस बहुप्रतीक्षित समझौते के बेहद करीब पहुंच गए हैं। जानकारी के अनुसार, इस पूरे मामले को आपसी सहमति से सुलझाने के लिए एक विशेष फॉर्मूला तैयार कर लिया गया है और इसे आधिकारिक तौर पर अदालत के समक्ष प्रस्तुत भी कर दिया गया है। वर्तमान में यह मामला ग्वालियर की जिला अदालत में विचाराधीन है और इस पर अगली सुनवाई 20 जुलाई को तय की गई है।

अदालत में दाखिल हुआ सहमति पत्र

इस पारिवारिक विवाद में मुख्य रूप से ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनकी बुआएं, जिनमें वसुंधरा राजे, यशोधरा राजे और उषा राजे शामिल हैं, पक्षकार हैं। यह कानूनी लड़ाई केवल ग्वालियर तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसका दायरा दिल्ली, पुणे और मुंबई जैसे बड़े शहरों की अदालतों तक फैला हुआ था। अब खबर यह है कि परिवार के दोनों गुटों ने आपसी रजामंदी जताते हुए ग्वालियर जिला अदालत में समझौते के लिए औपचारिक आवेदन दाखिल कर दिया है। दोनों पक्षों के वकीलों ने बंटवारे से संबंधित सहमति पत्रों को कोर्ट में सौंपा है ताकि इस प्रक्रिया को कानूनी रूप से जल्द संपन्न किया जा सके। अदालत में होने वाली अगली सुनवाई के बाद यह उम्मीद जताई जा रही है कि संपत्ति बंटवारे का विवाद पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। साथ ही, समझौते पर मुहर लगते ही कोर्ट में लंबित करीब एक दर्जन से ज्यादा मुकदमे भी एक साथ खत्म हो जाएंगे।

क्या है समझौते का आधार?

प्राप्त जानकारी के अनुसार, तैयार किए गए फॉर्मूले में सभी पक्षों ने एक ऐसी व्यवस्था पर सहमति व्यक्त की है जिसे स्वीकार करना सभी के लिए सरल हो। समझौते का मुख्य आधार यह है कि वर्तमान में जिस संपत्ति पर जिस सदस्य का कब्जा या नियंत्रण है, वही उसका कानूनी मालिक माना जाएगा। पहले की मालिकाना हक की स्थिति चाहे किसी ट्रस्ट या कंपनी के नाम रही हो, लेकिन नए समझौते के बाद मौजूदा कब्जे को ही मालिकाना हक का आधार मानकर अदालत में डीड पंजीकृत कराई जाएगी। यह कदम विवाद के निस्तारण में सबसे अहम माना जा रहा है।

ट्रस्टों और पुरानी रंजिश का इतिहास

सिंधिया परिवार की अधिकांश संपत्तियां सीधे किसी व्यक्ति के नाम दर्ज होने के बजाय सर जयाजीराव ट्रस्ट और कृष्ण माधव ट्रस्ट जैसी संस्थाओं के अधीन आती हैं। इस पारिवारिक कलह की शुरुआत राजमाता विजयराजे सिंधिया और उनके बेटे माधवराव सिंधिया के बीच पैदा हुए मतभेदों से हुई थी। समय के साथ यह कड़वाहट अगली पीढ़ी तक पहुंची, जिसमें ज्योतिरादित्य सिंधिया का मुकाबला अपनी बुआओं वसुंधरा राजे, यशोधरा राजे, उषा राजे और स्वर्गीय पद्मावती राजे के साथ रहा। वर्षों से चली आ रही इस कशमकश के कारण कई बड़ी संपत्तियां विवादों के घेरे में फंसी रही थीं।

40 हजार करोड़ की शाही विरासत

सिंधिया राजघराने के पास मौजूद संपत्तियों का साम्राज्य अत्यंत विशाल है। इसमें ग्वालियर का प्रसिद्ध जय विलास पैलेस, उषा किरण पैलेस और शिवपुरी का माधव पैलेस जैसी बेशकीमती इमारतें शामिल हैं। इसके अलावा ग्वालियर-चंबल संभाग सहित दिल्ली, मुंबई, पुणे और उज्जैन जैसे शहरों में भी परिवार की अचल संपत्तियां मौजूद हैं। विशेषज्ञों और बाजार के जानकारों के मुताबिक, इस पूरी विरासत की कुल अनुमानित कीमत करीब 40 हजार करोड़ रुपये के आसपास है। अब सभी पक्षों की कोशिश यही है कि अदालत इस मामले को सर्वोच्च प्राथमिकता दे ताकि तैयार किए गए फॉर्मूले को कानूनी स्वीकृति मिल सके और लंबे समय से चले आ रहे इस शाही विवाद का स्थायी समाधान हो सके।

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