मेवाड़ और मारवाड़ की लाइफलाइन या मौत का साया, 1000 से ज्यादा मौतों के बाद भी 2000 करोड़ का प्रोजेक्ट क्यों ठंडे बस्ते में?

राजस्थान के पाली में देसूरी मार्ग हादसों का पर्याय बन चुका है, जहाँ साल 1952 से 2026 के बीच 1000 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। अरबों की लागत वाला प्रस्तावित प्रोजेक्ट अब भी फाइलों में अटका है, जिससे स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश है।

खतरनाक मोड़ और हादसों की दास्तान

पाली जिले की देसूरी रोड पर मानसून की पहली फुहार के साथ ही मौत का साया और गहरा हो जाता है। मेवाड़ और मारवाड़ को जोड़ने वाली यह सड़क कहने के लिए एक महत्वपूर्ण लाइफलाइन है, लेकिन हकीकत में यह क्षेत्र के लिए एक खतरनाक ब्लैक स्पॉट बन चुकी है। जयपुर, जोधपुर और पाली जैसे प्रमुख शहरों को आपस में जोड़ने वाले इस रूट पर यात्रा करना किसी जोखिम भरे सफर से कम नहीं है। साल 1952 से लेकर 2026 तक के आंकड़ों पर नजर डालें तो इस सड़क पर 1000 से अधिक लोगों ने अपनी जान गंवाई है। जैसे-जैसे मानसून सक्रिय होता है, इस मार्ग पर सफर करना और भी जानलेवा हो जाता है, क्योंकि बारिश के दौरान विजिबिलिटी कम हो जाने से वाहन खाई में गिर जाते हैं या फिर फिसलकर दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं। सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम न होने के कारण यह सड़क आज खून की प्यासी सड़क के नाम से जानी जाने लगी है।

2000 करोड़ के प्रोजेक्ट का पेंच

इस खतरनाक मार्ग को सुधारने के लिए 1800 से 2000 करोड़ रुपए की एक बड़ी परियोजना प्रस्तावित है। इस प्रोजेक्ट के तहत देसूरी नाल में या तो एलिवेटेड रोड बनाई जाएगी या फिर एक सुरंग का निर्माण होगा, ताकि यातायात को सुरक्षित बनाया जा सके। हालांकि, वर्तमान में स्थिति यह है कि इस मार्ग के लिए वन विभाग से आवश्यक स्वीकृतियां अभी तक नहीं मिल पाई हैं। देसूरी और नाडोल होकर चारभुजा जाने वाले इस पूरे मार्ग के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट यानी डीपीआर तैयार की जा चुकी है, लेकिन धरातल पर काम शुरू होने का इंतजार खत्म नहीं हो रहा है। इस प्रोजेक्ट की सबसे खास बात यह है कि इसमें 9 बाइपास प्रस्तावित हैं, जिससे वाहनों का दबाव गांवों के भीतर से कम हो जाएगा।

नई सड़क की तकनीक और विशेषताएं

प्रस्तावित नई फोरलेन सड़क में आधुनिक इंजीनियरिंग मानकों का समावेश किया गया है। इसमें 2 गुणा 7.5 मीटर का कैरिज-वे, सड़क के दोनों किनारों पर 1.5 मीटर का पक्का शोल्डर और 180 मीटर की सुरक्षित स्टॉपिंग डिस्टेंस सुनिश्चित की जाएगी। परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा 9 किलोमीटर लंबी देसूरी नाल में बनने वाला सिंगल पिलर एलिवेटेड रोड है। इस डिजाइन को इसलिए चुना गया है ताकि पहाड़ों को कम से कम काटा जाए, वन्यजीव सुरक्षित तरीके से नीचे से निकल सकें और मानसून के दौरान जाम की समस्या न हो। वर्तमान में इस मार्ग पर वाहनों की औसत गति महज 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटा रहती है। नई सड़क को 100 किलोमीटर प्रति घंटा की डिजाइन स्पीड के हिसाब से बनाया जा रहा है, जिसमें 250 मीटर रेडियस के चौड़े मोड़ और पर्याप्त विजिबिलिटी होगी। इससे यात्रा का समय आधा होने और औसत गति के दोगुनी होने की पूरी उम्मीद है।

गांवों को मिलेगी राहत और सुरक्षित सफर

इस सड़क परियोजना के पूरा होने के बाद सबसे बड़ा लाभ उन लोगों को होगा जो सोनाई मांझी, बूसी, नाडोल, टेवाली, सोमेसर, देवली, खारड़ा, नारलाई और देसूरी जैसे गांवों के निवासी हैं। वर्तमान में इन गांवों के बाजारों से भारी वाहन गुजरते हैं, जिससे हर समय दुर्घटना का डर बना रहता है और आए दिन ट्रैफिक जाम की स्थिति पैदा होती है। बाइपास बनने से इन गांवों के स्कूलों, अस्पतालों और बाजारों के पास की सड़कें अधिक सुरक्षित हो जाएंगी। स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्हें इस सड़क पर चलने में अब भी सुकून महसूस नहीं होता, बल्कि हर पल अनहोनी का डर सताता रहता है।

संसद से सड़क तक उठती रही है मांग

राष्ट्रीय राजमार्ग के अधीक्षण अभियंता अंजू चौधरी ने पहले भी यह स्पष्ट किया था कि परियोजना के लिए पेड़ों की गिनती का कार्य किया जा रहा है और टनल या एलिवेटेड रोड के विकल्पों पर गंभीरता से विचार हो रहा है। इसके बावजूद, बड़ा सवाल यह है कि इस काम का आगाज कब होगा। इस मुद्दे को संसद के पटल तक सांसद पीपी चौधरी उठा चुके हैं। उन्होंने जोर देकर कहा था कि 83 किलोमीटर लंबा यह मार्ग सड़क ज्यामिति के किसी भी मानक पर खरा नहीं उतरता है। यह सड़क केवल एक रास्ता नहीं, बल्कि रणकपुर जैन मंदिर, जवाई बांध और चारभुजानाथ जैसे प्रसिद्ध धार्मिक और पर्यटन स्थलों का मुख्य द्वार भी है।

जनता का दर्द और भविष्य की अनिश्चितता

नियमित रूप से इस रास्ते से गुजरने वाले दिनेश और इशांत राय जैसे यात्रियों का कहना है कि जब तक सरकार इस परियोजना को गंभीरता से नहीं लेगी, तब तक मौतों का यह आंकड़ा बढ़ता ही रहेगा। उनके अनुभव के अनुसार, इस मार्ग पर यात्रा करना हमेशा से तनावपूर्ण रहा है। दुर्घटनाएं होना और घंटों जाम में फंसे रहना यहाँ का आम दृश्य है। बारिश के मौसम में यह स्थिति भयावह हो जाती है। अब देखना यह है कि प्रशासन कब तक इन तमाम बाधाओं को दूर कर निर्माण कार्य शुरू करवाता है, ताकि मेवाड़ और मारवाड़ के लोगों को राहत की सांस मिल सके।

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