पर्यावरण और खेती के लिए वरदान
बिहार के भोजपुर जिले के आयर गांव के निवासी प्रगतिशील किसान उपेंद्र सिंह ने खेती के क्षेत्र में एक ऐसी राह दिखाई है, जो न केवल किफायती है बल्कि पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल भी है। अक्सर लोग बगीचों में गिरने वाले सूखे पत्तों को कूड़ा समझकर या तो फेंक देते हैं या फिर उन्हें जला देते हैं, जिससे पर्यावरण में प्रदूषण फैलता है। हालांकि, उपेंद्र सिंह ने इन पत्तों को संसाधन के रूप में इस्तेमाल करने का निर्णय लिया और इनसे उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद बनाने की शुरुआत की है।
कैसे तैयार होती है यह जैविक खाद
उपेंद्र सिंह की खाद बनाने की प्रक्रिया बेहद सरल लेकिन प्रभावशाली है। इस विधि के मुख्य चरण निम्नलिखित हैं:
- सबसे पहले बगीचे और खेतों से गिरने वाले सूखे और झड़े हुए पत्तों को एक सुरक्षित स्थान पर इकट्ठा किया जाता है।
- इन पत्तों को एक बड़े गड्ढे में या एक निर्धारित स्थान पर परत दर परत बिछाया जाता है।
- मिश्रण को समृद्ध बनाने के लिए इसमें गोबर, नींबू और अन्य प्राकृतिक जैविक सामग्री का संतुलित मात्रा में समावेश किया जाता है।
- खाद को जल्दी तैयार करने के लिए समय समय पर इसमें नमी बनाए रखी जाती है और समय के अंतराल पर इसकी पलटाई की जाती है ताकि पत्तियां अच्छी तरह सड़ सकें।
इस प्रक्रिया के माध्यम से कुछ समय के भीतर ही पत्तियां पोषक तत्वों से भरपूर और खाद में परिवर्तित हो जाती हैं, जिसका उपयोग फसलों के लिए सीधे तौर पर किया जा सकता है।
मिट्टी की सेहत में बड़ा सुधार
उपेंद्र सिंह के अनुसार, इस खाद की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें रसायनों का लेशमात्र भी उपयोग नहीं किया जाता है। चूंकि यह पूरी तरह से जैविक है, इसलिए यह मिट्टी की संरचना को सुधारने में बेहद प्रभावी साबित होती है। इस खाद के निरंतर उपयोग से मिट्टी में जैविक कार्बन का स्तर तेजी से बढ़ता है। इसके अतिरिक्त, मिट्टी में केंचुओं और पौधों के लिए लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या में वृद्धि देखी गई है। यह प्रक्रिया मिट्टी की जल धारण करने की क्षमता को भी बेहतर बनाती है, जिससे फसलों की जड़ें गहराई तक विकसित होती हैं और पौधों को प्राकृतिक रूप से पोषण मिलता है।
खेती की लागत में भारी कमी
वर्तमान में किसान उपेंद्र सिंह अपने कई एकड़ खेतों और बगीचों में इसी स्वदेशी जैविक खाद का प्रयोग कर रहे हैं। वे बताते हैं कि इस नवाचार के बाद से उन्हें बाहरी रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर रहने की आवश्यकता काफी कम हो गई है। इसका सीधा असर उनकी खेती की लागत पर पड़ा है, जो काफी हद तक घट गई है। इतना ही नहीं, खेतों में इस खाद के इस्तेमाल से उन्हें फसलों की गुणवत्ता और उत्पादन के मामले में बेहतर परिणाम देखने को मिल रहे हैं।
अन्य किसानों के लिए मिसाल
सूखे पत्तों को जलाना न केवल धुआं फैलाता है बल्कि वायु प्रदूषण के स्तर को भी बढ़ाता है। उपेंद्र सिंह ने इस समस्या को अवसर में बदलते हुए कचरा प्रबंधन का एक शानदार उदाहरण प्रस्तुत किया है। उनकी यह अनूठी पहल अब आसपास के क्षेत्रों के किसानों के लिए एक बड़ी प्रेरणा बन गई है। कई किसान उनके खेतों पर आकर जैविक खाद बनाने की पूरी विधि को समझ रहे हैं और अपने-अपने खेतों में इसे लागू करने के लिए तत्पर हैं। यदि किसान भाई इसी तरह के प्राकृतिक और कम लागत वाले तरीकों को अपनाएं, तो न केवल जैविक खेती को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए मिट्टी की सेहत को भी लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकेगा।
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