धान की खेती पर मंडराया संकट
बिहार समेत कई राज्यों में खरीफ सीजन की सबसे मुख्य फसल धान है और वर्तमान में किसान इसकी बुआई की तैयारियों में जुटे हैं। कई जगहों पर किसानों ने सिंचाई की मदद से बिचड़ा तो तैयार कर लिया है, लेकिन उम्मीद के अनुसार बारिश न होने के कारण रोपाई का काम काफी चुनौतीपूर्ण हो गया है। किसान फिलहाल अपने संसाधनों से पटवन कर रहे हैं, लेकिन यह व्यवस्था कब तक टिकेगी, यह बड़ा सवाल बना हुआ है। मौसम वैज्ञानिकों ने भी यह संकेत दिए हैं कि इस वर्ष बारिश सामान्य से कम रह सकती है। ऐसे हालात में धान की खेती कैसे की जाए, इस पर कृषि विज्ञान केंद्र जहानाबाद के विशेषज्ञ डॉक्टर निराला ने महत्वपूर्ण सलाह दी है।
सीधी बुआई यानी डीएसआर तकनीक है कारगर
कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर निराला के अनुसार, धान की फसल को सामान्यतः भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। यदि मानसून इसी तरह कमजोर बना रहा, तो धान की मुख्य फसल पर इसका सीधा असर पड़ सकता है। इससे बचने का सबसे अच्छा विकल्प डीएसआर (DSR) यानी सीधी बुआई की तकनीक अपनाना है। यह धान की खेती की एक पुरानी और भरोसेमंद विधि है, जिसे कई किसान आज भी उपयोग में ला रहे हैं। यदि जानकारी के अभाव में कुछ किसान अब तक इस तकनीक से दूर थे, तो वे अब इसे अपनाकर पानी की बर्बादी रोक सकते हैं और बेहतर फसल ले सकते हैं।
कम खर्च में धान की रोपाई
डॉक्टर निराला बताते हैं कि डीएसआर पद्धति को अपनाना चुनौतीपूर्ण जरूर लग सकता है, लेकिन यह फसल को खराब होने से बचाने का सबसे प्रभावी तरीका है। इस विधि के लिए बाजार में आधुनिक मशीनें उपलब्ध हैं। यदि किसान मशीनों पर भारी खर्च नहीं करना चाहते, तो वे बाजार से ड्रम सीडर खरीद सकते हैं। इसकी कीमत बमुश्किल 700 रुपये तक होती है। इसका उपयोग करना बेहद आसान है। ड्रम सीडर में कम अवधि वाली धान की किस्मों के बीज डालें और इसे खेत में ढोलक की तरह खींचें। इस तरह से आप खेत में धान की कतारबद्ध बुआई आसानी से पूरी कर सकते हैं। यह तकनीक न केवल पानी बचाती है बल्कि रोपाई की मेहनत को भी कम करती है।
वैकल्पिक फसलों से बढ़ाएं आमदनी
विशेषज्ञों की सलाह है कि किसान धान की ऐसी किस्मों का चुनाव करें जो कम अवधि में तैयार हो जाएं। इससे खेत समय पर खाली हो जाएगा और किसान अगली रबी की फसल की बुआई सही समय पर कर सकेंगे, जिससे उन्हें बेहतर मुनाफा मिलने की संभावना बढ़ जाती है। यदि पानी की अत्यधिक किल्लत है, तो केवल धान पर ही निर्भर न रहें। किसान वैकल्पिक फसलों के रूप में मक्के की उन्नत किस्मों की खेती पर भी विचार कर सकते हैं। इसके अलावा ज्वार, बाजरा, रागी और अन्य मोटे अनाजों की खेती करना एक समझदारी भरा निर्णय हो सकता है। विशेष रूप से जहानाबाद जैसे जिलों में, जहां जल स्तर और पानी की उपलब्धता सीमित है, किसानों को इन विकल्पों को अपनाना चाहिए। यह न केवल रिस्क को कम करेगा बल्कि कम पानी में भी खेती को आर्थिक रूप से फायदेमंद बनाएगा।
https://hindi.news18.com/news/agriculture/dsr-method-rice-paddy-cultivation-less-water-scarcity-tips-local18-ws-l-10640683.html