वायनाड का भौगोलिक संकट और भूस्खलन की आहट
केरल का वायनाड इलाका इन दिनों भूस्खलन यानी लैंडस्लाइड के सबसे बड़े केंद्रों में से एक बनकर उभरा है। राज्य के उत्तर-पूर्वी हिस्से में स्थित यह क्षेत्र पूरी तरह से पठारी है, जहाँ मिट्टी, पत्थर और घनी वनस्पति से ढके ऊंचे-नीचे टीले मौजूद हैं। जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की साल 2021 की एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट के अनुसार, केरल का कुल 43% हिस्सा भूस्खलन के प्रति संवेदनशील है। वायनाड की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है, जहाँ की 51% भूमि पहाड़ी ढलानों वाली है, जिससे यहाँ प्राकृतिक आपदाओं की आशंका हमेशा बनी रहती है।
इतिहास गवाह है कि वायनाड ने हाल के वर्षों में कई बड़े हादसे झेले हैं। 30 जुलाई 2024 की रात लगभग 2 बजे से 4 बजे के बीच, मुंडक्कई, चूरलमाला, अट्टामाला और नूलपुझा गांवों में जो भूस्खलन हुआ, उसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। उस विनाशकारी घटना में 400 से अधिक लोगों की जान गई थी। इससे पहले साल 2019 में भी भारी बारिश के कारण इसी तरह का भूस्खलन हुआ था, जिसमें 17 लोगों की मौत हुई थी और 52 घर पूरी तरह मलबे में तब्दील हो गए थे। विशेषज्ञों का मानना है कि सड़क निर्माण, सुरंगों का जाल, बड़े बांध, खनन और जंगलों की अंधाधुंध कटाई जैसी मानवीय गतिविधियां इस प्राकृतिक खतरे को कई गुना बढ़ा रही हैं।
महाराष्ट्र में मानसून का तांडव
दूसरी तरफ महाराष्ट्र में पिछले कई दिनों से हो रही मूसलाधार बारिश ने जनजीवन को पूरी तरह से ठप कर दिया है। मुंबई, पुणे, वसई और विरार जैसे इलाके पानी-पानी हो गए हैं। रिहायशी बस्तियों में पानी भरने से लोगों का घरों से निकलना मुश्किल हो गया है, जबकि सड़कों पर खड़ी गाड़ियां पानी में तैरती हुई नजर आ रही हैं। पुणे से आई एक तस्वीर ने सभी को डरा दिया, जहाँ एक दो मंजिला मकान देखते ही देखते ताश के पत्तों की तरह ढह गया। गनीमत यह रही कि लगातार बारिश के कारण पहले ही उस इमारत को खाली करा लिया गया था, जिससे कोई बड़ी जनहानि नहीं हुई।
मुंबई महानगर क्षेत्र के नालासोपारा, वसई और विरार में स्थिति सबसे अधिक खराब है। यहाँ रेलवे ट्रैक पूरी तरह पानी में डूब चुके हैं, जिसके कारण लोकल ट्रेनों का परिचालन बुरी तरह बाधित हुआ है। कई रूटों पर ट्रेनें बंद कर दी गई हैं, और जो चल भी रही हैं, उनकी रफ्तार इतनी धीमी है कि मानो वे पटरियों के बजाय पानी में तैर रही हों। आम लोग पटरियों पर पैदल चलने को मजबूर हैं, क्योंकि रास्ते जलमग्न हैं और दुकानों व बाजारों के बंद होने से जरूरी सामानों की भी किल्लत पैदा हो गई है।
मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे के दावे और सच्चाई
इस बीच, एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने सरकारी दावों की पोल खोल दी है। 7000 करोड़ रुपये की भारी लागत से तैयार किए गए मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे के 'मिसिंग लिंक' प्रोजेक्ट का उद्घाटन महज दो महीने पहले, यानी 1 मई को ही किया गया था। इसे इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना बताया गया था, लेकिन भारी बारिश और भूस्खलन के सामने यह प्रोजेक्ट चंद दिनों में ही घुटने टेक गया।
लैंडस्लाइड के कारण मिसिंग लिंक की सुरंग बंद हो गई और बड़े-बड़े पत्थर एक्सप्रेसवे पर आ गिरे, जिससे यातायात घंटों तक पूरी तरह ठप रहा। अब महाराष्ट्र स्टेट रोड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन इस विफलता को 'एक्ट ऑफ गॉड' यानी दैवीय आपदा कहकर अपना पल्ला झाड़ रहा है। हालांकि, तकनीकी विशेषज्ञों का नजरिया इससे बिल्कुल अलग है। विशेषज्ञों का कहना है कि पहाड़ों पर सुरक्षा के लिए लगाए गए नेट सिर्फ 15 मीटर की ऊंचाई तक थे, जबकि पत्थर लगभग 150 मीटर की ऊंचाई से गिरे। यह स्पष्ट रूप से योजना बनाने में हुई चूक और तकनीकी गैप को दर्शाता है।
यही प्लानिंग गैप एक्सप्रेसवे के अन्य हिस्सों में भी दिखाई देता है, जहां थोड़ी सी बारिश के बाद आसपास के खेतों का पानी सड़कों पर भर जाता है और किलोमीटर लंबा जाम लग जाता है। वायनाड से लेकर महाराष्ट्र तक, ये घटनाएं यह बताने के लिए काफी हैं कि प्राकृतिक आपदाओं के प्रति हमारी तैयारी में अभी भी कितनी कमियां बाकी हैं।
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