गंभीर आर्थिक संकट में आशा-उषा कार्यकर्ता
मध्य प्रदेश में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत काम करने वाली हजारों आशा और उषा कार्यकर्ता इन दिनों भारी आर्थिक तंगी का सामना कर रही हैं। खरगोन जिले में तैनात लगभग 1500 और पूरे प्रदेश में कार्यरत करीब 80 हजार आशा कार्यकर्ता, आशा पर्यवेक्षक और आशा सहयोगिनी अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए भी संघर्ष कर रही हैं। इन महिलाओं का कहना है कि 6 हजार रुपये का मामूली मानदेय ही उनका एकमात्र सहारा है, लेकिन दुख की बात यह है कि उन्हें यह राशि भी न तो समय पर मिल रही है और न ही पूरी दी जा रही है।
अपनी आर्थिक बदहाली से तंग आकर अब इन कार्यकर्ताओं का सब्र जवाब दे गया है। कई महिलाएं ऐसी हैं जो अपने परिवार का पेट भरने, बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने और मकान का किराया चुकाने के लिए कर्ज लेने पर मजबूर हो गई हैं। स्थिति इतनी दयनीय हो गई है कि घर चलाने के लिए उन्हें दूसरों के सामने हाथ फैलाना पड़ रहा है।
मानदेय में बढ़ोतरी के वादों का क्या हुआ?
आशा कार्यकर्ताओं का आक्रोश इस बात को लेकर भी है कि उन्हें पूर्व में किए गए वादों का लाभ नहीं मिला। कार्यकर्ताओं ने याद दिलाया कि वर्ष 2023 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक सार्वजनिक मंच से घोषणा की थी कि प्रत्येक वर्ष उनके मानदेय में 1 हजार रुपये की बढ़ोतरी की जाएगी। लेकिन तीन साल का लंबा समय बीत जाने के बाद भी उस घोषणा पर कोई अमल नहीं हुआ और मानदेय में एक रुपये का भी इजाफा नहीं किया गया है।
इस संबंध में खरगोन में आशा-उषा और आशा सहयोगिनी संघ की जिला अध्यक्ष रेखा रंसौरे ने कहा कि सरकार और प्रशासन केवल कोरे आश्वासन देते हैं। जमीनी स्तर पर स्थितियां बिल्कुल उलट हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि एनएचएम के आदेशों के बावजूद हर महीने की 5 तारीख तक प्रोत्साहन राशि उनके खातों में नहीं पहुंचती है।
पूरे मानदेय के बदले आधी रकम से गुजारा
रेखा रंसौरे के अनुसार, सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जब भुगतान किया भी जाता है, तो वह पूरा नहीं होता। कभी-कभी 6 हजार रुपये के मासिक मानदेय के स्थान पर उन्हें केवल 3 हजार रुपये ही थमा दिए जाते हैं। बाकी बची हुई राशि के बारे में पूछने पर उनसे अक्सर यह कहकर टाल दिया जाता है कि शेष राशि बाद में जारी की जाएगी। कभी-कभी इसे तकनीकी खराबी का नाम दे दिया जाता है। इस तरह के व्यवहार से उन महिलाओं में गहरा रोष है जो दिन-रात गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए दौड़-भाग करती हैं।
सरकार को चेताया, 14 जुलाई से होगी हड़ताल
अपनी मांगों को लेकर सैकड़ों की संख्या में महिलाएं एसडीएम कार्यालय पहुंचीं और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नाम ज्ञापन सौंपा। इस दौरान उन्होंने स्पष्ट चेतावनी जारी की है कि यदि सरकार उनकी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लेती है, तो वे चुप नहीं बैठेंगी। उन्होंने एलान किया है कि यदि उनकी मांगें तुरंत नहीं मानी गईं, तो वे आगामी 14 जुलाई से स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख ‘दस्तक अभियान’ में हिस्सा नहीं लेंगी। उन्होंने घोषणा की है कि अगर उनकी सुनवाई नहीं हुई तो वे पूरे महीने काम पर नहीं आएंगी और पूरी तरह से हड़ताल पर रहेंगी।
किराये के घर में रहने को मजबूर कार्यकर्ता
अपनी पीड़ा साझा करते हुए आशा कार्यकर्ता लता हिरवे ने कहा कि आज के दौर में 6 हजार रुपये में महीने भर का खर्च चलाना नामुमकिन है। महंगाई के इस दौर में राशन, बच्चों की स्कूल फीस और मकान का किराया देना एक बड़ी चुनौती बन गई है। कई महिलाएं किराए के घरों में रहती हैं और समय पर भुगतान न कर पाने के कारण अपमानित भी होना पड़ता है। लता ने यह भी मांग उठाई है कि जो इंसेंटिव (प्रोत्साहन राशि) बंद कर दी गई है, उसे तुरंत प्रभाव से दोबारा शुरू किया जाए और पूरे भुगतान प्रक्रिया की निष्पक्ष तरीके से जांच करवाई जाए ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
26 हजार रुपये मानदेय और बीमा सुरक्षा की मांग
आशा कार्यकर्ताओं ने अब अपनी मांगों का दायरा बढ़ा दिया है। उनका कहना है कि पिछले तीन वर्षों से वे जिस उपेक्षा और अधूरे भुगतान का सामना कर रही हैं, वह अब बर्दाश्त के बाहर है। कार्यकर्ताओं की प्रमुख मांगों में निम्नलिखित बिंदु शामिल हैं:
- आशा और उषा कार्यकर्ताओं को प्रति माह 26 हजार रुपये का निश्चित मानदेय दिया जाए।
- कार्यस्थल पर जोखिम को देखते हुए उनके लिए दुर्घटना बीमा की सुविधा उपलब्ध कराई जाए।
- स्वास्थ्य विभाग की अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाएं और सुविधाएं भी आशा कार्यकर्ताओं पर लागू की जाएं।
- भुगतान में हो रही अनियमितताओं को खत्म कर सीधे और समयबद्ध भुगतान प्रणाली लागू की जाए।
आशा कार्यकर्ता इस बात पर भी जोर दे रही हैं कि वे भोपाल से लेकर दिल्ली तक अपनी आवाज उठा चुकी हैं, लेकिन हर जगह से केवल आश्वासन ही मिले हैं। उन्होंने सरकार को चेतावनी दी है कि वे प्रदेश में 80 हजार की संख्या में हैं और उनके बिना स्वास्थ्य विभाग की जमीनी योजनाओं का क्रियान्वयन संभव नहीं है। अब आर-पार की लड़ाई का मन बना चुकी इन महिलाओं ने स्पष्ट कर दिया है कि दस्तक अभियान में भागीदारी तभी होगी, जब सरकार उनकी इन जायज मांगों पर सकारात्मक निर्णय लेगी।
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