फरीदाबाद जिले के सोतई गांव के समीप बसी सपेरा बस्ती, जिसे स्थानीय लोग बीपीएल कॉलोनी भी कहते हैं, आज प्रशासनिक उपेक्षा और बुनियादी सुविधाओं की कमी का एक बड़ा उदाहरण बन चुकी है। मानसून का आगमन जहां देश के कई हिस्सों में राहत और खुशहाली लेकर आता है, वहीं इस बस्ती के निवासियों के लिए यह समय किसी भयानक दुःस्वप्न से कम नहीं होता। अभी बारिश का मौसम पूरी तरह से शुरू भी नहीं हुआ है, लेकिन यहां के निवासियों के चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ देखी जा सकती हैं। बस्ती की गलियों में नालियों का कोई नामोनिशान नहीं है, जिसके कारण घरों से निकलने वाला गंदा पानी सीधे कच्ची सड़कों और रास्तों पर बहता रहता है। चारों तरफ फैला कीचड़ और गंदगी न केवल गंभीर बीमारियों को दावत दे रही है, बल्कि बारिश के दिनों में जहरीले जीवों, विशेषकर सांपों के आतंक को भी बढ़ा देती है। सबसे बड़ी बात यह है कि कॉलोनी बनने के बाद से यह परेशानी लगातार बनी हुई है, लेकिन आज तक इसका कोई स्थायी समाधान नहीं निकाला गया है।
सपेरों की बस्ती में सांपों का ही सबसे बड़ा डर
इस बस्ती के एक बुजुर्ग निवासी मेहर सिंह अपनी बेबसी बयां करते हुए बताते हैं कि वह और उनके जैसे कई लोग इसी सपेरा बस्ती बीपीएल कॉलोनी में रहते हैं। बारिश के दिनों में इस इलाके के हालात इतने बदतर हो जाते हैं कि लोगों का यहां से पैदल निकलना भी दूभर हो जाता है। चारों तरफ जमा रहने वाले पानी और गंदगी की वजह से जहरीले सांप रेंगते हुए सीधे लोगों के घरों के भीतर घुस जाते हैं। मेहर सिंह कहते हैं, "हम तो जन्म से ही सपेरे हैं, इसलिए किसी तरह सांप को काबू में कर लेते हैं या पकड़ लेते हैं, लेकिन अगर यही सांप किसी आम व्यक्ति के घर में घुस जाए, तो उसकी जान पर बन आएगी।"
उन्होंने इस बात पर भी गहरा दुख व्यक्त किया कि पारंपरिक रूप से उनका पेशा सांप पकड़ने और उन्हें दिखाने का था, लेकिन सरकार द्वारा इस पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद उनकी आजीविका पूरी तरह से छिन गई है। अब इस बस्ती के अधिकांश लोग अपने परिवार का पेट पालने के लिए शादी-ब्याह में ढोल और बैंड-बाजा बजाने का काम करते हैं। मेहर सिंह बताते हैं कि इस इलाके में बेहद विषैले सांप घूमते हैं। अब तक बस्ती की कम से कम दो-तीन महिलाओं को सांप काट चुका है। उन्होंने एक रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना का जिक्र करते हुए बताया कि एक मां अपने मासूम बच्चे को दूध पिला रही थी, तभी सोते समय एक अत्यंत विषैले सांप ने उसे काट लिया। सांप इतने खतरनाक होते हैं कि कभी-कभी सपेरा समुदाय के अनुभवी लोगों के लिए भी उन्हें बिना किसी नुकसान के संभालना बेहद मुश्किल हो जाता है।
नेताओं के झूठे वादे और चुनावी मौसम
स्थानीय निवासी सुनील नाथ प्रशासन और राजनेताओं के रवैये से बेहद आक्रोशित हैं। उनका कहना है कि चुनाव के समय तमाम राजनीतिक दलों के नेता और उम्मीदवार इस बस्ती में वोट मांगने के लिए आते हैं। उस समय वे बड़े-बड़े दावे करते हैं और हाथ जोड़कर वादा करते हैं कि चुनाव जीतते ही सबसे पहले इस कॉलोनी में पक्की नालियां बनवाई जाएंगी और सभी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। लेकिन, जैसे ही चुनाव खत्म होते हैं और वे जीत दर्ज कर लेते हैं, उसके बाद कोई भी जनप्रतिनिधि या अधिकारी इस बस्ती की सुध लेने नहीं आता। सुनील नाथ साफ शब्दों में कहते हैं कि उनकी सबसे बड़ी और प्राथमिक समस्या जल निकासी की है। आज तक इस पूरी कॉलोनी में व्यवस्थित नालियों का निर्माण नहीं कराया गया है, जिसके कारण हर घर के आगे गंदा पानी जमा रहता है और लोग नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं।
पानी निकासी के जुगाड़ से पैदा हो रहे आपसी विवाद
कॉलोनी में सरकारी व्यवस्था न होने के कारण लोगों ने खुद ही अपने स्तर पर अस्थाई इंतजाम करने की कोशिश की है, जो अब आपसी झगड़ों का कारण बन रही है। निवासी रवि नाथ ने बताया कि नालियां न होने की वजह से लोगों ने अपने घरों के सामने खुद ही गहरे गड्ढे खोद रखे हैं, ताकि गंदा पानी सड़कों पर न फैले। लेकिन यह समाधान बहुत ही अस्थाई और खतरनाक है। जब ये गड्ढे पानी से पूरी तरह भर जाते हैं, तो सारा गंदा और बदबूदार पानी फिर से सड़क पर बहने लगता है।
रवि नाथ आगे बताते हैं कि बरसात के मौसम में तो स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाती है। जब कोई निवासी अपने घर का पानी किसी दूसरे की गली या घर के सामने छोड़ देता है, तो पड़ोसियों के बीच तीखी बहस, लड़ाई-झगड़े और हाथापाई की नौबत आ जाती है। यह समस्या आज की नहीं है, बल्कि जब से यह बीपीएल कॉलोनी बसाई गई है, तभी से लोग इस गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं, लेकिन इसका कोई स्थाई समाधान निकालने की कोशिश नहीं की गई।
अन्य बीपीएल कॉलोनियों को मिली सुविधाएं, सपेरा बस्ती सौतेली
इस बस्ती के एक अन्य निवासी शेर सिंह नाथ का कहना है कि इस स्थान को सरकारी कागजों में बीपीएल कॉलोनी का दर्जा प्राप्त है। इसके बावजूद यहां सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि मूलभूत सुविधाओं के नाम पर एक ईंट तक नहीं रखी गई है। न तो सड़कों के किनारे नालियां बनी हैं और न ही घरों से निकलने वाले पानी की निकासी का कोई अन्य सुचारू रास्ता है।
इसी मुद्दे को आगे बढ़ाते हुए उसलीन नाथ आक्रोश व्यक्त करते हुए कहते हैं कि सरकार और प्रशासन द्वारा जिले में जितनी भी अन्य बीपीएल कॉलोनियां बनाई गई हैं, वहां समय के साथ सड़क, बिजली, पानी और नालियों जैसी सभी आवश्यक सुविधाएं प्रदान कर दी गई हैं। लेकिन न जाने क्यों, सिर्फ इस सपेरा बस्ती के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है। इसे पूरी तरह से भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है। आज के आधुनिक युग में भी यहां के निवासियों को पानी और स्वच्छता जैसी न्यूनतम बुनियादी आवश्यकताओं के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा है।
गरीबी और बीमारियों की दोहरी मार झेल रहे परिवार
बस्ती की महिला निवासी वीरबती ने यहां रहने वाले परिवारों के आर्थिक और सामाजिक दर्द को साझा किया। उन्होंने बताया कि पानी की निकासी का कोई मार्ग न होने के कारण घरों का सारा दूषित पानी कॉलोनी के सामने खाली पड़े भूखंडों में जाकर जमा हो जाता है। जिस भी भूखंड के सामने यह पानी इकट्ठा होता है, वहां के मालिक और स्थानीय लोगों के बीच आए दिन गंभीर विवाद और मारपीट होती है। बरसात के समय तो घरों से बाल्टियों में भर-भरकर पानी बाहर फेंकना पड़ता है, जिससे सभी का बुरा हाल हो जाता है।
वीरबती आगे कहती हैं कि इस गंदगी और दूषित वातावरण के कारण बस्ती के छोटे-छोटे बच्चे साल के बारह महीने किसी न किसी बीमारी की चपेट में रहते हैं। इस दलदल जैसी स्थिति में बीमारियों का खतरा हमेशा बना रहता है। वह अपनी आर्थिक तंगी का हवाला देते हुए कहती हैं, "हम बेहद गरीब लोग हैं। हमारे परिवार के पुरुष दिनभर मेहनत-मजदूरी करके बमुश्किल 200 से 400 रुपये तक ही कमा पाते हैं। इतनी कम आमदनी में हम अपने घर का खर्च चलाएं, बीमार बच्चों का इलाज करवाएं, उनकी पढ़ाई-लिखाई का खर्च उठाएं या फिर अपने लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम करें? यही हमारी जिंदगी की सबसे बड़ी और निरंतर बनी रहने वाली चिंता है।"
कुल मिलाकर, फरीदाबाद की यह सपेरा बस्ती आज विकास के दावों की पोल खोल रही है। बारिश का मौसम शुरू होते ही यहां के निवासियों का डर और अधिक गहरा जाता है, क्योंकि वे जानते हैं कि आगामी कुछ महीने उन्हें न केवल गंदगी और कीचड़ के बीच गुजारने होंगे, बल्कि अपने बच्चों को जहरीले सांपों के खतरे से भी बचाना होगा। प्रशासन की इस बेरुखी के बीच अब देखना यह है कि क्या इस बार भी इनकी गुहार अनसुनी रह जाएगी या फिर इस बस्ती के लोगों को इस नारकीय जीवन से मुक्ति मिलेगी।
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