बिहार का नया सियासी घमासान: भरत तिवारी एनकाउंटर पर भिड़े दलित नेता, चिराग और अशोक चौधरी के बिलौटी दौरे से गरमाई राजनीति

भोजपुर के बिलौटी गांव में हुए कथित पुलिस एनकाउंटर में ब्राह्मण युवक भरत तिवारी की मौत के बाद बिहार की राजनीति में नया उबाल आ गया है, जहां जीतन राम मांझी पुलिस का समर्थन कर रहे हैं, वहीं चिराग पासवान और अशोक चौधरी ने पीड़ित परिवार से मिलकर न्याय का भरोसा दिया है।

बिहार की राजनीति हमेशा से अपनी अनूठी सामाजिक और जातीय समीकरणों के लिए जानी जाती रही है। लेकिन हाल के दिनों में भोजपुर जिले के बिलौटी गांव में घटित एक घटना ने राज्य की राजनीतिक सरगर्मी को एक नया और बेहद संवेदनशील मोड़ दे दिया है। यहाँ पुलिस मुठभेड़ में मारे गए एक ब्राह्मण युवक भरत भूषण तिवारी की मौत ने पूरे राज्य की सियासत में हलचल पैदा कर दी है। इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस घटना को लेकर सबसे अधिक सक्रियता और संवेदनशीलता बिहार के कद्दावर दलित नेताओं द्वारा दिखाई जा रही है।

इस कथित एनकाउंटर को लेकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के भीतर ही सुर पूरी तरह से बंटे हुए नजर आ रहे हैं। एक तरफ जहाँ दलित समुदाय से आने वाले देश के केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी को इस मुठभेड़ में पुलिस की कोई गलती नजर नहीं आती और वे इसे पूरी तरह जायज ठहराते हैं, वहीं दूसरी तरफ दलित समुदाय के ही दूसरे प्रमुख केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) यानी LJP-R के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान इसे पुलिस और स्थानीय प्रशासन का एक क्रूर और आपराधिक कृत्य मान रहे हैं। अब इस विवाद में बिहार सरकार के एक अन्य बेहद प्रभावशाली दलित चेहरे और जेडीयू कोटे से मंत्री अशोक चौधरी की भी प्रविष्टि हो गई है, जिससे यह पूरा मामला एक बड़े राजनीतिक संकट का रूप लेता जा रहा है।

भोजपुर का बिलौटी गांव और भरत तिवारी मुठभेड़ का पूरा घटनाक्रम

बिहार के भोजपुर जिले के अंतर्गत आने वाला बिलौटी गांव पिछले पखवाड़े भर से भी अधिक समय से पूरे प्रदेश की राजनीतिक हलचल का मुख्य केंद्र बिंदु बना हुआ है। इसी स्थान पर स्थानीय पुलिस के साथ हुई एक मुठभेड़ के दौरान भरत भूषण तिवारी नामक युवक की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद से ही पुलिस की थ्योरी और मृतक के परिवार वालों के दावों के बीच एक बड़ा विरोधाभास देखने को मिल रहा है। भरत के परिजनों और ग्रामीणों का साफ तौर पर आरोप है कि यह कोई मुठभेड़ नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश के तहत की गई हत्या है।

ग्रामीणों का स्पष्ट रूप से कहना है कि भरत तिवारी का कोई पुराना आपराधिक इतिहास नहीं था। घटना के समय जब पुलिस ने उसे घेरा, तब उसने अपने पास मौजूद अवैध हथियार को पुलिस के सामने फेंक दिया था और वह पूरी तरह से आत्मसमर्पण करने के लिए तैयार था। लेकिन आत्मसमर्पण के बावजूद पुलिसकर्मियों ने उस पर बेहद करीब से गोलियां बरसा दीं। परिवार वालों को सबसे बड़ा शक वहां के अनुमंडल पदाधिकारी (एसडीएम) की भूमिका पर है। परिजनों का कहना है कि घटना के वक्त प्रशासनिक अधिकारी का वहां मौजूद होना ही कई तरह के अनसुलझे सवाल खड़े करता है। इस घटना की गंभीरता और जनता के आक्रोश को देखते हुए बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने मामले की संवेदनशीलता को समझा और उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश को इस पूरे प्रकरण की विस्तृत न्यायिक जांच का जिम्मा सौंपा है।

चिराग पासवान का आक्रामक रुख: कथित एनकाउंटर को बताया सुनियोजित मर्डर

इस पूरे मामले में सबसे आक्रामक और भावुक रुख केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान का देखने को मिला है। चिराग पासवान 3 जुलाई को स्वयं बिलौटी गांव पहुंचे और पीड़ित परिवार से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने न केवल भरत तिवारी के माता-पिता के आंसू पोंछे, बल्कि वे अत्यंत भावुक होकर घुटनों के बल बैठ गए और भरत तिवारी की तस्वीर के समक्ष नमन कर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। चिराग पासवान ने पुलिस की भूमिका पर अत्यंत कड़े सवाल खड़े किए और इसे सीधे तौर पर एक हत्या करार दिया।

चिराग पासवान ने समाज में रक्षक और भक्षक की भूमिका पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जब कानून का पालन कराने वाले ही इस तरह की वारदात को अंजाम देने लगेंगे, तो आम जनता का न्याय व्यवस्था से भरोसा पूरी तरह से उठ जाएगा। उन्होंने कहा कि जिस युवक ने निहत्थे होकर आत्मसमर्पण कर दिया था, उसकी इस तरह हत्या कर देना किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकता। उन्होंने ग्रामीणों के आरोपों का समर्थन करते हुए कहा कि कुछ भ्रष्ट प्रशासनिक अधिकारियों ने साजिश के तहत इस घटना को अंजाम दिया है। चिराग ने स्पष्ट किया कि वे इस गंभीर मुद्दे को लेकर देश के केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से भी मुलाकात करेंगे और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाने की मांग करेंगे।

जीतन राम मांझी का विपरीत दृष्टिकोण: पुलिस की कार्रवाई को ठहराया सही

चिराग पासवान के इस रुख के ठीक विपरीत, हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (HAM) के संस्थापक और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी का स्टैंड एकदम अलग रहा है। वे इस घटना को किसी भी रूप में गलत नहीं मानते। मांझी का तर्क है कि भरत तिवारी के खिलाफ पहले से ही अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज था और वह कानून की नजर में एक अपराधी था।

जीतन राम मांझी ने पुलिस की कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि भरत तिवारी के पास एक अवैध रिवाल्वर था और आत्मसमर्पण करने के बजाय उसने पुलिस को खुलेआम धमकी दी थी तथा हवा में फायरिंग भी की थी। मांझी के अनुसार, ऐसी स्थिति में पुलिस ने जो कुछ भी किया, वह आत्मरक्षार्थ और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पूरी तरह से उचित था। उन्होंने इस मामले में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को घसीटे जाने की भी आलोचना की। मांझी ने 5 जुलाई को इस मुठभेड़ के समर्थन में आयोजित होने वाली एक कथित महापंचायत में भी शामिल होने की बात कही थी, हालांकि बाद में वे अपने इस फैसले से पीछे हट गए और अंततः वह महापंचायत आयोजित नहीं हो सकी। जीतन राम मांझी के इस बयान के बाद ही चिराग पासवान का बिलौटी जाना और पीड़ित परिवार के पक्ष में खड़े होना दोनों नेताओं के बीच जारी वैचारिक मतभेदों को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।

चिराग और मांझी के बीच पुरानी सियासी प्रतिद्वंद्विता

एनडीए के भीतर रहते हुए भी चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के बीच का आपसी गतिरोध कोई नया नहीं है। इन दोनों नेताओं के बीच की राजनीतिक जंग की शुरुआत वर्ष 2024 में बिहार विधानसभा की चार सीटों पर हुए उपचुनावों के दौरान ही हो गई थी। उस दौरान इमामगंज विधानसभा सीट से जीतन राम मांझी की पुत्रवधू दीपा मांझी एनडीए की आधिकारिक प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में थीं। चिराग पासवान ने उस उपचुनाव में अन्य सभी क्षेत्रों में जाकर प्रचार किया था, लेकिन वे दीपा मांझी के पक्ष में प्रचार करने के लिए इमामगंज नहीं पहुंचे थे।

इस बात को लेकर जीतन राम मांझी और चिराग के बीच काफी कड़वाहट पैदा हो गई थी। चिराग के बहनोई और सांसद अरुण भारती ने भी तब मांझी को करारा जवाब दिया था। इसके बाद वर्ष 2025 के विधानसभा चुनावों के दौरान भी सीटों के बंटवारे और आपसी वर्चस्व को लेकर दोनों नेताओं के बीच कई बार जुबानी जंग देखने को मिली। जुलाई 2025 में जब चिराग पासवान ने बिहार की कानून-व्यवस्था को लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नीतियों पर सवाल उठाए थे, तब मांझी ने उन पर तीखा तंज कसते हुए कहा था कि एक तरफ तो वे गठबंधन की मलाई खा रहे हैं और दूसरी तरफ उसी सरकार का विरोध कर रहे हैं। इसके अलावा, दिल्ली में बिहार के एक युवक पांडव के पुलिस एनकाउंटर में मारे जाने पर भी मांझी ने कहा था कि 'मार दिया तो मार दिया', जिस पर चिराग ने कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे बेहद असंवेदनशील बयान करार दिया था। दोनों ही नेता खुद को बिहार के दलितों का सबसे बड़ा मसीहा साबित करने की होड़ में लगे रहते हैं।

शाहाबाद क्षेत्र का राजनीतिक गणित और विधानसभा चुनाव की तैयारी

इस पूरे मामले में चिराग पासवान की गहरी रुचि के पीछे एक बड़ी राजनीतिक रणनीति भी छिपी हुई है। वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले चिराग पासवान ने यह घोषणा की थी कि वे स्वयं भी इस बार चुनावी मैदान में उतरेंगे। उनके बहनोई और सांसद अरुण भारती ने संकेत दिए थे कि चिराग शाहाबाद क्षेत्र के भोजपुर जिले की किसी अनारक्षित सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। चिराग पासवान की छवि केवल एक वर्ग विशेष के नेता की नहीं है, बल्कि सवर्ण समाज और विशेष रूप से युवाओं के बीच भी उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है।

अपनी इसी राजनीतिक जमीन को मजबूत करने के उद्देश्य से चिराग पासवान ने 8 जून 2025 को आरा के ऐतिहासिक रमना मैदान में एक विशाल 'नव संकल्प महासभा' का आयोजन किया था, जिसे उनकी पार्टी का चुनावी शंखनाद माना गया था। उस रैली में उन्होंने बिहार की सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने का हुंकार भरा था, हालांकि बाद में एनडीए के तहत हुए समझौते में उन्हें 29 सीटें देकर मना लिया गया था। शाहाबाद और भोजपुर के इस इलाके में सवर्ण मतदाताओं, विशेष रूप से भूमिहार और ब्राह्मण समाज की आबादी काफी निर्णायक भूमिका में है। ऐसे में भरत तिवारी के परिजनों से मिलकर उनके प्रति संवेदना व्यक्त करना चिराग पासवान के लिए इस क्षेत्र में अपनी राजनीतिक स्थिति को और अधिक मजबूत करने का एक बड़ा जरिया साबित हो सकता है।

अशोक चौधरी की एंट्री: घाव पर मरहम लगाने की कोशिश

जब इस मामले में जीतन राम मांझी और चिराग पासवान के बीच तीखी बहस चल ही रही थी, तभी रविवार यानी 5 जुलाई 2026 को बिहार सरकार के एक और कद्दावर दलित नेता तथा जेडीयू कोटे के मंत्री अशोक चौधरी की इस पूरे घटनाक्रम में प्रविष्टि हुई। अशोक चौधरी अचानक बिलौटी गांव पहुंचे और भरत तिवारी के परिजनों से मुलाकात की। इस दौरान उनका अंदाज बेहद संवेदनशील और आत्मीय रहा। उन्होंने पीड़ित परिवार के साथ काफी समय बिताया और पूरी घटना की विस्तृत जानकारी ली।

मुलाकात के दौरान अशोक चौधरी ने भरत की रोती हुई मां का हाथ थामकर उन्हें ढांढस बंधाया, जिससे वहां मौजूद लोग काफी भावुक हो गए। उन्होंने मृतक के भाइयों को ढांढस बंधाते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए हरसंभव सहायता प्रदान करने का वादा भी किया और परिजनों को अपना संपर्क पत्र (विजिटिंग कार्ड) भी दिया ताकि वे किसी भी समय उनसे सीधे मदद मांग सकें। इसके बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर इस घटना की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए एक विस्तृत पोस्ट भी साझा किया।

अशोक चौधरी का सोशल मीडिया संदेश और कानून के राज का दावा

अशोक चौधरी ने पीड़ित परिवार से मिलने के बाद अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर लिखा:

'विगत दिनों आरा के #बिलौटी में पुलिसकर्मी द्वारा श्री भरत तिवारी जी की हुई कथित हत्या की घटना अत्यंत दुःखद एवं निंदनीय है। आज उनके पैतृक आवास पहुँचकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की तथा शोकाकुल परिजनों से मुलाकात कर अपनी गहरी संवेदनाएँ व्यक्त कीं। हम पहले भी कह चुके हैं और आज भी स्पष्ट रूप से यही कहना है कि यदि कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाला कर्मी ही कानून को अपने हाथ में लेने लगे, तो आम जनता का न्याय व्यवस्था से विश्वास डगमगा जाएगा। माननीय नेता आदरणीय श्री नीतीश कुमार जी के नेतृत्व में बिहार ने सुशासन, कानून के राज और जवाबदेही की जो पहचान बनाई है, उसे हर परिस्थिति में अक्षुण्ण बनाए रखना हम सभी की जिम्मेदारी है। हमें पूर्ण विश्वास है कि उनके आदर्शो पर चलते हुए बिहार के माननीय मुख्यमंत्री श्री सम्राट चौधरी जी के नेतृत्व में राज्य सरकार इस पूरे मामले की निष्पक्ष एवं पारदर्शी जांच सुनिश्चित करेगी तथा दोषियों को कानून के अनुसार कठोर दंड मिलेगा।'

उपचुनाव पर संभावित असर और एनडीए की डैमेज कंट्रोल रणनीति

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरे विवाद का असर बिहार में होने वाले बांकीपुर उपचुनाव पर भी देखने को मिल सकता है। जीतन राम मांझी द्वारा दिए गए विवादास्पद बयान ने स्थानीय स्तर पर आक्रोशित सवर्ण मतदाताओं को और अधिक उत्तेजित कर दिया था, जिससे एनडीए के पारंपरिक सवर्ण वोट बैंक के खिसकने का गंभीर खतरा पैदा हो गया था। इस संभावित नुकसान को भांपते हुए ही एनडीए के रणनीतिकारों ने एक बेहद सोची-समझी योजना के तहत काम किया।

बीजेपी ने इस संवेदनशील मुद्दे पर स्वयं सीधे तौर पर कुछ बोलने के बजाय अपने दो प्रमुख सहयोगी दलों के दलित चेहरों को आगे कर दिया। चिराग पासवान, जो दलितों के साथ-साथ सवर्ण समाज में भी लोकप्रिय हैं, उन्होंने तुरंत मौके पर पहुंचकर आक्रोश को शांत करने का काम किया। इसके तुरंत बाद नीतीश कुमार के बेहद करीबी और जेडीयू मंत्री अशोक चौधरी को वहां भेजा गया ताकि शासन और प्रशासन की ओर से सकारात्मक संदेश दिया जा सके। इन दोनों नेताओं की आत्मीय मुलाकात और संवेदनशील बयानों ने पीड़ित परिवार और स्थानीय सवर्ण समाज के बीच उपजे गुस्से को काफी हद तक नियंत्रित करने में सफलता पाई है। अब देखना यह होगा कि सेवानिवृत्त जज की जांच रिपोर्ट आने के बाद इस संवेदनशील मामले का ऊंट किस करवट बैठता है।

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