हाई कोर्ट ने नाबालिग को दी बड़ी राहत
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक संवेदनशील मामले में 14 साल की दुष्कर्म पीड़िता के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने पीड़िता को 28 सप्ताह से अधिक के गर्भ को सुरक्षित रूप से गिराने की अनुमति दे दी है। यह मामला राजनांदगांव जिले के डोंगरगांव थाना क्षेत्र का है, जहां एक नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म की घटना सामने आई थी। पीड़िता ने गर्भधारण के बाद कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसके बाद उसे यह कानूनी राहत दी गई है।
मेडिकल बोर्ड और कोर्ट का दृष्टिकोण
सुनवाई के दौरान कोर्ट के समक्ष एक मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। इस रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया था कि गर्भ की अवधि 28 सप्ताह 5 दिन हो चुकी है, जिसके चलते गर्भपात की प्रक्रिया में कुछ चिकित्सीय जोखिम हो सकते हैं। हालांकि, डॉक्टरों ने अपनी राय में यह भी साफ किया कि नाबालिग को अनचाहा मातृत्व निभाने के लिए मजबूर करने से उसके मानसिक स्वास्थ्य और शारीरिक विकास पर गंभीर और प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इन तमाम पहलुओं पर गौर करने के बाद अदालत ने पीड़िता के भविष्य और उसके सर्वोत्तम हितों को देखते हुए गर्भपात का निर्णय लिया।
अनुच्छेद 21 और गरिमा का अधिकार
न्यायालय ने अपने आदेश में बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी महिला या नाबालिग को उसकी मर्जी के बिना गर्भ धारण करने और मातृत्व के लिए मजबूर करना पूरी तरह गलत है। कोर्ट के अनुसार, ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा के मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है। अदालत ने माना कि पीड़िता का जीवन और उसका आने वाला भविष्य इस निर्णय पर निर्भर करता है, इसलिए सुरक्षित गर्भपात का विकल्प चुनना अनिवार्य था।
राजनांदगांव प्रशासन को दिए सख्त निर्देश
हाई कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए राजनांदगांव के सीएमएचओ को तत्काल प्रभाव से दिशा-निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने कहा है कि:
- एक विशेष एक्सपर्ट मेडिकल टीम का गठन किया जाए जो पूरी प्रक्रिया की निगरानी करे।
- गर्भपात की प्रक्रिया को 7 दिन के भीतर सुरक्षित रूप से पूरा किया जाए।
- पीड़िता को हर संभव मेडिकल सुविधा और मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग उपलब्ध कराई जाए।
- अस्पताल प्रशासन पीड़िता के पिता से तुरंत संपर्क स्थापित करे और उन्हें एम्बुलेंस समेत सभी आवश्यक सहायता प्रदान करे।
चूंकि यह पूरा प्रकरण एक आपराधिक जांच से भी संबंधित है, इसलिए अदालत ने निर्देश दिया है कि मेडिकल प्रक्रिया के दौरान कानून द्वारा निर्धारित सभी आवश्यक औपचारिकताओं का पूर्ण पालन किया जाए। कोर्ट ने यह सुनिश्चित करने को कहा है कि पीड़िता को इलाज के दौरान किसी भी प्रकार की परेशानी न हो और प्रक्रिया पूरी तरह गोपनीय व सुरक्षित रहे। इस निर्णय को न्यायपालिका की संवेदनशीलता के रूप में देखा जा रहा है, जहां कानूनी प्रावधानों और मानवीय आधार के बीच संतुलन बिठाते हुए पीड़िता को राहत दी गई है।
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