नयी दिल्ली। आज के समय में दुनिया जिन्हें शांति, करुणा और अहिंसा के सबसे बड़े वैश्विक प्रतीक के रूप में देखती है, उन तिब्बती आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा का जीवन असाधारण संघर्षों से भरा रहा है। वर्ष 1959 में इतिहास ने एक ऐसा मोड़ लिया जब उन्हें अपनी जान बचाने के लिए अपनी मातृभूमि तिब्बत को हमेशा के लिए छोड़ना पड़ा था। चीनी सैनिकों की कड़ी चौकसी के बीच से निकलना कोई आसान काम नहीं था। उन्हें रात के घने अंधेरे में एक सैनिक की वर्दी पहनकर अपने महल से बाहर कदम रखना पड़ा था। इसके बाद हफ्तों तक दुर्गम रास्तों और कठिन परिस्थितियों के बीच यात्रा करने के बाद वे भारतीय सीमा में सुरक्षित प्रवेश कर सके थे, जहां भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें राजनीतिक शरण दी थी। आइए जानते हैं दलाई लामा के तिब्बत छोड़ने और भारत पहुंचने की वह पूरी ऐतिहासिक गाथा।
ल्हामो धोंडुप से तेनजिन ग्यात्सो बनने का सफर
दलाई लामा का जन्म 6 जुलाई 1935 को तिब्बत के एक बेहद छोटे और सुदूर गांव तक्तसेर में हुआ था। उनके बचपन का नाम ल्हामो धोंडुप था। तिब्बती बौद्ध मान्यताओं और धार्मिक परंपराओं के अनुसार, जब वे महज दो वर्ष के थे, तब उन्हें 13वें दलाई लामा के पुनर्जन्म के रूप में मान्यता दी गई। इसके बाद उनका नया नाम तेनजिन ग्यात्सो रखा गया और उन्हें तिब्बत का सर्वोच्च आध्यात्मिक गुरु घोषित किया गया। तिब्बत के लोगों के लिए दलाई लामा केवल एक धार्मिक पथ-प्रदर्शक ही नहीं हैं, बल्कि वे उनके सबसे बड़े और सम्मानित नेता भी माने जाते हैं।
तिब्बत पर चीन का बढ़ता दबाव और वार्ता की कोशिशें
वर्ष 1950 के दशक की शुरुआत में तिब्बत पर चीन ने अपना नियंत्रण बढ़ाना शुरू कर दिया था। इसके बाद वहां की परिस्थितियां तेजी से बिगड़ने लगीं। इसी विषम समय में दलाई लामा को बहुत ही कम उम्र में तिब्बत की राजनीतिक और प्रशासनिक कमान भी अपने हाथों में लेनी पड़ी। उन्होंने तिब्बत की स्वायत्तता और शांति बनाए रखने के लिए चीन के तत्कालीन शीर्ष नेताओं जैसे माओ त्से-तुंग, चाउ एन-लाई और डेंग शियाओपिंग के साथ बातचीत के जरिए कोई शांतिपूर्ण समाधान निकालने का पूरा प्रयास किया, लेकिन बीजिंग के रवैये के कारण इन बैठकों का कोई ठोस परिणाम नहीं निकल सका।
इसी बीच, वर्ष 1956 में दलाई लामा बुद्ध जयंती समारोहों में हिस्सा लेने के लिए भारत आए थे। इस यात्रा के दौरान उन्होंने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मुलाकात की थी और तिब्बत की नाजुक स्थिति पर गंभीर चर्चा की थी। हालांकि, उस समय वे वापस अपने देश तिब्बत लौट गए थे ताकि शांति स्थापना के प्रयासों को एक और मौका दिया जा सके।
मार्च 1959 का वह संदिग्ध बुलावा और भारी तनाव
मार्च 1959 तक आते-आते तिब्बत की राजधानी ल्हासा में स्थिति बहुत संवेदनशील हो चुकी थी। 10 मार्च 1959 को चीनी सेना के एक जनरल ने दलाई लामा को चीनी सैन्य शिविर में आयोजित होने वाले एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में शामिल होने का न्योता भेजा। शुरुआत में यह एक साधारण निमंत्रण लग रहा था, लेकिन बाद में इसमें कुछ बेहद असामान्य शर्तें जोड़ दी गईं। चीनी अधिकारियों की शर्तें थीं कि:
- दलाई लामा के साथ उनका कोई भी तिब्बती सैनिक या सुरक्षा बल नहीं जाएगा।
- उनके निजी अंगरक्षकों को भी बिना हथियारों के ही आना होगा।
इन अजीबोगरीब शर्तों ने इस आशंका को जन्म दिया कि चीनी सेना दलाई लामा को बंधक बनाने या उन्हें गिरफ्तार करने की साजिश रच रही है। यह खबर जैसे ही फैली, हजारों की संख्या में चिंतित तिब्बती नागरिक उनके नोरबुलिंगका महल के बाहर एकत्र हो गए। लोगों ने दलाई लामा से चीनी सैन्य शिविर के कार्यक्रम में न जाने की भावुक अपील की। पूरे शहर में तनाव और अशांति का माहौल पैदा हो गया था।
रात के अंधेरे में सैनिक का वेश और ऐतिहासिक पलायन
हालात को अत्यधिक गंभीर देखते हुए आखिरकार 17 मार्च 1959 को यह बड़ा फैसला लिया गया कि दलाई लामा का तिब्बत छोड़ना ही एकमात्र सुरक्षित रास्ता है। अपनी पहचान पूरी तरह छिपाने के लिए उन्होंने सैनिक की वर्दी पहनी और रात के लगभग 10 बजे वे अपने कुछ बेहद वफादार और विश्वस्त साथियों के साथ चुपचाप नोरबुलिंगका महल से बाहर निकल गए।
बाद में रास्ते में उनके परिवार के सदस्य और अन्य प्रमुख सहयोगी भी इस यात्रा दल में शामिल हो गए। यह सफर बेहद खतरनाक और थका देने वाला था। चीनी सैनिकों के गश्ती दल और कड़े पहरे से बचते हुए उन्हें ऊंचे बर्फीले पहाड़ों, खराब मौसम और दुर्गम रास्तों का सामना करना पड़ा। लगभग तीन हफ्तों तक चले इस कठिन सफर के बाद, 31 मार्च 1959 को दलाई लामा भारतीय सीमा पर पहुंचे।
भारतीय सीमा पर ऐतिहासिक स्वागत और राजनीतिक शरण
जिस समय दलाई लामा ने भारत की सीमा में प्रवेश किया, उस समय आज के अरुणाचल प्रदेश को 'नेफा' यानी नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी के नाम से जाना जाता था। भारतीय सेना और स्थानीय प्रशासन के अधिकारियों ने सीमा पर उनका भव्य और सम्मानजनक स्वागत किया। उन्हें कड़ी सुरक्षा के बीच पहले तवांग ले जाया गया और उसके बाद असम पहुंचाया गया।
इसके कुछ समय बाद उनकी मुलाकात तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से हुई। भारत सरकार ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की कि दलाई लामा को भारत में राजनीतिक शरण दे दी गई है। दलाई लामा के सुरक्षित भारत पहुंचने के बाद, अपनी जान बचाने के लिए हजारों की संख्या में अन्य तिब्बती नागरिक भी अपने घरों को छोड़कर भारत आ गए। भारत सरकार ने इन शरणार्थियों को देश के विभिन्न राज्यों जैसे अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और कर्नाटक के विभिन्न हिस्सों में बसाने की व्यवस्था की।
हिमाचल प्रदेश का धर्मशाला और 'छोटा ल्हासा'
वर्ष 1960 के बाद से दलाई लामा ने हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला को अपना स्थायी निवास बनाया। आज यह स्थान पूरी दुनिया में 'छोटा ल्हासा' के नाम से जाना जाता है। यहीं पर तिब्बत की निर्वासित सरकार का मुख्यालय भी स्थित है।
निर्वासन में रहने के दौरान दलाई लामा ने पूरी दुनिया में तिब्बत के मुद्दे को अत्यंत शांतिपूर्ण तरीके से उठाया। उनकी इसी शांतिपूर्ण अपील का परिणाम था कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 1959, 1961 और 1965 में तिब्बत के समर्थन में विशेष प्रस्ताव पारित किए। उन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए तिब्बत के एक नए संविधान का मसौदा भी जारी किया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने तिब्बती शिक्षा, बौद्ध धर्म के संरक्षण और सांस्कृतिक धरोहरों को जीवित रखने के लिए कई प्रमुख संस्थानों की स्थापना की। आज भी दलाई लामा को दुनिया भर में करुणा, अहिंसा और शांति के सबसे बड़े संदेशवाहक के रूप में बेहद सम्मान के साथ देखा जाता है।
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