हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा और स्थिरता की नई बयार
भारत और इंडोनेशिया के रिश्ते अब केवल सामान्य द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रह गए हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा और विकास के लिहाज से ये दोनों देश अब बेहद अहम धुरी बन चुके हैं। PM नरेंद्र मोदी इस हफ्ते इंडोनेशिया के बेहद महत्वपूर्ण द्विपक्षीय दौरे पर जाने वाले हैं, जो पिछले 8 साल में इस देश की उनकी पहली द्विपक्षीय यात्रा होगी। रक्षा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने, आपसी व्यापार को रफ्तार देने और समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने के इरादे से हो रही इस यात्रा पर न केवल एशियाई देशों की, बल्कि पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं। रणनीतिक जानकारों का मानना है कि इस यात्रा से चीन के खेमे में हलचल तेज होना लाजिमी है, क्योंकि दोनों देश रक्षा क्षेत्र में एक बड़े रणनीतिक कदम की ओर बढ़ रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में नई दिल्ली और जकार्ता का करीब आना समय की मांग है। ऑस्ट्रेलियन स्ट्रैटेजिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट की वरिष्ठ विश्लेषक फिट्रियानी के मुताबिक, भौगोलिक दृष्टि से भारत और इंडोनेशिया हिंद महासागर के दो अत्यंत महत्वपूर्ण छोरों पर स्थित हैं। दोनों ही देश इस पूरे क्षेत्र में एक स्थिर, समावेशी और नियमों पर आधारित व्यवस्था बनाए रखने के प्रबल पक्षधर हैं। वहीं, इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ इंडोनेशिया के एसोसिएट प्रोफेसर हजा मिन फधली रॉबी का मानना है कि हिंद-प्रशांत में सुरक्षा और स्थिरता रहने से भारतीय अर्थव्यवस्था को तेजी से आगे बढ़ने में मदद मिलेगी, विशेष रूप से तब जब पश्चिम एशिया और दक्षिण चीन सागर में लगातार अस्थिरता का माहौल बना हुआ है।
मई 2018 के बाद पहली द्विपक्षीय यात्रा और कार्यक्रम की रूपरेखा
विदेश मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, PM मोदी 6 से 8 जुलाई तक इंडोनेशिया के दौरे पर रहेंगे। यह उनके कार्यकाल के दौरान इस देश की चौथी यात्रा होगी, लेकिन मई 2018 के बाद यह उनकी पहली पूर्ण द्विपक्षीय यात्रा होने जा रही है। इस यात्रा के दौरान PM मोदी के कई महत्वपूर्ण कार्यक्रम तय किए गए हैं, जिनमें मुख्य रूप से निम्नलिखित शामिल हैं:
- राष्ट्रपति प्राबोवो सुबियांतो के साथ रक्षा और व्यापारिक हितों पर उच्च स्तरीय बैठक।
- जकार्ता में रहने वाले प्रवासी भारतीय समुदाय के लोगों को संबोधित करना।
- UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल ऐतिहासिक प्रम्बानन मंदिर परिसर का दौरा करना।
इस महत्वपूर्ण दौरे को पूरा करने के बाद PM मोदी आगे की यात्रा के लिए ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के लिए रवाना होंगे।
'एक्ट ईस्ट' और हिंद-प्रशांत रणनीति को मिलेगा बढ़ावा
भू-राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब हिंद-प्रशांत क्षेत्र में वर्चस्व की जंग और समुद्री सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं तेजी से बढ़ रही हैं। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने की दिशा में भी यह यात्रा मील का पत्थर साबित हो सकती है। विश्लेषक फिट्रियानी ने बताया कि यह दौरा उस रणनीतिक सिलसिले को आगे बढ़ाएगा, जिसकी शुरुआत पिछले साल राष्ट्रपति प्राबोवो सुबियांतो की नई दिल्ली यात्रा से हुई थी, जब वह भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुई थीं।
PM मोदी की इस ताजा हिंद-प्रशांत यात्रा का पहला पड़ाव इंडोनेशिया होना यह साफ तौर पर दर्शाता है कि भारत अपनी 'एक्ट ईस्ट' नीति और हिंद-प्रशांत रणनीति में जकार्ता को कितनी बड़ी प्राथमिकता देता है। दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ने से क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
ब्रह्मोस मिसाइल सौदे पर टिकी दुनिया की निगाहें
इस पूरी यात्रा के दौरान सबसे बड़ा और संवेदनशील मुद्दा रक्षा सहयोग का है, जिसमें ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का संभावित सौदा सबसे ऊपर है। एसोसिएट प्रोफेसर हजा मिन फधली रॉबी के अनुसार, पिछले कुछ समय से इंडोनेशिया की संसद में भारत से ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली की खरीद को लेकर गंभीर चर्चाएं चल रही हैं। हालांकि, इंडोनेशिया के सामने मौजूद वित्तीय संकट के कारण वहां के सांसदों और नीति निर्माताओं के बीच इस सौदे को अंतिम रूप देने के सही समय को लेकर कुछ आपत्तियां और सवाल भी उठाए गए हैं। इसके बावजूद, रक्षा गलियारों में इस बात की पूरी उम्मीद की जा रही है कि PM मोदी की इस यात्रा के दौरान इस महासौदे को लेकर कोई बड़ा और सकारात्मक निर्णय लिया जा सकता है, जो आने वाले समय में चीन के लिए रणनीतिक तौर पर बड़ी चुनौती पेश करेगा।
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