भतीजे और पुत्र मोह की राजनीतिक कीमत: बंगाल में ममता बनर्जी के बाद क्या अब बिहार में तेजस्वी यादव की बारी है?

भारतीय राजनीति में परिवारवाद और अपनों के प्रति अत्यधिक मोह कई बड़े दलों के पतन का कारण बन रहा है। बंगाल में ममता बनर्जी और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के बाद अब बिहार में तेजस्वी यादव की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

राजनीति में वंशवाद और अपनों के प्रति अंधा मोह: एक ऐतिहासिक संकट

लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी राजनीतिक दल की सांगठनिक शक्ति और उसकी दीर्घायु मुख्य रूप से तीन महत्वपूर्ण स्तंभों पर टिकी होती है। ये तीन स्तंभ हैं—सक्रिय और समर्पित कार्यकर्ता, सुदृढ़ कार्यालय और एक मजबूत वित्तीय कोष। जिस भी राजनीतिक दल के पास इन तीनों संसाधनों की प्रचुरता होती है, वह राजनीतिक पटल पर उतनी ही मजबूती से अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। लेकिन जब इन तीनों स्तंभों में से किसी एक पर भी आंच आती है, तो पार्टी का ढांचा डगमगाने लगता है।

हाल के दिनों में भारतीय राजनीति के क्षितिज पर जो घटनाएं घटी हैं, वे इस बात का स्पष्ट उदाहरण हैं कि कैसे पारिवारिक मोह और वंशवाद के चक्कर में कई बड़े और मजबूत राजनीतिक दल बिखरने की कगार पर पहुंच गए हैं। पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मौजूदा स्थिति इसका सबसे बड़ा और ताजा प्रमाण है। बंगाल के विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद से ममता बनर्जी और उनकी पार्टी लगातार एक के बाद एक बड़े झटके झेल रही हैं। वे इन राजनीतिक संकटों से बाहर निकलने की जितनी भी कोशिशें कर रही हैं, उनके वे सारे प्रयास उन्हीं पर उल्टे पड़ते दिखाई दे रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी की इस दयनीय स्थिति के मुख्य सूत्रधार कोई और नहीं, बल्कि उनके अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी बने हैं। भतीजे के प्रति ममता का अत्यधिक मोह आज उनकी पूरी राजनीतिक विरासत को लीलने की कगार पर खड़ा है। यह केवल बंगाल की कहानी नहीं है। महाराष्ट्र में भी उद्धव ठाकरे ने अपने पुत्र प्रेम के कारण अपनी ही पार्टी को दोफाड़ होते देखा और आज वे खुद राजनीतिक हाशिए पर चले गए हैं। अब इसी तरह के गंभीर संकेत बिहार से भी मिल रहे हैं, जहां RJD में लालू प्रसाद यादव के पुत्र प्रेम की परिणति भी कहीं अन्य वंशवादी दलों की तरह न हो जाए, इसकी आशंकाएं बलवती होने लगी हैं। बिहार की राजनीति में भी इस बिखराव के स्पष्ट रुझान दिखाई देने लगे हैं।

पश्चिम बंगाल में बिखरता ममता बनर्जी का किला

पश्चिम बंगाल में पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के पास अब न तो जमीनी कार्यकर्ताओं का भरोसा बचा है, न ही कार्यालयों पर नियंत्रण और न ही पार्टी का कोष उनके हाथ में रह गया है। 4 मई को बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने के बाद से ही TMC में मची भगदड़ थमने का नाम नहीं ले रही है। सांसद, विधायक, पार्षद, पंचायत प्रधान से लेकर जमीनी स्तर के कार्यकर्ता लगातार ममता बनर्जी का साथ छोड़कर जा रहे हैं।

ममता बनर्जी की बेहद करीबी और कभी उनकी परछाई मानी जाने वाली वरिष्ठ नेता चंद्रिमा भट्टाचार्य का बागी गुट में शामिल होना इस सिलसिले की सबसे नई और विनाशकारी कड़ी है। ममता बनर्जी को छोड़ने वाले नेताओं की संख्या एक या दो में नहीं है, बल्कि यहां सामूहिक रूप से इस्तीफे और दलबदल हो रहे हैं। बंगाल की राजनीति में इस उथल-पुथल को निम्नलिखित आंकड़ों से समझा जा सकता है:

  • पार्टी के लोकसभा के 20 सदस्यों ने एक साथ मिलकर TMC छोड़ दी और NCPI में अपनी पूरी ताकत का विलय कर लिया।
  • राज्यसभा के 3 सदस्यों ने इस राजनीतिक खींचतान के बीच अपने पद और सदन की सदस्यता से सीधे इस्तीफा दे दिया।
  • पार्टी के कुल 80 विधायकों में से 65 विधायकों ने बगावत का बिगुल फूंकते हुए अपने धड़े को ही असली TMC होने का दावा ठोंक दिया है।

इस भारी राजनीतिक उठापटक के बीच ममता बनर्जी के विरोधियों ने केवल सांगठनिक रूप से ही हमला नहीं किया है, बल्कि उन्होंने पार्टी के वित्तीय कोष पर भी अपना दावा पेश कर दिया है। इसके अतिरिक्त, कोलकाता के ऐतिहासिक तृणमूल भवन पर भी अब विरोधी गुट ने पूरी तरह से अपना कब्जा जमा लिया है। ममता बनर्जी भले ही इस पार्टी की संस्थापक और इसकी सर्वाधिकारी रही हों, लेकिन आज स्थिति यह है कि बागी गुट ने उन्हें ही पार्टी से निष्कासित कर दिया है।

इस पूरे राजनीतिक भूचाल की तह में जाने पर एक ही बात सामने आती है—ममता बनर्जी का अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के प्रति अंधा प्रेम। बागी नेताओं को ममता बनर्जी की कार्यशैली से उतनी नाराजगी नहीं थी, जितनी वे अभिषेक बनर्जी के बढ़ते वर्चस्व और उनके व्यवहार से नाराज थे। लेकिन ममता बनर्जी ने अपने भतीजे का मोह छोड़ने से साफ इनकार कर दिया, जिसका खामियाजा आज वे भुगत रही हैं।

उत्तर प्रदेश में समाजवादी कुनबे की रार और महाराष्ट्र का उदाहरण

पारिवारिक मोह के कारण पार्टियों के टूटने और बिखरने का यह सिलसिला कोई नया नहीं है। देश की लगभग सभी क्षेत्रीय और वंशवादी पार्टियों को इस दौर से गुजरना पड़ा है। उत्तर प्रदेश में SP के संस्थापक मुलायम सिंह यादव को भी अपने जीवन के अंतिम दौर में इसी तरह के पारिवारिक और राजनीतिक द्वंद्व का सामना करना पड़ा था। मुलायम सिंह यादव ने पिछड़ों, दलितों और क्षेत्रीय अस्मिता को एकजुट करके उत्तर प्रदेश की सत्ता हासिल की थी और एक बेहद मजबूत संगठन खड़ा किया था।

हालांकि, उनके बेटे अखिलेश यादव पिता की इस विरासत को और उनकी सत्ता को ठीक से संभाल नहीं पाए। इसके अलावा, पार्टी और संगठन पर अपने पूर्ण नियंत्रण को लेकर अखिलेश यादव की अपने ही पिता मुलायम सिंह यादव से जो लंबी लड़ाई चली, वह जगजाहिर है। पार्टी के भीतर वर्चस्व की यह जंग इतनी आगे बढ़ गई थी कि मामला चुनाव आयोग से लेकर देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया था। राजनीतिक पंडित मानते हैं कि अगर मुलायम सिंह यादव ने अपनी ढलती उम्र और गिरते स्वास्थ्य के कारण खुद कदम पीछे नहीं खींचे होते, तो उत्तर प्रदेश में भी SP का वही हश्र होता जो आज बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी का हो रहा है। इसके साथ ही, महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे भी अपने बेटे के प्रति अत्यधिक लगाव के कारण आज अपनी सत्ता और अपनी पार्टी दोनों गंवा चुके हैं।

बिहार में RJD की नींव और लालू यादव का पुत्र प्रेम

अब ठीक इसी तरह के हालात बिहार की प्रमुख राजनीतिक पार्टी RJD में भी बनते दिख रहे हैं। RJD की बुनियाद भी पूरी तरह से वंशवाद पर ही टिकी हुई है। लालू प्रसाद यादव इस दल के जनक और संस्थापक हैं, इसलिए वे आज भी अपनी बीमारी के बावजूद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हुए हैं। लेकिन RJD के भीतर चल रही अंदरूनी कलह और मतभेद अब किसी से छिपे नहीं हैं।

वर्ष 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान जनता ने साफ देखा कि लालू यादव के अपने परिवार के भीतर किस कदर अशांति और कलह मची हुई थी। लालू यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप को घर से बाहर का रास्ता देखना पड़ा। वे पूरे चुनाव के दौरान अपने ही छोटे भाई तेजस्वी यादव के खिलाफ बेहद आक्रामक रुख अपनाए हुए थे और उनके उम्मीदवारों के विरोध में प्रचार करते घूम रहे थे।

पारिवारिक विवाद केवल भाइयों तक ही सीमित नहीं रहा। लालू प्रसाद यादव की एक बेटी भी अपने भाई तेजस्वी यादव से इस कदर नाराज थीं क्योंकि तेजस्वी ने राज्यसभा सांसद संजय यादव को पार्टी के सभी महत्वपूर्ण और नीतिगत फैसलों का अघोषित रूप से सर्वाधिकार सौंप दिया था। लालू प्रसाद यादव अपने खराब स्वास्थ्य और बुढ़ापे के कारण तेजस्वी यादव के इन एकतरफा फैसलों पर मूकदर्शक बने रहने को मजबूर थे। माना जाता है कि यदि लालू यादव ने तेजस्वी के फैसलों पर किसी भी तरह की आपत्ति जताई होती, तो RJD के भीतर भी मुलायम सिंह यादव के परिवार जैसा ही विद्रोह हो जाता।

चुनावी शिकस्त के बाद RJD में उठने लगी बागी आवाजें

भले ही लालू प्रसाद यादव के सम्मान में RJD के नेता अब तक खामोश रहे हों, लेकिन अब पार्टी के भीतर नेताओं और कार्यकर्ताओं की जुबान खुलने लगी है। बिहार विधानसभा चुनाव में मिली करारी और शर्मनाक हार ने RJD के नेताओं के भीतर दबे आक्रोश को बाहर ला दिया है। नेताओं और कार्यकर्ताओं का मनोबल इस हार से बुरी तरह टूट चुका है।

आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में RJD ने 75 सीटें जीतकर राज्य में सबसे बड़ी पार्टी होने का गौरव हासिल किया था। लेकिन इस बार के चुनाव में पार्टी सिमटकर महज 25 सीटों पर रह गई। सीटों में आई इस भारी गिरावट ने पार्टी की चूलें हिला दी हैं। तेजस्वी यादव की कार्यशैली और उनके फैसलों को देखकर अब पार्टी के भीतर यह माना जाने लगा है कि आने वाले कई वर्षों तक सत्ता में वापसी का सपना देखना केवल एक दूर की कौड़ी बनकर रह गया है।

राजनीति में हार और जीत एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन हार के बाद जमीनी स्तर पर प्रयास छोड़ देना किसी भी दल के लिए विनाशकारी साबित होता है। तेजस्वी यादव को भले ही पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया गया है, लेकिन उनकी सक्रियता जमीन पर पसीना बहाने के बजाय केवल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर घिसे-पिटे राजनीतिक बयान जारी करने तक ही सीमित होकर रह गई है।

तेजस्वी यादव की कार्यशैली पर उठते गंभीर सवाल

तेजस्वी यादव की कार्यशैली और पार्टी के प्रति उनकी गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि RJD का स्थापना दिवस, जो हर साल 5 जुलाई को मनाया जाता है, इस बार तय तिथि से दो दिन पहले ही आयोजित कर लिया गया। पार्टी के सूत्रों के अनुसार, ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि तेजस्वी यादव को छुट्टी मनाने और घूमने के लिए विदेश दौरे पर जाना था।

स्थापना दिवस के मंच से तेजस्वी यादव ने पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए बड़ी-बड़ी बातें कीं। उन्होंने कहा कि सरकार की नाकामियों के खिलाफ चुप नहीं बैठना है और जमीन पर जाकर खूब खून-पसीना बहाना है। एक विपक्षी दल के रूप में यह नसीहत बिल्कुल सही है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या केवल कार्यकर्ता ही जमीन पर पसीना बहाएंगे? यह काम खुद पार्टी के शीर्ष नेता तेजस्वी यादव को भी तो करना चाहिए। पार्टी के बेहद वरिष्ठ नेता उदय नारायण चौधरी ने स्थापना दिवस के मंच पर ही अत्यंत शालीनता से तेजस्वी को आईना दिखाते हुए कहा था कि कार्यकर्ताओं को प्रेरित करने के लिए खुद नेतृत्वकर्ता को भी जमीन पर उतरकर खून-पसीना बहाने की आवश्यकता होती है।

विदेश दौरों और जमीनी हकीकत से दूरी

विधायिका के प्रति तेजस्वी यादव की संजीदगी का एक और प्रमाण तब मिला, जब वे विधानसभा सदस्य के रूप में शपथ लेने के तुरंत बाद विदेश यात्रा पर चले गए। हैरानी की बात यह है कि पार्टी के भीतर भी किसी को यह जानकारी नहीं थी कि वे किस देश के दौरे पर गए हैं, किस काम से गए हैं और कब तक वापस लौटेंगे।

तेजस्वी की इस अनुपस्थिति के कारण RJD के उन नव-निर्वाचित विधायकों को भारी कठिनाई का सामना करना पड़ा जो पहली बार चुनाव जीतकर सदन पहुंचे थे। उन्हें यह बताने और समझाने वाला कोई नहीं था कि सदन के भीतर पार्टी की क्या रणनीति होगी और उन्हें किस तरह से अपनी बात रखनी है।

इसके अलावा, बिहार में हुए अपराधियों के एनकाउंटर के मामलों पर तेजस्वी यादव ने तुरंत सक्रियता दिखाई, लेकिन वह सक्रियता भी केवल जातिगत राजनीति तक सीमित रही। उन्होंने एनकाउंटर में मारे गए अपराधियों की जाति ढूंढ ली और सरकार पर जाति देखकर कार्रवाई करने का आरोप मढ़ दिया। लेकिन उन्होंने इतनी नैतिकता नहीं दिखाई कि वे उन परिवारों से व्यक्तिगत रूप से जाकर मिलें या कम से कम अपनी सांत्वना प्रकट करें।

RJD को सभी जातियों की यानी 'ए टू जे़ड' पार्टी बनाने का दावा करने वाले तेजस्वी यादव को ब्राह्मण जाति के भरत भूषण तिवारी के एनकाउंटर पर कोई गहरी संवेदना नहीं हुई। इसी तरह, जहानाबाद की एक छात्रा की पटना के छात्रावास में हुई रहस्यमय मौत के मामले पर भी वे पूरी तरह मौन रहे।

गठबंधन और सांगठनिक स्तर पर असफलता

तेजस्वी यादव के नेतृत्व और उनकी सांगठनिक क्षमता पर सबसे बड़ा सवालिया निशान हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव के दौरान लगा। इस चुनाव में वे न तो अपने महागठबंधन को एकजुट रख पाए और न ही अपनी पार्टी के विधायकों को बगावत करने से रोक सके। उनके अपने ही एक विधायक ने ऐन वक्त पर पार्टी से दगा कर दिया, जिसके कारण RJD की तय मानी जा रही सीट पर भारतीय जनता पार्टी और NDA के प्रत्याशी ने कब्जा कर लिया।

सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि जिस विधायक ने तेजस्वी को धोखा दिया, वह लालू प्रसाद यादव के पारंपरिक 'मुस्लिम-यादव' समीकरण से आता था। इसका अर्थ यह है कि तेजस्वी यादव अपने पिता लालू यादव द्वारा दशकों की मेहनत से तैयार किए गए और आजमाए हुए सामाजिक समीकरण को भी संभालने में पूरी तरह से नाकाम साबित हो रहे हैं।

यदि तेजस्वी यादव इसी तरह अपनी मनमर्जी और जमीनी हकीकत से दूर रहकर राजनीति करते रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब बिहार में RJD का हश्र भी पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी जैसा ही हो जाएगा। वरिष्ठ नेता उदय नारायण चौधरी द्वारा दी गई नसीहत RJD के भविष्य के लिए अच्छे संकेत नहीं दे रही है।

https://hindi.news18.com/news/bihar/patna-opinion-mamata-abhishek-uddhav-lalu-tejashwi-rjd-vanshvaad-politics-local18-10629206.html