पलामू में मानसून के सक्रिय होते ही खेतों में रोपाई और बोआई की सुगबुगाहट तेज हो गई है। मिट्टी में पर्याप्त नमी आने के साथ ही किसान अब धान की खेती की तैयारियों में पूरी तरह जुट गए हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, यह समय धान का बिचड़ा यानी नर्सरी तैयार करने के लिए सबसे बेहतर माना जाता है। पलामू के जिन किसानों ने अभी तक अपने खेतों में बिचड़ा नहीं डाला है, वे जल्द से जल्द खेतों में कीचड़ तैयार कर नर्सरी डालने का काम शुरू कर सकते हैं। हालांकि, इस साल मौसम को लेकर थोड़ी चिंताएं भी बनी हुई हैं।
कम बारिश की आशंका और वैज्ञानिक तकनीक की जरूरत
इस वर्ष अल नीनो के प्रभाव के चलते मानसून के दौरान सामान्य से कम बारिश होने की आशंका जताई जा रही है। ऐसी स्थिति में मौसम की अनिश्चितता से निपटने के लिए किसानों को अपनी पारंपरिक कृषि पद्धतियों में थोड़ा बदलाव करने की जरूरत है। कृषि विज्ञानियों का कहना है कि अगर किसान इस बार वैज्ञानिक और तकनीकी तरीकों का इस्तेमाल करेंगे, तो वे मौसम की मार से अपनी फसल को काफी हद तक सुरक्षित रख सकेंगे।
क्या होता है 'बूढ़ा बिचड़ा' और इससे क्यों घटती है पैदावार?
कृषि विशेषज्ञ डॉ. अखिलेश शाह ने बताया कि सिंचाई के पर्याप्त साधन न होने पर किसानों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। यदि कोई किसान अपने पूरे खेत के लिए एक ही बार में बिचड़ा तैयार कर लेता है, और किसी कारणवश बारिश में देरी हो जाती है, तो नर्सरी में लगे पौधे जरूरत से ज्यादा बड़े और पुराने हो जाते हैं। कृषि की बोलचाल में इसे 'बूढ़ा बिचड़ा' कहा जाता है।
जब इस तरह के पुराने या बूढ़े बिचड़े की रोपाई मुख्य खेत में की जाती है, तो पौधों का समुचित विकास नहीं हो पाता। उनकी जड़ें सही तरीके से फैल नहीं पातीं और कल्ले भी कम निकलते हैं। इसका सीधा असर धान की पैदावार पर पड़ता है और किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
स्टेगर विधि: टुकड़ों में तैयार करें नर्सरी
इस समस्या से बचने के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने स्टेगर यानी चरणबद्ध विधि अपनाने की सलाह दी है। इस विधि के तहत किसान अपनी पूरी जमीन के लिए एक साथ बिचड़ा न डालकर उसे अलग-अलग समय पर तैयार करते हैं। डॉ. शाह ने इसे एक बेहद सरल उदाहरण के जरिए समझाया है:
- मान लीजिए किसी किसान को कुल 15 कट्ठे जमीन पर धान की रोपाई करनी है।
- उसे एक ही दिन में पूरे 15 कट्ठे के लिए नर्सरी नहीं डालनी चाहिए।
- इसके बजाय, सबसे पहले केवल 5 कट्ठे के क्षेत्र के लिए बिचड़ा तैयार करना चाहिए।
- इसके करीब 5 से 10 दिन बाद अगले 5 कट्ठे के लिए बीज डालना चाहिए।
- फिर लगभग एक सप्ताह बाद बचे हुए अंतिम 5 कट्ठे के लिए बिचड़ा लगाना चाहिए।
इस चरणबद्ध तरीके को अपनाने का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि किसान के पास अलग-अलग समय पर तैयार होने वाली नर्सरी हमेशा उपलब्ध रहती है। जब भी बारिश होती है, किसान अपनी जरूरत और मौसम के अनुकूल सही उम्र का बिचड़ा रोपाई के लिए चुन सकता है। इससे मौसम का जोखिम बहुत कम हो जाता है और फसल का उत्पादन भी काफी बेहतर होता है।
कम्पोस्ट खाद का सही उपयोग है जरूरी
नर्सरी तैयार करते समय मिट्टी की सेहत का ध्यान रखना भी बेहद आवश्यक है। डॉ. अखिलेश शाह के मुताबिक, बिचड़ा डालते समय खेत में अच्छी तरह से सड़ी हुई कम्पोस्ट खाद का प्रचुर मात्रा में उपयोग करना चाहिए। कम्पोस्ट खाद न केवल मिट्टी की उपजाऊ क्षमता को बढ़ाती है, बल्कि पौधों की जड़ों को भी अंदर से मजबूती प्रदान करती है।
इसका एक व्यावहारिक लाभ यह भी होता है कि जब किसान रोपाई के लिए बिचड़ा उखाड़ते हैं, तो मजबूत जड़ों के कारण पौधे आसानी से बिना टूटे उखड़ जाते हैं। इससे पौधों को नुकसान नहीं पहुंचता और जब इन्हें दोबारा मुख्य खेत में रोपा जाता है, तो ये बहुत तेजी से मिट्टी पकड़ लेते हैं और इनका विकास तेजी से होता है।
नर्सरी में खरपतवार का नियंत्रण कैसे करें?
धान की नर्सरी में खरपतवार यानी अनचाही घास का उगना एक बड़ी समस्या होती है, जो मुख्य पौधों के हिस्से का पोषण छीन लेती है। इससे बचने के लिए शुरुआत से ही वैज्ञानिक उपाय अपनाए जा सकते हैं। खरपतवार नियंत्रण के लिए किसान निम्नलिखित रसायनों का छिड़काव कर सकते हैं:
- प्रति लीटर पानी में 2 मिलीलीटर प्रीटीलाक्लोर मिलाकर नर्सरी में छिड़काव करें।
- या फिर, प्रति लीटर पानी में 5 मिलीलीटर पेंडीमेथालिन की दर से मिलाकर घोल बनाकर छिड़कें।
इन रसायनों के सही इस्तेमाल से खरपतवार का जमाव रुक जाता है, जिससे धान के नन्हें पौधों को हवा, धूप और मिट्टी से पर्याप्त मात्रा में पोषण मिलता है। बदलते मौसम के इस दौर में वैज्ञानिकों द्वारा बताए गए इन तरीकों को अपनाकर किसान न केवल अपनी लागत बचा सकते हैं, बल्कि धान का बंपर उत्पादन भी हासिल कर सकते हैं।
https://hindi.news18.com/news/agriculture/paddy-nursery-stagger-method-dhan-ka-bichada-local18-ws-l-10627450.html