धान की खेती का नया फॉर्मूला: मानसून में देरी भी नहीं बिगाड़ेगी खेल, लागत होगी कम और मुनाफा होगा डबल

धान की सीधी बुआई तकनीक अपनाकर किसान पारंपरिक खेती के मुकाबले प्रति एकड़ हजारों रुपये की बचत कर रहे हैं। मानसून की देरी से निपटने और कम लागत में बंपर पैदावार पाने का यह एक बेहद प्रभावी तरीका साबित हो रहा है।

भारत में कृषि क्षेत्र लगातार आधुनिकता की ओर बढ़ रहा है। पारंपरिक तरीकों में जहां मेहनत और पूंजी दोनों अधिक लगती थी, वहीं अब नई तकनीकें किसानों के लिए वरदान साबित हो रही हैं। बिहार के सीतामढ़ी सहित देश के कई हिस्सों में धान की खेती को लेकर किसानों का नजरिया तेजी से बदल रहा है। किसान अब पुरानी और घिसी-पिटी पद्धतियों को छोड़कर वैज्ञानिक और आधुनिक तौर-तरीकों को अपना रहे हैं। आमतौर पर धान की खेती के लिए किसान सबसे पहले एक छोटी नर्सरी में बिचड़ा यानी पौध तैयार करते हैं। इस प्रक्रिया में करीब 20 से 25 दिन का समय लगता है। इसके बाद, जब पौधे तैयार हो जाते हैं, तब पूरे खेत की जुताई और कद्दु करके भारी मजदूरी खर्च पर पौधों की रोपाई की जाती है। इस पारंपरिक विधि में पानी, समय और सबसे बढ़कर पैसे की भारी लागत आती है। इसी समस्या का समाधान बनकर उभरी है धान की सीधी बुआई तकनीक, जिसे डायरेक्ट सीडिंग भी कहा जाता है। यह तकनीक न केवल खेती की लागत को बेहद कम कर रही है, बल्कि कम समय में बेहतर मुनाफा देने के लिए भी जानी जा रही है।

मशीनों के सहारे बुआई का नया और सुलभ तरीका

धान की सीधी बुआई करने के लिए आज के समय में उन्नत कृषि यंत्रों का उपयोग किया जा रहा है। किसान अपनी सुविधा और बजट के अनुसार हाथ से खींचे जाने वाले राइस ड्रम सीडर या फिर ट्रैक्टर के माध्यम से चलने वाली आधुनिक सीड ड्रिल मशीन का सहारा ले रहे हैं। इन मशीनों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इनमें खाद और बीज डालने के लिए पूरी तरह से अलग-अलग हिस्से या चैम्बर बने होते हैं। इससे बीज और खाद का सही संतुलन बना रहता है।

अगर हम बीज की मात्रा की बात करें, तो सामान्यतः एक एकड़ खेत के लिए यदि किसान हाइब्रिड धान का उपयोग कर रहे हैं, तो केवल 6 किलो बीज ही काफी होता है। वहीं, अगर कोई किसान स्थानीय या पारंपरिक किस्म के बीजों का चयन करता है, तो उसके लिए प्रति एकड़ लगभग 12 किलो बीज की आवश्यकता होती है। बुआई के दौरान मशीन के छिद्रों या ओपनिंग को इस प्रकार सेट किया जाता है कि बीज बिना किसी रुकावट के और सही मात्रा में गिरें। कई अनुभवी किसान बीजों के बेहतर फैलाव के लिए उसमें डीएपी खाद भी मिला देते हैं। इससे बीज खेत में बनी क्यारियों या कतारों में एक समान दूरी पर गिरते हैं, जिससे पौधों को पर्याप्त हवा और धूप मिलती है और उनका विकास बहुत शानदार होता है।

लागत में कमी से कैसे बढ़ेगा किसानों का शुद्ध मुनाफा

इस आधुनिक तकनीक का जो सबसे बड़ा और सीधा फायदा किसानों को मिल रहा है, वह है खेती की लागत में होने वाली भारी गिरावट। अगर हम पारंपरिक तरीके से की जाने वाली रोपाई की बात करें, तो एक एकड़ खेत में मजदूरों की मजदूरी, सिंचाई और तैयारी का कुल खर्च आसानी से 5 हजार रुपये तक पहुंच जाता है। इसके विपरीत, यदि किसान सीड ड्रिल मशीन के माध्यम से धान की सीधी बुआई का रास्ता चुनते हैं, तो उनका यही काम महज 1,500 रुपये के भीतर आसानी से निपट जाता है।

इस प्रकार, किसानों को प्रति एकड़ सीधे तौर पर 3,500 रुपये की बड़ी बचत प्राप्त होती है। लागत में इस भारी कमी का एक मनोवैज्ञानिक और आर्थिक लाभ यह भी है कि यदि मौसम की बेरुखी या किसी अन्य प्राकृतिक कारण से फसल के उत्पादन में थोड़ी-बहुत कमी आ भी जाए, तब भी किसानों पर कर्ज या आर्थिक नुकसान का बोझ नहीं पड़ता। कम निवेश होने के कारण खेती हर हाल में फायदे का सौदा बनी रहती है।

मानसून की देरी से निपटने में रामबाण तकनीक

जलवायु परिवर्तन के इस दौर में मानसून का समय पर न आना एक बड़ी समस्या बन चुका है। ऐसे में यह तकनीक उन क्षेत्रों के किसानों के लिए जीवनदायिनी साबित हो रही है जहां बारिश में देरी होती है। देर से आने वाले मानसून के प्रभाव को कम करने के लिए कृषि वैज्ञानिक कम समय में तैयार होने वाली धान की किस्मों को उगाने की सलाह देते हैं। ऐसी ही एक बेहतरीन किस्म है 'स्वर्णा पूर्वी'। यह किस्म सीधी बुआई के माध्यम से रोपे जाने पर मात्र 110 दिनों के भीतर पककर पूरी तरह तैयार हो जाती है।

जुलाई का महीना बीतने के बाद भी यदि किसी किसान भाई ने अब तक धान की नर्सरी तैयार नहीं की है, तो उन्हें घबराने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। वे बिना किसी देरी के इस मशीन की मदद से सीधे अपने खेतों में धान की बुआई कर सकते हैं। कृषि विशेषज्ञों का स्पष्ट रूप से मानना है कि पारंपरिक तरीके से की गई रोपाई और सीधी बुआई से तैयार होने वाली फसलों के पकने के समय में कोई विशेष अंतर नहीं आता है, बल्कि सीधी बुआई वाली फसल कई बार जल्दी ही पक जाती है।

खरपतवार नियंत्रण: सीधी बुआई की सबसे बड़ी चुनौती

हालांकि, हर नई तकनीक के साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी होती हैं। धान की सीधी बुआई के मामले में भी किसानों को कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। इस तकनीक में पारंपरिक रोपाई की तुलना में प्रति एकड़ लगभग 2 किलो अधिक बीज की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, इस विधि में खेतों में खरपतवार यानी नुकसानदेह घास और जंगली पौधे उगने की संभावना काफी बढ़ जाती है, क्योंकि शुरुआती दिनों में खेत में पानी भरा नहीं रहता है।

इस चुनौती से निपटने के लिए किसानों को खरपतवार नियंत्रण के वैज्ञानिक उपायों को अपनाना चाहिए:

  • बुआई के तत्काल बाद (0 से 3 दिनों के भीतर): खरपतवारों को उगने से रोकने के लिए प्री-इमर्जेंस हर्बिसाइड के रूप में पेंडीमेथालिन दवा का उपयोग करना चाहिए। इसकी लगभग 3.3 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से पानी में मिलाकर छिड़कनी चाहिए।
  • बुआई के 25 से 30 दिनों के बाद: यदि फिर भी खेत में खरपतवार दिखाई देते हैं, तो पोस्ट-इमर्जेंस हर्बिसाइड के रूप में बिसपाइरीबैक सोडियम का उपयोग करना चाहिए। इसकी लगभग 60 ग्राम मात्रा को प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़कने से खरपतवारों पर पूरी तरह से नियंत्रण पाया जा सकता है।

इन सरल और सुलभ रासायनिक उपायों को अपनाकर किसान अपनी फसल को सुरक्षित रख सकते हैं। इससे धान के पौधों को पूरा पोषण मिलता है, फसल पूरी तरह स्वस्थ रहती है और अंततः किसानों को रिकॉर्डतोड़ पैदावार प्राप्त होती है।

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