पश्चिम बंगाल की राजनीति से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है, जहां पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को एक और तगड़ा झटका लगा है। उनकी बेहद करीबी और विश्वसनीय सहयोगी मानी जाने वाली वरिष्ठ नेता चंद्रिमा भट्टाचार्य ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है। इतना ही नहीं, चंद्रिमा ने केवल प्रदेश अध्यक्ष का पद ही नहीं छोड़ा है, बल्कि उन्होंने पार्टी के अन्य सभी पदों से भी अपना इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपना इस्तीफा सीधे ममता बनर्जी को भेज दिया है, जिससे पार्टी के भीतर खलबली मच गई है।
कार्यभार संभालने के एक महीने के भीतर उठाया कदम
चंद्रिमा भट्टाचार्य का यह फैसला राजनीतिक गलियारों में हर किसी को हैरान कर रहा है, क्योंकि उन्होंने यह कदम अपना नया कार्यभार संभालने के महज एक महीने के भीतर ही उठा लिया है। गौरतलब है कि पिछले महीने की 3 तारीख को ही ममता बनर्जी ने चंद्रिमा भट्टाचार्य पर भरोसा जताते हुए उन्हें तृणमूल कांग्रेस का नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया था। लेकिन इस नियुक्ति के एक महीने के भीतर ही उनका पार्टी से इस तरह अलग होना ममता बनर्जी के लिए एक बहुत बड़ा नुकसान माना जा रहा है।
कौन हैं चंद्रिमा भट्टाचार्य और क्या रही है उनकी भूमिका?
चंद्रिमा भट्टाचार्य पश्चिम बंगाल की राजनीति का एक बड़ा चेहरा रही हैं। वह न केवल तृणमूल कांग्रेस सरकार में मंत्री पद संभाल चुकी हैं, बल्कि उन्हें ममता बनर्जी की सबसे भरोसेमंद और सबसे करीबी सहयोगियों में गिना जाता रहा है। उन्होंने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार में कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाली थी। चंद्रिमा ने राज्य सरकार में वित्त विभाग, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग, भूमि सुधार विभाग के साथ-साथ शरणार्थी और पुनर्वास राज्य मंत्री के रूप में अपनी सेवाएं दी थीं। वह पेशे से एक वकील भी हैं और राजनीति में अपनी मुखर और तेज-तर्रार छवि के लिए जानी जाती हैं। ऐसे में उनका पार्टी छोड़ना तृणमूल कांग्रेस के लिए एक बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा कर सकता है।
मुश्किलों में घिरीं ममता बनर्जी और पार्टी के भीतर बगावत
यह इस्तीफा ऐसे समय में आया है जब ममता बनर्जी चारों तरफ से गंभीर राजनीतिक संकटों से घिरी हुई हैं। ऐसे नाजुक दौर में उनकी सबसे खास सहयोगी का इस तरह साथ छोड़ना उनके लिए बेहद चिंताजनक है। पार्टी के कई बड़े और कद्दावर चेहरे लगातार ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी का साथ छोड़कर बागी गुट का दामन थाम रहे हैं। अब राजनीतिक विश्लेषकों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि ममता बनर्जी इस बड़े सियासी संकट और अपनी पार्टी के भीतर चल रहे तूफान से खुद को और अपनी पार्टी को कैसे बचा पाती हैं।
विधानसभा चुनाव में हार के बाद से गहराया संकट
पश्चिम बंगाल में हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस को मिली हार के बाद से ही ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी की राजनीतिक मुश्किलें थमने का नाम नहीं ले रही हैं। चुनाव परिणामों के बाद से ही पार्टी के भीतर जबरदस्त असंतोष और गुटबाजी खुलकर सामने आ रही है। एक के बाद एक कई बड़े नेता लगातार टीएमसी से दूरी बना रहे हैं। चंद्रिमा भट्टाचार्य से पहले भी पार्टी को बड़ा झटका लग चुका है, जब तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों ने पहले ही बगावत का बिगुल फूंक दिया था। इस बागी गुट ने नेशनल सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया में अपने विलय की बात कही थी। अब इसी कड़ी में चंद्रिमा भट्टाचार्य का इस्तीफा ममता बनर्जी के लिए अब तक का सबसे बड़ा और व्यक्तिगत झटका माना जा रहा है।
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